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OPINION: भविष्‍य में आतंकी बनने के डर से बच्‍चों को आज डी-रेडिकलाइजेशन कैंपों में डालने से कट्टरता को ही मिलेगा बढ़ावा

जम्मू कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एहतियाती उपाय जारी रखे गए हैं

जम्मू कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एहतियाती उपाय जारी रखे गए हैं

कश्‍मीर (Kashmir) में कट्टरता (Radicalization) वास्‍तविक और जीवंत समस्‍या है. इससे निपटने के लिए बच्‍चों को कैंप में रखने जैसे समाधान इस समस्‍या को घटाने के बजाय बढ़ाएंगे. भविष्‍य में आतंकी (Terrorist) बनने के डर से बच्‍चों को आज कैंप में रखना कट्टरता को बढ़ाएगा.

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    ले. जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुडा

    देश की राजधानी दिल्‍ली में हाल में हुए रायसीना डायलॉग (Raisina Dialogue) के दौरान चीफ ऑफ डिफेंस स्‍टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत (General Bipin Rawat) ने आतंकवाद समेत कई मुद्दों पर अपनी बात रखी. इस दौरान उन्‍होंने कश्‍मीर (Kashmir) में कट्टरता पर भी टिप्‍पणी की थी. उन्‍होंने कहा कि 12-12 साल के बच्‍चों के मन में कट्टरता भरी जा रही है. इनमें कुछ बच्‍चों में कट्टरता (Radicalized) इस कदर भर दी गई है कि उन्‍हें पाकिस्‍तान (Pakistan) की तरह डी-रेडिकलाइजेशन कैंप (De-radicalization Camps) में रखने की जरूरत है. इसके कुछ दिन बाद जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) के डीजीपी ने उनके इस विचार का समर्थन किया.

    9/11 हमले के बाद बदल गई पश्चिमी देशों की सोच
    कट्टरता कोई नया शब्‍द नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में इसने नया रूप ले लिया है. अमेरिका (US) पर 11 सितबर 2001 को हुए आतंकी हमले (9/11 Attack) के बाद पश्चिमी देशों की समावेशी (Inclusive) और एकीकृत समाज (Integrated Society) के सिद्धांत को झटका लगा था. पश्चिमी देशों का मानना था कि एकजुट समाज लोगों के हर वर्ग में राष्‍ट्रवाद की भावना बढ़ता है. मैड्रिड में 2004, लंदन में 2005 और बोस्‍टन में 2013 में हुए आतंकी हमले बाहरी लोगों ने नहीं किए थे. इन हमलों में स्‍थानीय आतंकी (Local Terrorists) ही शामिल थे. जब इसका जवाब ढूंढा गया तो पता चला कि इन हमलों में धार्मिक अंधविश्‍वास के कारण कट्टर और भटके हुए नौजवान शामिल थे. इसके बाद कट्टरता आतंकवाद (Terrorism) का पर्यायवाची बन गया.

    कश्‍मीर की हर समस्‍या की वजह बताई जा रही कट्टरता
    कुछ साल से भारत (India) में भी कश्‍मीर की हर समस्‍या के पीछे कट्टरता को ही सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा है. साथ ही कहा जा रहा है कि डी-रेडिकलाइजेशन ही इसका समाधान हो सकता है. इसमें कोई शक नहीं कि बड़ी संख्‍या में कश्‍मीर युवाओं के मन में कट्टरता भर दी गई है. लेकिन, इस समस्‍या का डी-रेडिकलाइजेशन कैंप जैसे साधारण इलाज नहीं हो सकता है. सबसे पहले हमें कट्टरता को परिभाषित करने की जरूरत है. हिंसक कट्टरता और आतंकवादी गतिविधियों की ओर ले जाने वाली कट्टरता पर यूरोपीय आयोग (European Commission) के विशेषज्ञ समूह की एक रिपोर्ट कहती है कि कट्टरपंथ भ्रमित करने वाला शब्‍द है. विचारधारा (Ideology) के तौर पर कट्टरपंथ स्‍थापित नियमों और नीतियों की वैधता को चुनौती देता है.

    सिर्फ कट्टरपंथ किसी को हिंसा की ओर नहीं ले जा सकता
    रिपोर्ट कहती है कि कट्टरपंथ अकेले किसी को हिंसा (Violence) की ओर नहीं ले जाता है. संयुक्‍त राष्‍ट्र (United Nations) और कुछ देशों ने कट्टरपंथ से निपटने की रणनीति के लिए 'हिंसक अतिवाद को रोकना या उसका मुकाबला करना' जैसे टर्म को अपना लिया है. वैचारिक मतभेद को दबाने से ज्‍यादा अहम है कि हिंसक व्‍यहार को रोका जाए. दो अन्‍य आम गलतफहमियों को दूर करने की जरूरत भी है. पहला यह है कि कट्टरता मुख्य रूप से धार्मिक (Religious) है. जैसे ही हम एक विचारधारा को बाकी सभी से ऊपर रखते हैं तो हम स्‍थानीय मुद्दों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं.

