Opinion: क्यों इतनी भयावह है पाकिस्तान में कुपोषण की समस्या, जानिए इसकी वजह

ज्यादातर पाकिस्तानी परिवारों को दिन में दो वक्त का भोजन मिलना भी मुश्किल है.

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: August 3, 2019, 12:18 PM IST
Opinion: क्यों इतनी भयावह है पाकिस्तान में कुपोषण की समस्या, जानिए इसकी वजह
पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को भी समझना होगा कि वह जनता के प्रति जवाबदेह है “डीप स्टेट” के प्रति नहीं.
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: August 3, 2019, 12:18 PM IST
आज पाकिस्तान इस्लामिक जगत की सबसे बड़ी सैन्य और सामरिक शक्ति के रूप अपनी स्थिति को लेकर आत्ममुग्धता में है. परन्तु इस शक्ति सम्पन्नता के दंभ के पीछे पाकिस्तान का भविष्य यानी उसके असंख्य बच्चे बेबसी का जीवन जीने को मजबूर हैं. यह एक कठोर वास्तविकता ये भी है कि आज पाकिस्तान अपनी आबादी के बड़े हिस्से को उसकी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ साबित हो रहा है.

दो वक्त का भोजन मिलना है मुश्किल

नेशनल न्यूट्रिशन सर्वे 2018 के अनुसार, 50 प्रतिशत पाकिस्तानी परिवारों के पास दिन में दो वक्त के भोजन के लिए आवश्यक संसाधनों की गंभीर कमी है. यह सर्वेक्षण पाकिस्तान के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सर्वे है जो देश के सभी चार प्रांतों के साथ-साथ उसके द्वारा कब्जाए गए क्षेत्रों पाक अधिकृत जम्मू और कश्मीर की ग्रामीण और शहरी आबादी को कवर करता है.

इस सर्वेक्षण में 115,3600 परिवारों को शामिल किया गया, जिनमें 145,324 महिलाएं, पांच साल से कम उम्र के 76,742 बच्चे और 10 से 19 साल की उम्र के 145,847 अवयस्क बच्चों का अध्ययन किया गया. इस सर्वेक्षण के परिणाम चौंकाने वाले हैं जिसके अनुसार पाकिस्तान के 40.2 प्रतिशत बच्चे कुपोषण और बाधित विकास से प्रभावित हैं, जो उनके संज्ञानात्मक और शारीरिक विकास दोनों को बाधित कर रहा है, इसके साथ साथ 36.9 प्रतिशत पाकिस्तानी परिवार गंभीर रूप से खाद्य असुरक्षा की जद में हैं.

बाधित विकास है बड़ी समस्या

बाधित विकास : पाकिस्तान की राष्ट्रीय समस्या बाधित विकास पाकिस्तान के बच्चों के सम्मुख सबसे भीषण समस्या है. पाकिस्तान के करीब 1.2 करोड़ बच्चे अपनी उम्र की तुलना में उपयुक्त लम्बाई हासिल करने में अक्षम हैं. पूरे पाकिस्तान के लिए यह औसत 40.2 प्रतिशत है परन्तु पाकिस्तान के अंदर बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय भेद मौजूद हैं. इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र (आईसीटी) में यह सबसे कम है, जहां 32.6 प्रतिशत बच्चे बाधित विकास से पीड़ित है.

दूसरी ओर खैबर पख्तुन्ख्वा में यह 48.3 प्रतिशत के स्तर पर है जो पूरे पाकिस्तान में सर्वाधिक है. बलूचिस्तान और सिंध में भी स्थितियां खराब हैं. यहां भी क्रमश: 46.6 और 45.5 प्रतिशत बच्चे बाधित विकास से ग्रस्त हैं. वहीं पाकिस्तान की राजनीति के केंद्र पंजाब प्रांत में यह 36.4 प्रतिशत के स्तर पर है जो राष्ट्रीय स्तर की तुलना में अच्छी स्थिति कही जा सकती है. बाधित विकास की व्यापकता में 1965 (48 प्रतिशत) से 1994 (36.3 प्रतिशत) तक लगातार सुधार आया, लेकिन 2001 से इसकी स्थिति बिगड़ी है, जब यह 41.6 प्रतिशत के स्तर से बढ़ती हुई 2011 में 43.7 प्रतिशत के स्तर पर जा पहुंची.
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विदेशी मदद का नहीं किया सही इस्तेमाल

आश्चर्य की बात यह है कि इसी समय पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर अमेरिकी मदद प्राप्त हो रही थी लेकिन उसका इस्तेमाल पाकिस्तान सरकार की “अन्य प्राथमिकताओं” पर किया जा रहा था. कुपोषण के अन्य प्रभाव पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में वजन की कमी पाकिस्तान के सभी प्रांतों/क्षेत्रों में उच्च स्तर पर है. इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र ICT में 19.2 प्रतिशत बच्चे औसत से कम वजन के हैं. सिंध में यह 41.3 प्रतिशत तक है. उल्लेखनीय है कि पूरे पाकिस्तान में केवल इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र (आईसीटी) ही ऐसा क्षेत्र है, जहां औसत से कम वजन के बच्चों का प्रतिशत 20 से कम है.

