OPINION: अब ये मोदी-शाह का कश्मीर है, फिज़ा बदलने वाली है

पांच साल पहले मोदी ने जो वादा किया था, और जिस आर्टिकल 370 की समाप्ति के लिए अठारह साल पहले उन्होंने यात्रा की थी, उसको यथार्थ के धरातल पर उतार ही दिया

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 4:14 PM IST
OPINION: अब ये मोदी-शाह का कश्मीर है, फिज़ा बदलने वाली है
केंद्रशासित प्रदेशों की संख्‍या बढ़ी.
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor
Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: August 8, 2019, 4:14 PM IST
जो अटकलें थीं, वो अब सच्चाई में तब्दील हो गई हैं. जो वादे थे, वो अब यथार्थ हैं. जी हां, संसद के उच्च सदन, राज्य सभा में शोर-शराबे के बीच जम्मू-कश्मीर के भविष्य से जुड़ी हुई बड़ी बातें, संकल्प और विधेयकों के जरिये जब गृह मंत्री अमित शाह ने करनी शुरु कीं, तो जल्दी भरोसा नहीं हो रहा था कि ये वाकई होने जा रहा है. आखिरकार, पिछले छह दशक से आर्टिकल 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर का निर्माण संघ परिवार और बीजेपी के एजेंडे में रहा है. लेकिन क्या ये एजेंडा पूरा होगा, या फिर वादे वादे ही रहेंगे, कहना मुश्किल था. लेकिन नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति में असंभव को संभव करते रहे हैं और आज के दिन उन्होंने अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी अमित शाह के जरिये देश की संसद में ये कर भी दिया, आर्टिकल 370 के उन प्रावधानों को दफन कर, जिसके जरिये जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल रहा है.

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इस फैसले के साथ ही अमित शाह, जो केंद्रीय गृह मंत्री की कुर्सी पर विराजमान हैं और जो देश के पहले गृह मंत्री सरदार पटेल से प्रेरणा पाते हैं, वो भारतीय इतिहास में ऐसे गृह मंत्री के तौर पर दर्ज हो गए हैं, जिसने एक ऐसे प्रदेश का नक्शा बदलने की शुरुआत कर दी, जो आजादी के समय से ही भारत के लिए सबसे बड़े सिरदर्द का कारण रहा है. और ये सिरदर्द भी क्यों, इसके लिए बीजेपी, संघ परिवार, मोदी और शाह, उन जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हैं, जो आर्टिकल 370 के साथ जम्मू-कश्मीर को न सिर्फ विशेष दर्जा देने को तैयार हो गए, बल्कि खुद आ बैल मुझे मार के तौर पर कश्मीर के विलय के मसले को सुरक्षा परिषद में भी ले गए, जिसके बारे में खुद सरदार पटेल की ये टिप्पणी थी कि जिले स्तर पर प्रैक्टिस करने वाला कोई वकील भी इस तरह की गलती नहीं करेगा.

नेहरू की गलती से निजात पाने में लगा सात दशक से ज्यादा समय

नेहरू की दोनों गलतियों से निजात पाने में देश को सात दशक से भी अधिक का समय लग गया है. आजादी के समय भारत में साढ़े पांच सौ से भी अधिक देसी रजवाड़ों का विलय कर भारत को मौजूदा भौगोलिक स्वरूप देने वाले पटेल से कश्मीर का मसला नेहरू ने छीन लिया और खुद इसे डील किया. परिणाम ये हुआ कि माउंटबेटेन के दबाव और शेख अब्दुल्ला के साथ अपनी दोस्ती निभाने के चक्कर में नेहरू जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दे बैठे. सरदार ने अपने समय में इसका विरोध भी किया, लेकिन सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत के तहत आखिरकार नेहरू की जिद को स्वीकार कर लिया. खुद नेहरू ने भी उस समय आश्वासन दिया था कि आर्टिकल 370 अस्थाई प्रावधान है और ये घिसते-घिसते घिस जाएगा.




