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OPINION- अयोध्या पर आए फैसले से आया फासला पाटने का वक्त

News18Hindi
Updated: November 10, 2019, 12:11 PM IST
OPINION- अयोध्या पर आए फैसले से आया फासला पाटने का वक्त
अयोध्या का फैसला बताता है कि आज के दिन का संदेश जोड़ने का है, जुड़ने का है और मिलकर जीने का है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला हमारे लिए एक नया सवेरा लेकर आया है, इस विवाद का भले ही कई पीढ़ियों पर असर पड़ा हो, लेकिन इस फैसले के बाद हमें यह संकल्प करना होगा कि अब नई पीढ़ी नए सिरे से 'न्यू इंडिया' के निर्माण में जुटेगी, आइये हम नए निर्माण में जुटें.

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  • Last Updated: November 10, 2019, 12:11 PM IST
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अनुराग अन्वेषी
अयोध्या विवाद को अब राम-राम किया जा चुका है. देश के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जिस सहिष्णुता के साथ स्वीकार किया, वही भारतीय समाज की मूल आत्मा है. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की 2.77 एकड़ विवादित जमीन पर रामलला विराजमान का हक माना है, जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 जजों के विशेष पीठ ने सर्वसम्मति से यह फैसला सुनाया.

विवादित जमीन पर रामलला का हक बताते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने का भी आदेश दिया. इस ट्रस्ट के पास ही मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी होगी. कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को भी अयोध्या में जमीन देने का आदेश दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही किसी उचित जगह मस्जिद निर्माण के लिए 5 एकड़ जगह दी जाए.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि पूरा देश चाहता था कि इस मामले में हर रोज सुनवाई हो और अब दशकों तक चली इस न्याय प्रक्रिया का समापन हुआ है. प्रधानमंत्री ने कहा 'विविधता में एकता का मंत्र आज पूर्णता के साथ खिला हुआ नजर आता है.'


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, '9 नवंबर ही वो दिन था जब बर्लिन की दीवार गिरी थी और दो धाराएं साथ आई थीं. आज ही करतारपुर कॉरिडोर की शुरुआत हुई है जिसमें भारत और पाकिस्तान की भूमिका है. 9 नवंबर को ही अयोध्या का फैसला आया है जो बताता है कि आज के दिन का संदेश जोड़ने का है, जुड़ने का है और मिलकर जीने का है. आज जिसके मन में भी कटुता रही हो उसे तिलांजलि देने का दिन है.'

बर्लिन की दीवार 13 अगस्त 1961 को बनाई गई थी.


याद दिलाने की जरूरत है कि बर्लिन की दीवार को गिरे अब तीस साल बीत गए. बर्लिन की दीवार 13 अगस्त 1961 में बनाई गई थी. तब पूर्वी जर्मनी का साम्यवाद पूंजीवाद के साथ दौड़ रहा था. पूर्वी जर्मनी प्रतिस्पर्धा में तो था, लेकिन हर रोज वह थक रहा था. रोज उसकी हिमोग्लोबिन घटती जा रही थी. पढ़े-लिखे लोग पूर्वी जर्मनी छोड़कर पश्चिम की ओर पलायन कर रहे थे. जरूरी कामगारों की कमी हो रही थी. सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी लोगों के इस पलायन को रोकने में नाकाम थी. तब उसे दीवार बनाने का उपाय सूझा. बर्लिन की दीवार खड़ी कर दी गई. लेकिन इस दीवार के बनने के बाद सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी को पता चल गया कि बाड़ों के पीछे लोगों को बंद कर देशभक्ति नहीं जगाई जा सकती. सीमाओं की रक्षा लोगों को दबाकर नहीं की जा सकती और इस तरह की सख्ती से सरकारें नहीं बचतीं.
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दीवार के बनने के लगभग 28 साल बाद 1989 आते-आते लोग बाड़ों को तोड़ने और आजाद होने के लिए इतने बेताब हो चुके थे कि वे सड़कों पर उतरने लगे. 1985 के आसपास साम्यवादी व्यवस्था की चुनौतियां सामने आने लगीं. आईटी तकनीक विकसित हो रही थी, उत्पादन के तरीके बदल रहे थे, लोगों की जरूरतें और मांगें बदल रही थीं. साम्यवादी अर्थव्यवस्था उन्हें पूरा करने में असमर्थ थी.


