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OPINION: मोदी-जिनपिंग की मुलाकातें द्विपक्षीय संबंधों में पड़ने वाली दरारों को भरने तक सीमित

News18Hindi
Updated: October 10, 2019, 3:45 PM IST
OPINION: मोदी-जिनपिंग की मुलाकातें द्विपक्षीय संबंधों में पड़ने वाली दरारों को भरने तक सीमित
पीएम नरेंद्र मोदी और चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग की महाबलिपुरम में होने वाली मुलाकात जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद-370 हटाए जाने के बाद बने तनावपूर्ण माहौल के बीच होगी.

भारत और चीन (India-China) के संबंध उस दंपति की तरह हो चुके हैं, जिसमें दोनों में कोई भी सिर्फ अलग नहीं होना चाहता है. दोनों देशों के रिश्‍ते द्विपक्षीय संबंधों में मतभेदों के प्रबंधन तक सीमित होकर रह गया है. इस बार भी पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग (President Xi Jinping) की मुलाकात जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) हटाने के बाद बने तनावपूर्ण माहौल के बीच हो रही है.

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  • Last Updated: October 10, 2019, 3:45 PM IST
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ज़का जैकब

नई दिल्‍ली. भारत-चीन (India-china) के मामले में अनौपचारिक बैठकों (Informal Summits) में करीब-करीब एक जैसा माहौल और एक जैसी बातें ही होती हैं. साबरमती से लेकर वुहान और अब महाबलिपुरम तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) तथा चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग (President Xi Jinping) की मुलाकातों ने सभी औपचारिकताओं व पारंपरिक कूटनीति को किनारे रखने का भरपूर मौका दिया. लेकिन, इन मुलाकातों में व्‍यक्तिगत संबंधों (Personal Chemistry) को वास्‍तविक मुद्दों से ज्‍यादा तरजीह दी गई. अनौपचारिक मुलाकातों का सबसे बड़ा संकट यही है कि इसमें बैठक के वास्‍तविक नतीजों का पता लगाना बहुत मुश्किल हो जाता है.

अनौपचारिक बैठकों के बाद जारी नहीं होते संयुक्‍त वक्‍तव्‍य
अनौपचारिक बैठकों (Informal Meetings) के बाद न ही कोई संयुक्‍त घोषणापत्र (Joint Declaration) जारी किया जाता है और न ही औपचारिक बयान (Formal Statement) जारी होते हैं. अमूमन अनौपचारिक मुलाकातों के बाद प्रेस से बातचीत (Press Interaction) की भी कोई व्‍यवस्‍था नहीं होती. ऐसे में मुलाकात का फायदा (Outcome) पता करने का कोई रास्‍ता नहीं रह जाता. भारत और चीन के संबंध उस दंपत्ती की तरह हो चुके हैं, जिसमें दोनों में कोई भी बस अलग नहीं होना चाहता है. दोनों देशों के रिश्‍ते द्विपक्षीय संबंध (Bilateral Relations) में मतभेदों (Differences) के प्रबंधन तक सीमित हो गए हैं.

डोकलाम में तनाव के बाद पहली मुलाकात वुहान में हुई
वुहान समिट (Wuhan Summit) डोकलाम में तनाव (Doklam standoff) के कुछ महीने बाद हुई थी. पीएम मोदी और राष्‍ट्रपति जिनपिंग की इस मुलाकात में 1962 के युद्ध के बाद चले सबसे लंबे तनाव को खत्‍म कर दोनों देशों के संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की गई. दोनों शीर्ष नेताओं ने अपने-अपने नौकरशाहों (Bureaucrats) और नागरिकों (Citizens) को संदेश दिया कि उच्‍च स्‍तर पर सब ठीक है. दोनों नेताओं को दोनों देशों के बीच इस सही की भावना को निचले स्‍तर तक पहुंचाना चाहिए था. दुर्भाग्‍य से दोनों शीर्ष नेताओं ने व्‍यक्तिगत रिश्‍तों को तरजीह दी. हालांकि, इससे दोनों देशों के संबंधों को खास फायदा नहीं हुआ.

भारत अनुच्‍छेद-370 हटाने को पूरी तरह से आतंरिक मामले के तौर पर देख रहा है. वहीं, चीन इसे यथास्थिति में एकपक्षीय बदलाव बता रहा है.

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जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद-370 हटाने पर गंभीर मतभेद
महाबलिपुरम की मुलाकात भी कुछ तनाव भरे हालात में ही हो रही है. जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) हटाए जाने के बाद ये मोदी-जिनपिंग की पहली मुलाकात होगी. दोनों ही पक्ष इस फैसले को देखने के नजरिये में गंभीर मतभेद हैं. जहां भारत इसे पूरी तरह से आतंरिक मामले (Internal Issue) के तौर पर देख रहा है. वहीं, चीन इसे यथास्थिति में एकपक्षीय (Unilateral) बदलाव बता रहा है. शुरुआत में चीन भी लद्दाख (Ladakh) पर इसके असर को लेकर चिंतित था. लेकिन पाकिस्‍तान (Pakistan) के रुख को देखकर चीन उसके पक्ष में खड़ा हो गया. चीन ने सबसे पहले संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) की अनौपचारिक चर्चा में इसका विरोध किया था.

इमरान के बीजिंग दौरे के बाद भी चीन ने किया विरोध
संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा (UNGA) में चीन के विदेश मंत्री ने भी अनुच्‍छेद-370 हटाने के मोदी सरकार (Modi Government) के फैसले के खिलाफ बोला था. पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (PM Imran Khan) के बीजिंग दौरे के बाद संयुक्‍त वक्‍तव्‍य में भी चीन ने विरोध की भाषा बोली थी. यहां तक कि हाल में चीन की ओर से कहा गया है कि शी जिनपिंग हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं. इमरान की बीजिंग यात्रा भी जिनपिंग के चेन्‍नई दौरे के मद्देनजर आनन-फानन की गई थी. ये यात्रा यह स्पष्ट करने के लिए थी कि चीन के लिए भारत और पाकिस्‍तान बराबर हैं. यानी बीजिंग के लिए पाकिस्‍तान की अहमियत भारत से कमतर नहीं है.

दक्षिण एशिया में भारत ही चीन को दे सकता है चुनौती
दक्षिण एशिया में भारत ही इकलौता देश है जो आने वाले समय में चीन के सामने हर मामले में चुनौती पेश कर सकता है. जितना चीन पाकिस्‍तान का साथ देगा, उतना वह भारत की ओर से मिलने वाली चुनौती को कम कर पाएगा. चीन अगले 30 साल को जी-2 (चीन और अमेरिका) के वर्षों के तौर पर देख रहा है. शिन्‍हुआ यूनिवर्सिटी के विद्वानों का कहना है कि दूसरे विश्‍व युद्ध (World War-2) के बाद अमेरिका (US) इस तरह से आगे बढ़ा कि कोई भी देश उसको अटलांटिक या प्रशांत क्षेत्र में चुनौती नहीं दे पाए. उनका कहना है कि चीन भी महाशक्ति बनने की महत्‍वकांक्षा पाल रहा है. इसकी राह में सिर्फ भारत ही रुकावट डाल सकता है.

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First published: October 10, 2019, 3:23 PM IST
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