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विशेष प्रावधान की वजह से ही आजादी के तुरंत बाद कश्मीर मामले में मुश्किलें भी शुरू हुईं और शेख अब्दुल्ला इसे अपनी व्यक्तिगत जागीर समझने लगे. कश्मीर का अलग झंडा रखा गया, अलग संविधान रखा गया, राज्यपाल भी सदर-ए-रियासत कहे गए तो मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा गया. शेख दिल्ली में नेहरू की भाषा बोलते, कश्मीर में अलगाववाद की, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान का एजेंडा आगे बढ़ाते, जिसके तहत कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पर जोर दिया जा रहा था.


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संघ परिवार ने आजादी के बाद ही शुरू कर दिया था विरोध
आजादी के बाद से ही संघ परिवार ने इस परिस्थिति का विरोध किया. नेहरू मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री रहे श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर नीति के विरोध में ही मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और एक देश में दो विधान, दो निशान नहीं चलेगा, नहीं चलेगा, इस नारे के साथ आंदोलन शुरू किया. इसी कोशिश में हिरासत में लिए गए मुखर्जी की आखिरकार श्रीनगर में मौत हो गई.

मुखर्जी की मौत ही जनसंघ और संघ परिवार के लिए आर्टिकल 370 को खत्म करने के लिए अभियान चलाने के संकल्प को और मजबूत कर गई. यही वजह रही कि जनसंघ से आखिरकार 1980 में बीजेपी की स्थापना हो जाने के बाद भी आर्टिकल 370 की समाप्ति, समान नागरिक संहिता और अयोध्या में रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण मुद्दे की तरह बीजेपी की राजनीति के केंद्र में रहा.

मोदी के लिए बेहद अहम रहा है कश्मीर का मुद्दा
खुद मोदी के लिए कश्मीर का मुद्दा दिल के काफी करीब रहा. कम ही लोगों को आज ध्यान में होगा कि बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष के तौर पर मुरली मनोहर जोशी ने 1991 में कन्याकुमारी से लेकर श्रीनगर के लाल चौक तक जो एकता यात्रा की, उसका प्रारूप खुद मोदी ने तैयार किया था. इस यात्रा में उनके सबसे खास सहयोगी रहे. आतंकी हमले की चुनौतियों के बीच श्रीनगर के लाल चौक पर जाकर मोदी ने झंडा फहराया भी.

2014 लोकसभा चुनावों के पहले जब मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे, तब भी पठानकोट में उस जगह मोदी ने जाकर सभा की थी, जहां के नजदीक बने पुल पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को गिरफ्तार किया गया था और जहां उनकी याद में एक संग्रहालय भी बना है.

मोदी ने उस सभा में मुखर्जी के सपने को पूरा करने की बात की थी. पांच साल पहले मोदी ने जो वादा किया था, और जिस आर्टिकल 370 की समाप्ति के लिए अठारह साल पहले उन्होंने यात्रा की थी, उस वादे को यथार्थ की धरातल पर उन्होंने आज आखिरकार उतार ही दिया.

सवाल ये उठता है कि इसके बाद क्या होगा. देश की सियासत के लिए ये बड़ा टर्निंग पॉइंट तो है ही, अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भी इसके बड़े संकेत जाएंगे. मोदी निर्णायक हैं और बड़े फैसले ले सकते हैं. उनकी ये छवि इस फैसले के बाद और मजबूत होने जा रही है, देश के बाहर भी और देश के अंदर भी. अमित शाह की छाप भी जनमानस में इससे और मजबूत होगी और मोदी के राजनीतिक वारिस के तौर पर उन्हें स्वाभाविक तौर पर देखा जाएगा.


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नज़रबंद हुए पीडीपी और एनसी नेता


मोदी इतिहास में ऐसे शख्स बन गए हैं, जो लीक से हटकर बड़े फैसले करते हैं
जहां तक विपक्ष का सवाल है, स्टीरियोटाइप प्रतिक्रिया देकर वो अपनी मुसीबत बढ़ाने ही वाला है. देश के ज्यादातर मतदाता आर्टिकल 370 की समाप्ति के मामले में मोदी की सोच के करीब हैं और उन्हें विपक्ष की आलोचना स्वीकार नहीं होगी इस मामले में. जहां तक खुद संघ परिवार और बीजेपी का सवाल है, उन पर जो ये आरोप लगता रहा है कि वो अपने कोर मुद्दे की चर्चा करते तो हैं, लेकिन पूरा नहीं करते, उस आरोप से भी उन्हें मुक्ति मिल जाएगी और आगामी चुनावों में बड़ी ताकत के साथ बीजेपी लोगों के बीच जाएगी. जहां तक मोदी का सवाल है, वो देश के इतिहास में एक ऐसी शख्सियत के तौर पर स्थापित हो गए हैं, जो लीक से अलग हटकर बड़े फैसले लेने में चूकते नहीं हैं.