जीडीआर यानी पूर्वी जर्मनी के नेता वक्त की मांग समझ नहीं पा रहे थे और पार्टी और समाज के अंदर दरारें गहराती जा रही थीं. बर्लिन जीडीआर की राजधानी था. रोशनी से जगमगाती सड़कें, खाने-पीने के सामानों से भरी दुकानें और फैशनेबल कपड़ों से भरे सुपर मार्केट- बर्लिन को किसी दूसरे यूरोपीय शहर जैसा बनाते थे. हकीकत का पता बर्लिन से बाहर निकलने पर होता था. चाहे लीपजिग हो या ड्रेसडेन, वहां के लोग बेबाक भी थे. कहीं कोई लाग-लपेट नहीं, साफ दो टूक बातें, इसलिए साम्यवादी सरकार के खिलाफ शुरुआती आंदोलन इन्हीं शहरों से शुरू हुए. लीपजिग के लोगों ने हर सोमवार आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना शुरू किया. गांधीजी के सत्याग्रह की तरह. काम के समय काम और खाली समय में प्रदर्शन. सरकार इससे निबटने में नाकाम रही.

बर्लिन की ढही दीवार का एक हिस्सा
बर्लिन की ढही दीवार का एक हिस्सा


ध्यान दें कि सोशल मीडिया और मीडिया के समर्थन के बिना होने वाले विरोध आंदोलन के दिन थे वे. जीडीआर के अंदर मीडिया पूरी तरह कम्युनिस्ट पार्टी के हाथों था. सरकार के विरोध की कोई खबर नहीं छपती. हालांकि पश्चिम जर्मन मीडिया में खबरें छपती रही थीं और उससे आंदोलनकारियों का उत्साह बढ़ता रहता था.

उस वक्त पूर्वी जर्मनी के लोगों को दोस्ताना साम्यवादी देशों में जाने की आजादी तो थी, सिर्फ पश्चिमी और तीसरी दुनिया के देशों में जाना मना था. बहुत से जर्मन गर्मियों में छुट्टी बिताने पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देशों में जाते. 1989 की गर्मियों में लोग अचानक चेकोस्लोवाकिया और हंगरी की ओर जाने लगे. वहां वे शरण के लिए दूतावासों में इकट्ठा होने लगे. पश्चिमी जर्मनी ने उन लोगों को शरण देने का फैसला लिया तो लोग ऑस्ट्रिया के साथ लगी सीमा पर इकट्ठा होने लगे. हंगरी के लिए एक मानवीय समस्या पैदा हो गई. आखिरकार हंगरी ने सीमा पर लगी बाड़ हटाने का फैसला किया. हंगरी ने अपनी सीमा को खोल दिया था. वहां से होकर अब कोई भी ऑस्ट्रिया जा सकता था और पश्चिमी यूरोप में प्रवेश कर सकता था.

कम्युनिस्ट सरकार पर दबाव बढ़ने लगा. वह साम्यवादी जीडीआर के गठन की 40वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारियों में लगी थी. खुले तौर पर सब कुछ सामान्य होने का प्रदर्शन किया जा रहा था, लेकिन अंदरखाने हालत खराब होती जा रही थी. लोग भाग रहे थे और उद्योग की कई शाखाओं में कामगार नहीं होने के कारण मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं.


और ऐसे ही दबाव के माहौल में एक दिन दीवार खोलने की घोषणा कर दी गई. कम्युनिस्ट पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में बहस चल रही थी, फैसले लिए जा रहे थे, प्रशासनिक तैयारी पूरी थी नहीं. तभी पोलित ब्यूरो सदस्य गुंटर शाबोव्स्की ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में नागरिकों को विदेश जाने की अनुमति देने की घोषणा की. इस घोषणा के बाद लोग चेक प्वाइंट पर पहुंचने लगे. जब हजारों लाखों की भीड़ सीमा चौकियों पर पहुंची तो वहां पहरेदारी कर रहे सैनिकों के सामने लोगों को पश्चिम में जाने देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा. दोनों ओर के लोग मिले तो एक-दूसरे की बाहों में लिपट गए. बिछड़े हुए रिश्तेदार एक-दूसरे से मिले थे. वह मौका जर्मन एकीकरण की नींव डालने का मौका बन गया.

सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या पर दिया गया यह फैसला आज भारत के लिए कुछ वैसा ही मौका है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला हमारे लिए एक नया सवेरा लेकर आया है, इस विवाद का भले ही कई पीढ़ियों पर असर पड़ा हो लेकिन इस फैसले के बाद हमें यह संकल्प करना होगा कि अब नई पीढ़ी नए सिरे से 'न्यू इंडिया' के निर्माण में जुटेगी, आइये हम नए निर्माण में जुटें.
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

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First published: November 10, 2019, 11:59 AM IST
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