OPINION: मध्‍य प्रदेश- जनमत और बहुमत के बीच टूटता रिश्‍ता

OPINION: मध्‍य प्रदेश- जनमत और बहुमत के बीच टूटता रिश्‍ता
मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ.

क्‍या अंतत: बहुमत के आधार पर बनने वाली ये सरकारें जनमत का प्रतिनिधित्‍व कर रही हैं. कमलनाथ अगर आज इस्‍तीफा दे रहे हैं और उनके बाद अगला कोई व्‍यक्ति सीएम बनता है, तो उस वोटर के मन पर क्‍या असर पड़ेगा जिसने वोट डाला था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2020, 12:52 PM IST
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करीब सवा साल सरकार चलाने के बाद आखिरकार मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री कमलनाथ (Kamal nath) ने इस्‍तीफा दे दिया. उनके इस इस्‍तीफे की उलटी गिनती उसी दिन शुरू हो गई थी, जब उनके कुछ विधायक गुरुग्राम और कुछ विधायक बेंगलुरु भाग गए थे. उस समय तो दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी जैसे कांग्रेस नेता विधायकों को वापस ले आए थे. लेकिन हफ्ते भर के भीतर कांग्रेस के स्‍तंभ ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने ही पाला बदल दिया और उनके प्रभाव वाले 22 विधायक तीन चार्टर्ड फ्लाइट से बेंगलुरु भाग गए. इन विधायकों ने तुरंत ही इस्‍तीफा भी दे दिया. कांग्रेस लगातार कोशिश करती रही कि इन विधायकों से बात हो सके, उन्‍हें मनाने की कोशिश हो सके. लेकिन बीजेपी शासित कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में कांग्रेस नेताओं को अपने ही विधायकों की हवा तक नहीं लग सकी और बीजेपी नेता भूपेंद्र सिंह उनके इस्‍तीफे विधानसभा अध्‍यक्ष को भी सौंप आए.

उसके बाद अदालत में जो होना चाहिए था, वही हुआ. अदालत नेताओं के मन तो पढ़ सकती है, परिस्थितियों को देख भी सकती है, जरूरत पड़ने पर टीका टिप्‍पणी भी कर सकती है, लेकिन फैसले तो उन्‍हीं हलफनामों पर सुना सकती है जो मुहरबंद होकर उसके पास आते हैं. अगर विधायक कह रहे हैं कि वे अपने मन से पार्टी से दुखी होकर इस्‍तीफा दे रहे हैं तो अदालत के पास इस पर यकीन करने के अलावा कोई चारा नहीं है. कानून ने अपना काम किया. और कानून लगातार अपना काम कर रहा है.

पिछले चार-पांच साल से तो अदालतों को लगातार ही इस तरह का काम करना पड़ रहा है. ताजा राजनैतिक इतिहास में यह इकलौता मामला नहीं है. मध्‍य प्रदेश की सरकार के पास तो सिर्फ बहुमत ही था और वह गिर गई, लेकिन अरुणाचल में जब कांग्रेस की सरकार गिरी तब उसके पास दो तिहाई बहुमत था. रातोंरात अधिकतर विधायक पाला बदल गए. अदालत ने इस पाला बदली को गलत माना और कांग्रेस की सरकार दोबारा बहाल कर दी. लेकिन उसके बाद विधायकों ने फिर वही किया और वह सरकार जाती रही. उत्‍तराखंड में हरीश रावत की सरकार भी कांग्रेस के ही पूर्व मुख्‍यमंत्री विजय बहुगुणा के प्रताप से तकरीबन गिर ही गई थी, लेकिन अदालत के हस्‍तक्षेप से वह बच गई. बचने के बाद भी वह गिर सकती थी, लेकिन तब तक रावत ने अपना राजनैतिक प्रबंधन कर लिया था.



एक दिन नीतीश ने आरजेडी को तलाक दिया और



मणिपुर, गोवा और दूसरे राज्‍यों में भी यह बात देखी जा चुकी है. बिहार में भी यह तमाशा देखा जा चुका है. वहां नीतीश कुमार और लालू यादव की पार्टी ने कांग्रेस को गठबंधन में लेकर साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक दिन नीतीश ने आरजेडी को तलाक दिया और कुछ मिनट बाद बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार की घोषणा करके फिर मुख्‍यमंत्री बन गए.

कर्नाटक में चुनाव के तुरंत बाद बीजेपी ने येदियुरप्‍पा की सरकार बनाई जो दो तीन दिन बहुमत की तलाश में रही और न मिलने पर गिर गई. उसके बाद जेडीएस और कांग्रेस ने सरकार बनाई. यह सरकार करीब साल भर चली और उसके बाद वहां भी कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों ने इस्‍तीफे दे दिए. एचडी कुमारस्‍वामी की सरकार गिर गई और येदियुरप्‍पा दोबारा मुख्‍यमंत्री बन गए.

महाराष्‍ट्र में भाजपा और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा. जनता ने दोनों दलों को मिलाकर अच्‍छा खासा बहुमत दिया लेकिन दोनों पार्टियों की आपस में नहीं बनी. शुरू में बीजेपी के देवेंद्र फणनवीस की सरकार बनी और उसमें राष्‍ट्रवादी कांग्रेस के अजीत पवार डिप्‍टी सीएम बने. उन्‍होंने कहा कि उनके साथ पूरी पार्टी है. दो दिन तक विधायकों को लेकर उहापोह की स्थिति रही. अंत में कोर्ट ने फ्लोट टेस्‍ट का ऑर्डर दिया और अजीत फिर पाला बदल गए. सरकार गिर गई और फिर शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई. विधायकी का चुनाव न लड़ने वाले उद्धव ठाकरे मुख्‍यमंत्री बन गए और अजीत पवार उनके उप मुख्‍यमंत्री.