जम्मू-कश्मीर से हटाया गया आर्टिकल 35A, जानें घाटी में इससे क्या बदलेगा?

अब कैसी होगी जम्मू-कश्मीर की तस्वीर?
सवाल ये उठता है कि आखिर उस जम्मू-कश्मीर में क्या होगा, जहां से संबंधित प्रावधान रहा है आर्टिकल 370 या फिर आर्टिकल 35ए. लद्दाख तो अलग केंद्र शासित प्रदेश बन रहा है और वहां के लोग पहले से ही मानते रहे हैं कि कश्मीर उनकी उपेक्षा करता रहा है. इसलिए उनका विकास नहीं हुआ. केंद्र शासित प्रदेश के तौर पर लद्दाख के विकास की गति तेज हो सकती है. जहां तक जम्मू-कश्मीर के नए केंद्र शासित प्रदेश के तौर पर आने का सवाल है, नई परिस्थिति में फिर से सीमांकन भी होगा. सियासी तौर पर इससे जम्मू का राजनीतिक रसूख बढ़ जाएगा, क्योंकि आबादी और इलाका दोनों जम्मू का कश्मीर से बड़ा है. जम्मू के लोग मानते भी रहे हैं कि राज्य में शासन चलाने वाले कश्मीर के नेता जम्मू के साथ बेईमानी करते रहे हैं.

आर्टिकल 370 को हटाने की सबसे अधिक मांग राज्य के अंदर जम्मू के लोग ही करते रहे हैं, ऐसे में उनकी खुशी स्वाभाविक है. वो लोग भी खुश हो सकते हैं, जिनकी आबादी डेढ़ लाख से अधिक है, जो 1947 में बंटवारे के समय भारत तो आ गए, लेकिन आज तक राज्य के स्थाई नागरिक नहीं बन पाए, जिसकी वजह से न तो वे जमीन खरीद सकते हैं और न ही सरकारी नौकरियां पा सकते हैं. उनकी परिस्थिति अब बदल जाएगी, उनके लिए अच्छे दिनों की शुरुआत है. जहां तक कश्मीर घाटी का सवाल है,आम कश्मीरी,जो हिंसा में यकीन नहीं करता, उस तक मोदी सरकार सीधे पंचायती राज योजना के तहत विकास के कार्यों का लाभ सीधे पहुंचाएगी.


KASHMIR TENSION
नेहरू की गलती से निजात पाने में लगा सात दशक से ज्यादा समय


इस ऐतिहासिक फैसले से कोई दुखी होगा, तो वो होंगे मुफ्ती, अब्दुल्ला परिवार और साथ में हुर्रियत की जमात, जो पाकिस्तानी रुपयों पर आज तक पलती आ रही है या फिर वो बिगड़ैल युवा, जो अपने पाकिस्तानी आकाओं के चक्कर में जेहाद कर जन्नत पाने की आकांक्षा रखते हैं. मोदी सरकार ऐसे युवाओं को वैसे भी तेजी से वहां भेज रही हैं, जहां जाकर उन्हें हूरें मिलने का सब्जबाग उनके आतंकी आका दिखाते आ रहे हैं. आर्टिकल 370 को दफन करने का फैसला संसद में सार्वजनिक करने के पहले मोदी सरकार ने मुकम्मल तैयारी भी कर ली है, अपने वीर जवानों के साथ किसी भी किस्म की गड़बड़ी से निबटने के लिए. देश के ज्यादातर लोग जश्न की तैयारी कर रहे हैं, जिनके लिए जम्मू-कश्मीर पूरी तरह से उनका अपना है, कोई विशेष नहीं है, जहां अलग कानून था शेष भारत से दूरी का अहसास कराने के लिए.
First published: August 5, 2019, 1:47 PM IST
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