ANALYSIS | लोकसभा चुनाव में बीजेपी के ये कदम रहे बेहद खास, वंशवाद को किया साफ़

भारतीय राजनीति में बीजेपी पहली ऐसी पार्टी है, जो परिवारवाद या वंशवाद से नहीं है. जीत के बाद अपने विजय-भाषण में मोदी जब अपने संकल्प को दोहराते हैं कि मैं अपने लिए कभी कुछ नहीं करूंगा, तो अपने को इसी परिवारवाद से अलग करते हैं. यहां ‘अपने लिए’ का अर्थ स्वयं मोदी तो हैं ही, साथ ही इसमें उनका परिवार-वंश भी शामिल है.

News18Hindi
Updated: May 26, 2019, 12:25 PM IST
ANALYSIS | लोकसभा चुनाव में बीजेपी के ये कदम रहे बेहद खास, वंशवाद को किया साफ़
बीजेपी की जीत पर जश्न मनाते कार्यकर्ता
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Updated: May 26, 2019, 12:25 PM IST
(रवि शंकर कपूर)

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की प्रचंड जीत के साथ 17वीं लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election 2019) कई मामलों में ऐतिहासिक माना जाएगा. 48 सालों किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला. 35 साल में बीजेपी का चुनाव में इतना शानदार प्रदर्शन रहा. ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व कौशल पर जनता की पूर्ण आस्था और 2014 के चुनाव के विपरीत एक सकारात्मक वोट है. अन्य चीजों के अलावा इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण संदेश भारतीय राजनीति में एक तरह से परिवारवाद या वंशवाद की राजनीति के अंत की घोषणा भी है.



भारतीय राजनीति में बीजेपी पहली ऐसी पार्टी है, जो परिवारवाद या वंशवाद से नहीं है. जीत के बाद अपने विजय-भाषण में मोदी जब अपने संकल्प को दोहराते हैं कि मैं अपने लिए कभी कुछ नहीं करूंगा, तो अपने को इसी परिवारवाद से अलग करते हैं. यहां ‘अपने लिए’ का अर्थ स्वयं मोदी तो हैं ही, साथ ही इसमें उनका परिवार-वंश भी शामिल है.

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इसलिए जब नरेंद्र मोदी और बीजेपी के अन्य नेता कांग्रेस को नेहरू-गांधी परिवार की पार्टी बताते हैं, तो भारतीय राजनीति में बसी वंशवाद और परिवारवाद पर सवाल उठाते हैं. मौजूदा राजनीति में ये सवाल गलत भी नहीं है.

देशभर में फैला वंशवाद
भारत के संदर्भ में देखें, तो इस परिवारवादी या वंशवादी राजनीति की जनक कांग्रेस पार्टी रही है. कांग्रेस के विरोध में जन्मे दलों में भी इस परिवारवाद के वायरस का संक्रमण हो गया. राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के वर्चस्व के अतिरिक्त बिहार में लालू यादव व रामविलास पासवान का परिवार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव या अजित सिंह का परिवार, कर्नाटक में एचडी देवेगौड़ा का परिवार, आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव- चंद्रबाबू नायडू खानदान, तेलंगाना में के चंद्रशेखर परिवार, तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार, जम्मू कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार, पंजाब में बादल परिवार आदि ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो लोकतंत्र में भी राजतंत्र की याद कराते हैं.
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इसके अलावा ओडिशा में नवीन पटनायक और यहां तक कि बंगाल में ममता बनर्जी, लखनऊ में मायावती के भतीजे परिवारवाद का कारण हैं. इनके यहां पार्टियां एक परिवार प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनी हुई हैं.

सीपीएम-बीजेपी एक समान
वंशवाद के मामले में भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियां ही दो प्रमुख दल ऐसे हैं, जो परिवारवादी राजनीति से अपेक्षाकृत दूर हैं, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी की समस्या यह है कि वह एक विचारधारा की गुलाम है. भारतीय समाज ने अब इसे लगभग नकार दिया है.

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यहां सिर्फ कांग्रेस छोड़कर सभी पार्टियां बीजेपी से छोटी हैं. लेकिन फिर भी बीजेपी ने अपने संगठन में कभी परिवारवाद को हावी नहीं होने दिया. दिलचस्प बात ये हैं कि जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में राष्ट्रीय जनसंघ के रूप में बीजेपी की नींव रखी थी, तब वह भी प्रतिष्ठित परिवार से आते थे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता आशुतोष मुखर्जी तब जाने-माने बैरिस्टर कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे.

