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OPINION: डीएसपी दविंदर सिंह की कहानी पारदर्शिता और विश्‍वसनीयता के साथ बतायी जानी क्‍यों है जरूरी

News18Hindi
Updated: January 15, 2020, 8:04 PM IST
OPINION: डीएसपी दविंदर सिंह की कहानी पारदर्शिता और विश्‍वसनीयता के साथ बतायी जानी क्‍यों है जरूरी
कश्‍मीर के डीएसपी दविंदर सिंह को लेकर अभी कई सवाल अनसुलझे हैं. उनसे पूछताछ जारी है.

इस समय देश के ज्‍यादातर लोग कश्‍मीर (Kashmir) के डीएसपी दविंदर सिंह (DSP Davinder Singh) की कहानी को लेकर असमंजस में हैं. आतंकवाद (Terrorism) के खिलाफ जंग में हमेशा वास्‍तविकता वही नहीं होती है, जो हमें दिखती है.

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  • Last Updated: January 15, 2020, 8:04 PM IST
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प्रवीण स्‍वामी

नई दिल्‍ली. मुंबई हमले (Mumbai Attack) के पांच महीने पहले श्रीनगर का एक ऑटो रिक्‍शा ड्राइवर लश्‍कर-ए-तैयबा (LeT) की साजिश के तहत कोलकाता पहुंचा. उसे वहां से 22 प्रीपेड सिम कार्ड खरीदने थे. हमलावरों को मुंबई के बधवार पार्क पहुंचने के बाद इन सिम का इस्‍तेमाल आपस में और पाकिस्‍तान (Pakistan) में बैठे अपने आकाओं से बातचीत करने के लिए करना था. इसके बाद उन्‍हें ये कार्ड नियंत्रण रेखा (LoC) पर छुपाने के लिए लश्‍कर के गुर्गे को सौंपने थे. लेकिन, मुख्‍तार अहमद शेख लश्‍कर के लिए काम नहीं करता था. वह भारतीय जासूस था, जो जम्‍मू-कश्‍मीर पुलिस के लिए काम कर रहा था. मुंबई हमले के दौरान सभी कार्ड एक्टिव हुए और उनसे पाकिस्‍तान में बात की गई. दिल्‍ली में आतंकरोधी केंद्र (Counter Terrorism Center) के कान खड़े हो गए.

मेडल के बजाय शेख को तीन महीने जेल में बिताने पड़े
पुलिस के जांच अधिकारियों को शेख के असली काम की जानकारी नहीं थी या बाकी इंटेलिजेंस ऑपरेशंस (Intelligence Operations) को खतरे में पड़ने से बचाने के लिए उन्‍हें इस बारे में बताया नहीं गया. मेडल से सम्‍मानित किए जाने के बजाय शेख को कोलकाता की जेल (Kolkata Prison) में तीन महीने बिताने पड़े. उससे आतंकवादियों (Terrorists) की तरह व्‍यवहार किया गया. इसके बाद वह जमानत पर चुपचाप जेल से बाहर आ गया. इस समय ज्‍यादातर लोग कश्‍मीर के डीएसपी दविंदर सिंह (DSP Davinder Singh) की कहानी को लेकर असमंजस में हैं. आतंकवाद के खिलाफ जंग में हमेशा वास्‍तविकता वही नहीं होती है, जो हमें दिखती है.

सिंह की कहानी 2016 में घाटी में उठे गुस्‍से से है जुड़ी
सवाल है कि क्‍या वाकई दविंदर सिंह गद्दार है या वह हिजबुल मुजाहिद्दीन (Hizb-ul-Mujahideen) में घुसपैठ करने की खुफिया कोशिश का हिस्‍सा है? डीएसपी दविंदर सिंह की कहानी आतंकी बुरहान वानी (Burhan Wani) को ढेर किए जाने के बाद 2016 में कश्‍मीर में उठे भारत विरोधी गुस्‍से से जुड़ी है. ग्रामीण कश्‍मीर में भारत के खिलाफ गुस्‍सा बहुत बढ़ गया था. कुछ गांवों में 14 अगस्‍त को ही पाकिस्‍तान के झंडे फहरा दिए गए. वहीं, जेहादी समूहों ने परेड का आयोजन भी किया. इसके बाद 2017 की गर्मियों में पुलिस कांस्‍टेबल सईद नवीद मुश्‍ताक बडगाम में चार राइफलों के साथ फरार हो गया. कुछ दिन बाद उसने हिजबुल में शामिल होने की फेसबुक पर घोषणा की.

