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OPINION: Jharkhand Election Result- झारखंड में जनता के मुद्दे पहचानने में चूक कर गई BJP!

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: December 23, 2019, 11:39 PM IST
OPINION: Jharkhand Election Result- झारखंड में जनता के मुद्दे पहचानने में चूक कर गई BJP!
घनघोर उत्‍साह के माहौल में झारखंड का चुनाव परिणाम सामने आया जिसने बीजेपी के हाथ से एक और राज्‍य छीन लिया

बीजेपी (BJP) की समस्‍या यह हो गई है कि वह पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के करिश्‍मे पर निर्भर होती जा रही है. पार्टी के राज्‍य स्‍तरीय नेताओं को लगता है कि वे चाहे जैसा काम करें, लेकिन अंत में मोदी नाम उन्‍हें चुनाव की वैतरणी पार करा देगा.

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  • Last Updated: December 23, 2019, 11:39 PM IST
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अगर विचारधारा के नजरिये से देखें तो यह भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janta Party) का स्‍वर्णयुग है. मुसलमानों में तीन तलाक की प्रथा गैर-कानूनी घोषित हो चुकी है. कश्‍मीर (Kashmir) से न सिर्फ अनुच्छेद 370 हट चुका है, बल्कि जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu Kashmir) का पूर्ण राज्‍य का दर्जा भी खत्‍म हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट अयोध्‍या में राम मंदिर बनाने का आदेश दे चुका है. सरकार ने पड़ोस के देशों से भारत में प्रवेश चाहने वाले गैर-मुस्लिमों को भारत की नागरिकता देने का कानून बना दिया है. और देश के वायुमंडल में उस एनआरसी (NRC) की चर्चा जोरों पर है, जिसको लेकर देश का मुस्लिम समुदाय डरा हुआ है. यानी इस समय देश में हर वह चीज हो रही है जो राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की विचारधारा के बुनियादी मुद्दे थे.

सिर्फ इतना ही नहीं कि हिंदुत्‍व के ये पुराने सपने साकार हुए हों, बल्कि सत्‍ताधारी भाजपा ने इन मुद्दों को चुनाव में इस्‍तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. झारखंड विधानसभा चुनाव (Jharkhand Election Result) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक चुनाव रैली के दौरान कांग्रेस को चुनौती दी कि पार्टी घोषणा करे कि क्‍या वह पाकिस्‍तानियों को भारत की नागरिकता देना चाहती है! भाजपा अध्‍यक्ष अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान घोषणा की कि चार महीने के भीतर अयोध्‍या में गगनचुंबी राम मंदिर का निर्माण हो जाएगा. संयोग से इसी समय देश के सभी बड़े शहरों में नए नागरिकता कानून और संभावित एनआरसी के खिलाफ बड़ी-बड़ी संख्‍या में लोगों का हुजूम सड़कों पर उतर रहा था. लेकिन इस जनसैलाब की मांगों को दरकिनार करते हुए प्रधानमंत्री ने रामलीला मैदान की रैली में देश को आश्‍वस्‍त किया कि विपक्ष लोगों में भ्रम फैला रहा है.

झारखंड ने बीजेपी से छीना एक और राज्य
संसद और सड़क दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी की भाषा आक्रामक और उत्‍साह से लबरेज थी, लेकिन इस घनघोर उत्‍साह के माहौल में झारखंड का चुनाव परिणाम सामने आया. जिस चुनाव ने बीजेपी के हाथ से एक और राज्‍य छीन लिया. अगर ईवीएम मशीनों से अंत में कोई उलटफेर करने वाला परिणाम नहीं आता, तो राज्‍य में झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्‍ट्रीय जनता दल के गठबंधन की सरकार बननी तय है. इतना ही नहीं राज्‍य में बीजेपी के चेहरे और मुख्‍यमंत्री रघुबरदास लगातार अपने प्रतिद्वंद्वी और बीजेपी के बागी सरयू राय से पीछे चल रहे हैं.

लेकिन यह सब कैसे हो रहा है! क्‍या भारत में सोशल इंजीनियरिंग, राष्‍ट्रवाद और सबसे प्रिय नेता रखने वाली बीजेपी ने चुनाव में कोई बड़ी चूक कर दी. इस बात को समझना हो, तो बीजेपी के चुनाव प्रचार के जो मुद्दे ऊपर बताए गए हैं, उनकी जगह विपक्ष के मुद्दों पर नजर डालें. विपक्ष की ओर से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर राहुल गांधी झारखंड में प्रचार की कमान संभाल रहे थे. राहुल ने बीजेपी के किसी मुद्दे को अपना मुद्दा नहीं बनाया, साथ ही उसके किसी सवाल का जवाब भी नहीं दिया.

कांग्रेस ने पकड़े बुनियादी मुद्दे
राहुल गांधी ने कुछ बुनियादी मुद्दे पकड़े जैसे- देश की खराब होती अर्थव्‍यवस्‍था, रघुवरदास सरकार पर लगे भ्रष्‍टाचार के आरोप, देश में तेजी से बढ़ती महंगाई, खासकर खाने-पीने के सामान और सब्जियों की महंगाई, देश में बढ़ रही बेरोजगारी और 16 साल के बीजेपी राज में झारखंड के गरीबी से न निकल पाने का मुद्दा. कांग्रेस और झामुमो ने स्‍थानीय मुद्दों को करीने से पकड़ा और इसी पतवार के सहारे अपनी नाव को आगे बढ़ाते रहे.जाहिर है गठबंधन के ये मुद्दे समाचारों की सुर्खियां नहीं बटोर सके और भावनाओं को उभारने के मामले में वे हिंदू राष्‍ट्रवाद का मुकाबला तो कतई नहीं कर सके. लेकिन अंतत: वे वोट लाने में जरूर सफल रहे.

