OPINION: क्या अरविंद केजरीवाल ने कर ली PM मोदी से सुलह?

राजनीतिक गलियारों में ऐसी भी चर्चा है कि पीएम मोदी हाल के दिनों में अरविंद केजरीवाल के प्रति कुछ विनम्र हुए हैं. वहीं, विधानसभा चुनाव के करीब आते-आते मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी बदले-बदले से नज़र आ रहे हैं.

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Updated: July 16, 2019, 12:22 PM IST
OPINION: क्या अरविंद केजरीवाल ने कर ली PM मोदी से सुलह?
बीते दिनों दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल अपने डिप्टी मनीष सिसोदिया के साथ पीएम आवास पहुंचे
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Updated: July 16, 2019, 12:22 PM IST
(आशुतोष)

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच राजनीतिक सुलह हो गई है? राजनीतिक गलियारों में इन दिनों ये एक बड़ा सवाल है, जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है. मोदी-केजरीवाल को लेकर 'सुलह' और 'दोस्ती' की चर्चा हाल के दिनों में दोनों की एक साथ ली गई तस्वीर से भी हो रही है.

नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद बीते दिनों दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल अपने डिप्टी मनीष सिसोदिया के साथ पीएम आवास पहुंचे. मोदी के साथ केजरीवाल की ये मुलाकात वैसे तो 10 मिनट के लिए तय हुई थी और इसे औपचारिक मुलाकात बताया जा रहा था. लेकिन, जब दोनों मिले तो करीब आधे घंटे तक बात की. राजनीतिक गलियारों में ऐसी भी चर्चा है कि पीएम मोदी हाल के दिनों में अरविंद केजरीवाल के प्रति कुछ विनम्र हुए हैं. केजरीवाल 2014 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के खिलाफ वाराणसी से खड़े हुए थे.

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वहीं, विधानसभा चुनाव के करीब आते-आते मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी बदले-बदले से नज़र आ रहे हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि वह दिल्ली की कानून-व्यवस्था में सुधार से लेकर पानी समेत विकास कार्यों की योजनाओं को पूरा करने के लिए केंद्र के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं. केजरीवाल की कोशिश है कि दिल्ली की भलाई के कामों में केंद्र और दिल्ली सरकार का टकराव कोई अड़चन न बनें.

खुद केजरीवाल ने दिए संकेत
मोदी के साथ हुई 'सुलह' का सबसे बड़ा संकेत खुद केजरीवाल ने दिया है. हाल के दिनों में उनके भाषणों पर नज़र डाली जाए, तो हम पाएंगे कि केजरीवाल ने अपने भाषणों में कहीं भी पीएम मोदी के खिलाफ कुछ नहीं कहा. आजकल तो वह केंद्र सरकार की आलोचना करने से भी बच रहे हैं. जबकि, चुनाव परिणाम आने के पहले तक केजरीवाल पीएम मोदी और केंद्र को किसी न किसी मुद्दे को लेकर घेरने की कोशिश करते रहे.
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अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया


क्या पीएमओ से मिले थे निर्देश?
ऐसा भी कहा जा रहा है कि इस 'सुलह' के बाद केंद्र सरकार भी दिल्ली सरकार के कामकाज पर बाधा नहीं डाल रही है. जबकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में ऐसा नहीं होता था. तब एनडीए सरकार के मंत्री किसी न किसी बात पर केजरीवाल सरकार के कामकाज में दखल देते थे. केंद्रीय मंत्री आम आदमी पार्टी के नेताओं और उनके प्रतिनिधियों से मीटिंग टाल दिया करते थे.

निजी बातचीत में बीजेपी नेताओं ने ये स्वीकार भी किया है कि उन्हें पीएमओ से निर्देश था कि आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार के साथ किसी तरह का सहयोग न किया जाए. कुछ वरिष्ठ नेताओं का ये भी कहना है कि वो आप नेताओं की मदद करना चाहते हैं, लेकिन ऊपर से आदेश है, लिहाजा कुछ नहीं कर सकते.


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अगर ऐसा था, तो अब क्या बदल गया?
हाल के दिनों में केजरीवाल सरकार के प्रति मोदी सरकार का रवैया बदला है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पीएम मोदी बदल गए हैं? या फिर अरविंद केजरीवाल ने ही मौजूदा राजनीतिक हालात से समझौता कर लिया है? मेरी समझ में ये दोनों स्थितियों का मिश्रित रूप है.

अतीत की बात करें, तो केजरीवाल के मोदी के साथ कभी अच्छे रिश्ते नहीं रहे. राजनीति में अरविंद केजरीवाल की एंट्री साल 2013 में जनलोकपाल आंदोलन के बाद हुई. आम आदमी पार्टी बनाने से पहले केजरीवाल सिविल राइट्स एक्टिविस्ट के तौर पर जाने जाते थे. समाजसेवी अन्ना हजारे और केजरीवाल के नेतृत्व में 2013 में हुई भ्रष्टाचार मुक्त आंदोलन ने मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस पार्टी को हिला कर रख दिया था.