मुश्‍ताक का आत्‍मसमर्पण कराने में नाकाम रही थी पुलिस शोपियां (Shopian) में पुलिस को परिवार की मदद के बाद भी मुश्‍ताक का आत्‍मसमर्पण (Surrender) कराने में नाकामी मिली. हिजबुल के कुछ प्रमुख आतंकियों के साथ बुरहान वानी का करीबी लतीफ डार (Lateef Dar) 2019 में ढेर कर दिया गया. इसके बाद शोपियां में नई पीढ़ी के नौजवान मुश्‍ताक से प्रभावित होने लगे. इसके बाद पंजाब (Punjab) के फल कारोबारी और राजस्‍थान (Rajasthan) के एक ट्रक ड्राइवर की हत्‍या के बाद पुलिस ने मुश्‍ताक व राहिल मगरे के नाम के पोस्‍टर घाटी में लगाए. उस समय हिजबुल ने कश्‍मीर के सेब कारोबार को ठप करने के लिए आतंक फैला रखा था. पुलिस के मुताबिक, इसी दौरान हिजबुल और दविंदर सिंह के बीच संबंध बनने शुरू हुए.

डीएसपी को देने के लिए मुश्‍ताक के पास कहां से आई रकम
इस सबके बीच यह साफ नहीं है कि मुश्‍ताक जैसे हिजबुल के छोटे से आतंकी के पास दविंदर सिंह को देने के लिए 15 लाख रुपये कहां से आए, क्‍योंकि पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक कोई भी हिजबुल कमांडर अपने पास इतनी बड़ी रकम नहीं रखता है. दविंदर सिंह की गिरफ्तारी से 48 घंटे पहले दिल्‍ली पुलिस की काउंटर टेररिज्‍म यूनिट ने शोपियां में नरवाव गांव से मुश्‍ताक के कथित साथी किफायतुल्‍ला बुखारी और एक नाबालिग को गिरफ्तार किया. किफायतुल्‍ला को पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश (Western UP) से हथियार खरीदने की आशंका की जानकारी मिलने पर गिरफ्तार किया गया. बता दें कि यूपी में बने हथियार आतंकियों के इस्‍तेमाल के लायक नहीं होते हैं. ऐसे में कहा जा रहा है कि उसकी गिरफ्तारी यूपी में मुश्‍ताक का नेटवर्क फैलने के डर के कारण की गई.

आतंकियों को हाईवे पर दविंदर की मदद की नहीं थी जरूरत
यह भी साफ नहीं हुआ है कि दविंदर सिंह ने अकेले ही मुश्‍ताक और उसके साथी को जम्‍मू (Jammu) छोड़कर आने का फैसला किया. श्रीनगर-जम्‍मू हाईवे (Sri Nagar-Jammu Highway) पर मौजूद चेकप्‍वाइंट्स पर तैनात पुलिसकर्मी आतंकियों की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते हैं. ऐसे में आतंकियों को किसी पुलिस अधिकारी की मदद की दरकार भी नहीं थी. सबसे मजेदार बात यह है कि आतंकियों ने मोबाइल फोन पर अपनी आगे की योजना की चर्चा की, जिससे शोपियां के अधिकारियों को मुश्‍ताक को ढूंढने में मदद मिली और वे दविंदर सिंह की कार तक पहुंच पाए. इससे भी बड़ी बात यह है कि डीएसपी दविंदर सिंह ने टेलीफोन नेटवर्क की उच्‍चस्‍तरीय निगरानी (High level Surveillance) की जानकारी होने के बाद भी उन्‍हें ऐसा करने की इजाजत दे दी.

फिलहाल दविंदर सिंह के बारे में राय बनाना होगी जल्‍दबाजी
डीएसपी से पूछताछ करने वाले पुलिस सूत्रों के मुताबिक दविंदर का कहना है कि वह इंटेलिजेंस सर्विसेस के साथ हिजबुल में घुसपैठ करने के लिए काम कर रहे थे. मुंबई हमले के बाद भारतीय जासूस शेख की कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि डीएसपी दविंदर सिंह के बारे में अभी से कोई राय बना लेना जल्‍दबाजी होगी. उनकी पूरी कहानी पारदर्शिता और विश्‍वसनीयता के साथ सामने आने का इंतजार करना चाहिए. जरूरी है कि इस मामले की व्‍यापक जांच हो और फिर सामने आने वाले तथ्‍यों पर गौर करने के बाद उनके बारे में कोई गंभीर टिप्‍पणी की जाए.

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First published: January 15, 2020, 7:08 PM IST
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