अतिआत्मविश्वास में रही भाजपा
विपक्ष ने सिर्फ मुद्दों के चयन में सावधानी नहीं बरती. राजनैतिक समीकरण बनाने में भी सावधानी बरती. झामुमो ने कांग्रेस और आरजेडी के साथ गठबंधन किया. शांतिपूर्वक सीटों का बंटवारा किया और पूरी ताकत से चुनाव में भिड़ गई. उसके उलट भाजपा अतिआत्‍मविश्‍वास में रही. पार्टी ने सबसे पहले तो अपने ही मंत्री सरयू राय की हर उस बात को अनसुना कर दिया जो वे मुख्‍यमंत्री रघुबरदास के खिलाफ उठा रहे थे. राय बराबर सीएम पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगा रहे थे, बल्कि उनकी जगह किसी दूसरे व्‍यक्ति को सीएम का चेहरा बनाना चाहते थे. जब उनकी नहीं सुनी गई तो राय मुख्‍यमंत्री के सामने ही चुनाव में कूद गए और इस तरह चुनाव से पहले चुनाव की सबसे बड़ी खबर बन गए. यही नहीं पार्टी ने अपने कई पुराने दिग्‍गजों की बात सुनने से साफ इनकार कर दिया.

बीजेपी के आत्‍मविश्‍वास का हाल यह था कि पिछली सरकार में उसकी सहयोगी रही आजसू को भी पार्टी ने कोई भाव नहीं दिया. दोनों पार्टियों ने लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन विधानसभा चुनाव में दोनों दलों में गठबंधन नहीं हो सका. यह गठबंधन ऐसे समय पर टूटा जब भाजपा पहले ही हरियाणा और महाराष्‍ट्र में गठबंधन धर्म ढंग से नहीं निभा पाने का खामियाजा भुगत रही थी. अगर आंकड़ों को देखें तो इस चुनाव में बीजेपी को करीब 34 फीसदी और आजसू को करीब 8 फीसदी वोट मिले हैं. दोनों पार्टियों के वोट मिला दिए जाएं, तो ये करीब 44 फीसदी होते हैं. यह वोट बैंक कांग्रेस, झामुमो और राजद के वोट बैंक से करीब 8 फीसदी ज्‍यादा बैठता है. अगर कहीं बीजेपी ने गठबंधन कर लिया होता, तो झारखंड का चुनाव परिणाम कुछ और ही होता, लेकिन पार्टी ने एक छोटी पार्टी की बात मानने का मन नहीं बनाया.

मोदी करिश्मे पर निर्भर हो रही पार्टी
यही नहीं पार्टी अपना सीएम चेहरा बदलने पर भी राजी नहीं हुई, जबकि रघुबरदास को लेकर पार्टी के पास निगेटिव फीडबैक था. पार्टी ने यही जिद महाराष्‍ट्र और हरियाणा में भी दिखाई थी. दरअसल बीजेपी की समस्‍या यह हो गई है कि वह पूरी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्‍मे पर निर्भर होती जा रही है. पार्टी के राज्‍य स्‍तरीय नेताओं को लगता है कि वे चाहे जैसी मनमानी करें, लेकिन अंत में मोदी नाम उन्‍हें चुनाव की वैतरणी पार करा देगा. प्रधानमंत्री यह काम अक्‍सर कर भी देते हैं और लोकसभा में तो वे पारस पत्‍थर ही बन जाते हैं. लेकिन जब विधानसभा का मामला आता है तो वोटर सोचता है कि प्रधानमंत्री आखिर उनके मुख्‍यमंत्री तो नहीं बनने वाले, इसलिए वे मोदी नाम का वोट उस व्‍यक्ति को क्‍यों दें जो सिर्फ उनके नाम पर चल रहा है.

इसलिए पार्टी को अब उसी तरह की सोशल इंजीनियरिंग की जरूरत है जिस तरह की उसने 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखाई थी. इसमें छोटे दलों और स्‍थानीय नेताओं को पूरा मान सम्‍मान देकर और हर इलाके के हिसाब से स्‍थानीय मुद्दों को उठाने के बाद भाजपा ने अपनी विचारधारा के मुद्दे चुनाव में झोंके थे. स्‍थानीय और राष्‍ट्रीय मुद्दों का कॉकटेल पार्टी के लिए कहीं ज्‍यादा काम का साबित होता है. फिलहाल झारखंड में अतिआत्‍मविश्‍वास में बीजेपी चूक कर बैठी है. और इस तरह अब उसके पास देश में तीन ही बड़े राज्‍यों यानी उत्‍तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात में सत्‍ता बची है. उसके पास कुछ छोटे राज्‍य और पूर्वोत्‍तर के लगभग सारे राज्‍य हैं, लेकिन वहां तो नागरिकता कानून का सबसे ज्‍यादा विरोध हो रहा है. जाहिर है इन हालात को देखकर बीजेपी अपने मुद्दों के चयन में नए सिरे से विचार जरूर करेगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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First published: December 23, 2019, 11:38 PM IST
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