शुरुआत दिल्ली में, नजरें देश पर
इसी दौरान नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री चेहरे के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में एंट्री की कोशिश कर रहे थे. मोदी की पहली प्राथमिकता गुजरात चुनाव में जीत हासिल करना था, जो कि उन्होंने दिसंबर 2012 में हासिल कर भी लिया था. अब मोदी राष्ट्रीय राजनीति की तरफ रुख कर चुके थे, तभी अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी बनाई. बेशक केजरीवाल ने इसकी शुरुआत दिल्ली से की, लेकिन हर कोई उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं से वाकिफ था.

अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया


मोदी को थी ये चिंता!
शुरुआत में तो आम आदमी पार्टी को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. लेकिन जब दिल्ली चुनाव में इस पार्टी ने 28 सीटें जीत लीं, तो केजरीवाल एक बड़े और दूरदर्शी नेता के रूप में पहचाने जाने लगे. दिल्ली में ये सब 2014 के लोकसभा चुनाव के कुछ महीने पहले हुआ था. एक बीजेपी नेता ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि उस वक्त मोदी कुछ परेशान हो गए थे. उनकी चिंता भी स्वभाविक थी. मोदी जानते थे कि अगर केजरीवाल ने बिना राजनीतिक बैकग्राउंड के दिल्ली में जादू कर दिखाया, तो वह राष्ट्रीय राजनीति में उनके संभावनाओं को भी प्रभावित करने की माद्दा रखते हैं.

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फिर केजरीवाल से हुई ये बड़ी गलती
मोदी को इस बात की भी चिंता थी कि अगर आम आदमी पार्टी को बढ़ावा मिला, तो वह लोकसभा चुनाव में बीजेपी की सीटों को प्रभावित कर सकती है. जब सारा देश केजरीवाल की ओर उम्मीद से देख रहा था, तभी उन्होंने सबसे बड़ी राजनीतिक गलती कर दी. वो गलती थी उनका बिना किसी तर्कसंगत कारणों के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना. बीजेपी ने भी इसे खूब भुनाया और केजरीवाल पर 'भगोड़ा' होने का लेवल सा लग गया.

कुछ दिनों बाद केजरीवाल ने दूसरी बड़ी गलती की. उन्होंने वाराणसी से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया. यह वह समय था जब उन्हें मोदी के साथ-साथ वैकल्पिक राजनीति के विकल्प के रूप में देखा गया था. लोग कहने लगे थे कि केजरीवाल बहुत महत्वाकांक्षी हैं. वह सीएम नहीं बने रहना चाहते, बल्कि पीएम बनना चाहते हैं. वहीं, केजरीवाल के बारे में कुछ राजनीतिक पंडितों का मानना था कि वह या तो बेहद मासूम हैं या फिर अधीर और अपरिपक्व.


मैं कह सकता हूं कि चुनाव में जितनी बड़ी हार केजरीवाल को मिली, उन्हें उससे कहीं ज्यादा कीमत अपनी इन दो गलतियों की चुकानी पड़ी. इसमें केजरीवा के मंत्रियों को भ्रष्टाचार और अन्य संगीन आरोपों में फंसना, केजरीवाल के ऑफिसों में छापा पड़ना भी शामिल है.

पीएम मोदी से हाथ मिलाते केजरीवाल


एलजी के साथ विवाद ने बाकी खेल बिगाड़ा
खैर, केजरीवाल दोबारा दिल्ली की सत्ता में आए और फिर शुरू हुई उपराज्यपाल के साथ उनकी अधिकारों की लड़ाई. केजरीवाल के एलजी नजीब जंग और फिर अनिल बैजल के साथ मदभेद कोर्ट तक पहुंचे. दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी के साथ हुआ विवाद भी चर्चा में रहा. इसी दौरान आम आदमी पार्टी और इसके नेताओं को इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का नोटिस आने लगा. आए दिन आप के नेता किसी न किसी माममें में मीडिया में आने लगे.

इसके बाद केजरीवाल जो भी करते, मामला उलटा पड़ जाता. फिर चाहे वो पंजाब चुनाव हो या फिर एमसीडी इलेक्शन. इधर, अन्ना हजारे से भी दूरी बढ़ चुकी थी. लोगों को अब ये समझ आ गया था कि आम आदमी पार्टी बाकी राजनीतिक पार्टियों जैसी ही है, और केजरीवाल बाकी नेताओं की तरह ही महात्वाकांक्षी हैं. इसके बाद आम लोगों की इस आम आदमी पार्टी में कोई खास रूचि नहीं रही.


हालांकि, इतने नुकसान के बाद केजरीवाल ने खुद को संभालना सीखा है. उन्होंने अपनी नीतियां बदली हैं. लड़ने के हथियार भी दुरुस्त किए हैं. केजरीवाल को समझ आ गया है कि सत्ता में रहना है तो मोदी सरकार से दोस्ती करके रखनी होगी. वहीं, मोदी भी और शक्तिशाली हुए हैं, ऐसे में उन्हें अब केजरीवाल से लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं हैं. राजनीतिक गलियारों में अब चर्चा है कि केजरीवाल-मोदी अब विरोधी नहीं रहे, बल्कि सहयोगी बन चुके हैं.

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First published: July 16, 2019, 10:42 AM IST
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