    कट्टरपंथ के आतंकवाद में तब्‍दील होने के हैं कई कारण
    एक्‍सपर्ट ग्रुप की रिपोर्ट में कहा गया है कि कट्टरपंथ के आतंकवाद में तब्‍दील होने के कई कारण हैं. इसका कोई एक मुख्‍य कारण तय करना नामुमकिन है. हर व्‍यक्ति के निजी अनुभव (Personal Experience) के आधार पर कट्टरता पनपने के कारण और रास्‍ते अलग होते हैं. ये शुरुआती कारण 'राजनीतिक हिंसा की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि' हो सकती है. इसके अलावा कुछ लोगों में राज्‍य के अतिदबाव या भेदभाव से भी कट्टरता पनप सकती है. ये सभी कारण किसी व्‍यक्ति को कट्टर होने के लिए माहौल देते हैं. इसके बाद ज्‍यादातर कट्टर लोग हिंसा को ही सबसे आसान रास्‍ता मानने लगते हैं.

    इंटरनेट और कट्टरपंथ में संबंध भी है गलत अवधारणा
    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मौजूदा इस्‍लामी (Islamist Terrorism) या जेहादी आतंकवाद (Jihadist Terrorism) और कट्टरपंथ पश्चिमी यूरोप (Western Europe) में 60 के दशक में वाम-दक्षिण या जातीय राष्‍ट्रवादी आतंकवाद जैसा ही है. दूसरी गलत अवधारणा यह है कि इंटरनेट (Internet) कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाला मुख्‍य कारण है. इसी अवधारणा के आधार पर पांच महीने से जम्‍मू-कश्‍मीर में इंटरनेट सेवाओं पर पाबंदी लगी हुई है. दो महीने पहले इकोनॉमिक टाइम्‍स की रिपोर्ट में एक अधिकारी के हवाले से बताया गया था कि इंटरनेट सेवाएं बंद रहने के कारण आतंकी बनने वाले कश्‍मीरी युवाओं की संख्‍या में कमी आई है.

    बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही कट्टरपंथ में इंटरनेट की भूमिका
    अधिकारी के इस बयान ने सुनिश्चित कर दिया कि इंटरनेट के जरिये कट्टरपंथी सामग्री का प्रचार-प्रसार तेजी से किया जा सकता है. साथ ही यह भी स्‍थापित कर दिया कि आतंकी संगठन इंटरनेट के जरिये आतंकवाद का ऑनलाइन प्रचार करने में सफल हो रहे हैं. हालांकि, कट्टरपंथ में इंटरनेट की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है. जर्मनी (Germany) के 2016 में किए गए एक शोध के मुताबिक, उनके देश से इराक (Iraq) और सीरिया (Syria) के आतंकी संगठनों में शामिल होने के ज्‍यादातर मामलों में इंटरनेट की बड़ी भूमिका नहीं थी. हालांकि, कुछ लोगों के मन में ऑनलाइन सामग्री के जरिये ही कट्टरता बढ़ी और वे इराक व सीरिया चले गए.

    सांप्रदायिक आशंकाएं बढ़ा सकते हैं डी-रेडिकलाइजेशन कैंप
    कट्टरता पूरी तरह से व्‍यक्तिगत प्रक्रिया है. ऐसे में डी-रेडिकलाइजेशन कैंप में एक समुदाय के युवाओं को रखने का विचार न केवल सांप्रदायिक आशंकाएं बढ़ सकता है, बल्कि इससे समाधान मिलने की संभावना भी बहुत कम है. भविष्‍य में आतंकी बनने की आशंका के आधार पर आज बच्‍चों को उठाकर डी-रेडिकलाइजेशन कैंप में डाल देने से कट्टरपंथ को बढ़ावा ही मिलेगा. हमें वाकई में ऐसा प्रयास करना है तो जेलों में बंद आतंकियों पर ये कोशिश आजमाई जानी चाहिए क्‍योंकि वे पहले ही हिंसा के रास्‍ते पर निकल पड़े हैं. अगर हम कश्‍मीरी युवाओं में कट्टरता की समस्‍या से निपटना चाहते हैं तो हमें डी-रेडिकलाइजेशन के बजाय उन्‍हें कट्टरता बढ़ाने वाली गतिविधियों में शामिल होने से रोकना होगा. ये जरूरी नहीं कि इससे उनकी मान्‍याताओं में बदलाव हो जाए, लेकिन इससे उनके व्‍यवहार में बदलाव होगा.
    (लेखक भारतीय सेना की उत्‍तरी कमांड के पूर्व कमांडर हैं. लेखक के ही नेतृत्‍व में भारत ने 2016 में पाकिस्‍तान घुसकर सर्जिकल स्‍ट्राइक को सफलातपूर्वक अंजाम दिया था. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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