बाद में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को कलकत्ता यूनिवर्सिटी के उम्मीदवार के रूप में बंगाल विधान परिषद का सदस्य चुना गया था. लेकिन, उन्होंने बाद में उन्होंने भव्य पुरानी पार्टी छोड़ दी और हिंदुओं के एक प्रवक्ता के रूप में उभरे. इसी बीच वह हिंदू महासभा में भी शामिल हो गए और 1944 में इसके प्रेसिडेंट बने.

नेहरू ने बनाया इंडस्ट्री मिनिस्टर
हालांकि, जवाहर लाल नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अंतरिम सरकार में उद्योग मंत्री बनाया. लेकिन, 6 अप्रैल 1950 में उन्होंने कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. इसके एक साल बाद ही उन्होंने भारतीय जन संघ की स्थापना रखी.

दो दशक तक भारतीय जनसंघ पार्टी विचारक दीनदयाल उपाध्याय और अध्यक्ष बलराज मधोक के प्रभाव में रही. इसके चार दशक अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नाम रहे. फिर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी का दौर शुरू हुआ.


ऐसे बनी पार्टी विद डिफरेंस
बाकी राजनीतिक पार्टियों की तरह भारतीय जनसंघ-बीजेपी में भी कड़ी बहसें हुईं. नेताओं में मतभेद सामने आए. व्यक्तित्व का टकराव हुआ. राजनीतिक चालें चली गईं. इसके बाद भी बीजेपी ने 'पार्टी विद डिफरेंस' की सोच पर चलते हुए अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाबी हासिल की. बीजेपी ने कभी भी परिवारवाद या वंशवाद को फलने-फूलने नहीं दिया. हां, जिन नेताओं के बच्चों में संभावनाएं दिखीं, उन्हें आगे बढ़कर राजनीतिक मंच देने से गुरेज नहीं किया गया. अनुराग ठाकुर और जयंत सिन्हा इसके उदाहरण हैं. हालांकि, ऐसे लोगों को कभी भी पार्टी को संभालने का अधिकार नहीं मिला. जयंत सिन्हा जूनियर मंत्री बने रहे, जबकि अनुराग ठाकुर का अभी मंत्रिपरिषद में प्रवेश करना बाकी है.

बीजेपी ऐसा कैसे कर पाई?
बड़ा सवाल ये है कि बीजेपी आखिर ऐसा कैसे कर पाई? दरअसल, ये सब बीजेपी ने अपनी विचारधारा, आदर्शों के आधार पर किया. आज के दौर पर कहा जाता है कि राजनीति का मतलब सत्ता हासिल करना है, आप कैसे हासिल करते हैं, ये मायने नहीं रखता. लेकिन, बीजेपी इसे गलत साबित करती आई है. आज बीजेपी देश की एकमात्र महत्वपूर्ण पार्टी है जो एक विचारधारा, हिंदू राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के लिए समर्पित है. यह पार्टी किसी खास नेता के लिए नहीं, बल्कि मानवतावाद और हिंदुत्ववाद के सिद्धांतों के प्रति प्रतिबद्ध है, जिसका सपना दीनदयाल उपाध्याय ने देखा था.

तो क्या दूसरी पीढ़ी का राजनीति में आना गलत है?
परिवार की दूसरी पीढ़ी का राजनीति में आना गलत नहीं है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व पर दावा उनके गुण-कौशल के आधार पर हो, न कि जन्मजात अधिकार के रूप में. यह 21वीं सदी के युवाओं और आकांक्षाओं का भारत है जो तकनीकी और वैश्विक रूप में ज्ञान से लैस है. इसलिए उसे जन्म-वंश पर आधारित नेतृत्व अब स्वीकार नहीं है. अमेठी में राहुल गांधी, पाटलिपुत्र सीट से लालू की बेटी मीसा, अनंतनाग से मुफ्ती की बेटी महबूबा, कन्नौज से मुलायम की बहू डिंपल, मुजफ्फरनगर में लोकदल के अजीत और जयंत, झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन, केसीआर की बेटी कविता और चंद्रबाबू नायडू के बेटे नारा लोकेश की चुनावों में हार इसी नए भारत का संकेत है.

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