यह सब नजीरें क्‍यों गिनाई गई हैं. इनमें नया कुछ नहीं है. यह जोड़ तोड़ से सरकारों के बनने या गिरने का घटनाक्रम है. इसमें नैतिक अनैतिक का प्रश्‍न तलाशने की कोशिश इस लेख में नहीं की जा रही है. इसमें यह भी कोशिश नहीं की जा रही है कि क्‍या यह सरकारें संविधान की मूल भावना के साथ चल या गिर रही हैं.

यहां सीधा सवाल यह उठ रहा है कि क्‍या अंतत: बहुमत के आधार पर बनने वाली ये सरकारें जनमत का प्रतिनिधित्‍व कर रही हैं. कमलनाथ अगर आज इस्‍तीफा दे रहे हैं और उनके बाद अगला कोई व्‍यक्ति सीएम बनता है, तो उस वोटर के मन पर क्‍या असर पड़ेगा जिसने वोट डाला था. उसने तो एक ही बार 2018 के अंत में वोट डाला था. जाहिर है कि उसने एक ही मत तय किया होगा. लेकिन साल भर पहले उसके मत की व्‍याख्‍या कांग्रेस के बहुमत के तौर पर हुई और अब संभवत: भाजपा के बहुमत के तौर पर होगी.

अब विधानसभा का बहुमत जनमत के खिलाफ है
यही हाल कर्नाटक, मणिपुर और गोवा में भी हुआ है. अगर महाराष्‍ट्र की बात करें तो जनता ने बहुमत भाजपा और शिवसेना के गठबंधन को दिया था, लेकिन भाजपा विपक्ष में बैठी है और उसके विरोधी कांग्रेस, एनसीपी हारकर भी शिवसेना के साथ सरकार चला रहे हैं. क्‍या महाराष्‍ट्र विधानसभा का मौजूदा बहुमत जनमत की नुमाइंदगी कर रहा है. यही हाल बिहार का है, वोट नीतीश और लालू को बीजेपी के खिलाफ मिला, लेकिन अब विधानसभा का बहुमत जनमत के खिलाफ है.

अगर विधायकों की खरीद फरोख्‍त जैसे विषय को पीछे छोड़ दें क्‍योंकि दिन की रोशनी की तरह साफ दिखने के बाद भी उसे अदालत में साबित करना नामुमकिन ही है, तो भी इतना तो दिखता ही है कि एक वोट से दो बार सरकार बनने की मूल मंशा न तो भारतीय संविधान की है और न भारतीय जनता की. जो विधायक पाला बदलते हैं या इस्‍तीफा देते हैं या क्रॉस वोटिंग करते हैं, क्‍या उन्‍हें ऐसा करने का अधिकार है. वे कहने को एक व्‍यक्ति हैं, लेकिन असल में वे उन पांच-सात लाख लोगों के नुमाइंदे हैं, जिन्‍होंने उन्‍हें चुनकर भेजा है. अगर कोई विधायक बीच कार्यकाल में इस्‍तीफा देता है तो वह उसका इस्‍तीफा भर नहीं है, उसके पक्ष और विपक्ष में पड़े लाखों वोटरों के वोट का भी इस्‍तीफा है. इस तरह के मनमाने फैसले लोकतंत्र में भरोसे को कम करने वाले हैं.

निर्वाचित माननीय कोई सम्‍मानजनक तरीका निकाल लें
जाहिर है कि कोई राजनैतिक दल या नागरिक नहीं चाहेगा कि लोकतंत्र में लोगों का भरोसा कम हो. यहां से किसी नए कानून का रास्‍ता खुलेगा जो जनमत और बहुमत के बीच पैदा हो रही खाई को पाटने का काम करेगा. ऐसा पहले भी होता रहा है. पहले तो विधायक सांसद अपने आप स्‍वतंत्र होते थे. उनकी स्‍वच्‍छंदता देखते हुए पहले उन्‍हें व्हिप से बांधा गया. उसके बाद दल बदल कानून लाया गया. जब इससे बात न रुकी तो दलबदल के लिए आवश्‍यक संख्‍या को एक तिहाई से बढ़ाकर दो तिहाई कर दिया गया. इस कानून के बाद दल बदल करना बहुत कठिन हो गया तो विधायकों के थोक इस्‍तीफे कराने की पहल शुरू हुई.

अब थोक के भाव इस्‍तीफों को रोकने के लिए भी कोई कानून आएगा. और कहीं कानून नहीं आया तो सत्‍ता की जो लालसा पहले विधायकों को पाला बदलवाती थी और अब इस्‍तीफे दिलाती है, वह आगे जाकर कुछ और बड़ा और विकृत काम भी कर सकती है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता. इसलिए बेहतर यही होगा कि अपनी और अपने लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए हमारे निर्वाचित माननीय कोई सम्‍मानजनक तरीका निकाल लें.

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First published: March 20, 2020, 12:36 PM IST
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