दूसरी ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित लक्ष्य से दुगुने से अधिक वजन वाले बच्चों के अनुपात का अनुमान 9.5 प्रतिशत है. इनकी सर्वाधिक संख्या खैबर पख्तुन्ख्वा (18.7 प्रतिशत) और बलूचिस्तान (16.7 प्रतिशत) में पाई जाती है. वहीं सिंध (5.2 प्रतिशत) और आईसीटी (5.8 प्रतिशत) में यह सबसे कम है. इस सर्वेक्षण के मुख्य तथ्यों में एक यह भी है कि पाकिस्तान में केवल 48.4 प्रतिशत महिलाएं ही अपने बच्चों को बचपन से स्तनपान कराती हैं.

लड़कों की तुलना में लड़कियों से भेदभाव

यह भी पाया गया कि कुपोषण आंशिक रूप से एक वंशानुगत मुद्दा है, क्योंकि जिन महिलाओं के आहार में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी थी, उन्होंने कमजोर बच्चों को जन्म दिया. पाकिस्तान में पांच साल से कम उम्र के प्रत्येक 10 बच्चों में से चार को विकास की कमी और तदुनुरूप सीखने की क्षमता में कमी से प्रभावित पाया गया. इसके पीछे जागरूकता की कमी महत्वपूर्ण कारक है.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि देश के बहुसंख्य परिवारों में लड़कियों की तुलना में लड़कों के पक्ष में आहार संबंधी भेदभाव किया जाता है. पाकिस्तान में रक्ताल्पता या अनीमिया की स्थिति भी विकराल रूप धारण कर चुकी है. आधे से अधिक (53.7 प्रतिशत) पाकिस्तानी बच्चे एनीमिक हैं और इनमें से 5.7 प्रतिशत तो गंभीर रूप से एनीमिया के शिकार हैं. लड़कियों (53.1 प्रतिशत) की तुलना में लड़कों में एनीमिया का प्रसार थोड़ा अधिक (54.2 प्रतिशत) है.

शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्र है ज्यादा प्रभावित

इस रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रों (48.9 प्रतिशत) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में (56.5 प्रतिशत) बच्चों के एनीमिक होने की अधिक संभावना होती है. गंभीर एनीमिया के लिए एक समान पैटर्न देखा गया है, जो ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 5.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र के लिए 5.2 प्रतिशत रहा है. बच्चो में पाए जाने वाली विविध प्रकार की विकलांगता एक बड़ी समस्या बनी हुई है. एनएनएस 2018 के आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान में 12.7 प्रतिशत बच्चों में, दिए गए 6 प्रारूपों में से एक में कार्यात्मक विकलांगता पाई गई है. इसमें दृष्टि सम्बन्धी कार्यात्मक विकलांगता 1.2 प्रतिशत, श्रव्य 1.5 प्रतिशत, चलने में 2.6 प्रतिशत, याद रखने में 4.5 प्रतिशत है. वहीं इस तरह की विकलांगता श्रेणी में 8.5 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो खुद की देखभाल तक में असमर्थ हैं और 5.6 प्रतिशत को संचार संबंधी कार्यो में गहन समस्या का सामना करना पड़ता है. कुपोषण किशोरावस्था में भी प्रभावी है!

पाकिस्तान में न केवल बच्चों बल्कि किशोरवय में भी कुपोषण की समस्या व्यापक है. एनएनएस 2018 से पता चलता है कि आठ किशोर लड़कियों में से लगभग एक कम वजन की है. किशोरावस्था के कुपोषण के मामले में लड़कियों की तुलना में किशोर लड़के अधिक प्रभावित होते हैं, जिनमें जिनमे प्रति पांच में से एक अंडरवेट है. वहीं दूसरी ओर वजन की अधिकता किशोर लड़कियों और लड़कों में क्रमशः 11.4 प्रतिशत और 10.2 प्रतिशत के स्तर पर देखी गई है. बच्चों में बढ़ता मोटापा पाकिस्तान में एक चिंता का विषय बना हुआ है. 7.7 प्रतिशत किशोर लड़के और 5.5 प्रतिशत किशोर लड़कियां इससे प्रभावित हैं. अधिक वजन और मोटापा किशोरों को पाकिस्तान के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में समान रूप से प्रभावित करते हैं. छोटे बच्चों के साथ ही साथ पाकिस्तान में आधे से अधिक (56.6 प्रतिशत) किशोर लड़कियां भी एनीमिक हैं.

इनमें से केवल 0.9 प्रतिशत मामलों में ही गंभीर एनीमिया है. ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर लड़कियों की एनीमिया से ग्रस्त होने की दर 58.2 प्रतिशत है जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 54.2 प्रतिशत है. महिलाओं की दशा पाकिस्तान में 15 से 35 साल की प्रजनन आयु वाले महिला वर्ग को कुपोषण की सर्वाधिक मार झेलनी पड़ रही है. यह इसलिए भी गंभीर हो जाती है क्योंकि इसका सीधा प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ता है. इस वर्ग में सात में से एक (14.4 प्रतिशत) महिला कुपोषित है.

अधिकांश महिलाओं में विटामिन डी की कमी

इस क्षेत्र में भी शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में विभेद स्पष्ट है. ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं अधिक कुपोषित हैं, वहीं दूसरी ओर शहरी महिलाओं में वजन और मोटापा अधिक है. प्रजनन आयु वाले महिला वर्ग का अधिकांश भाग (79.7 प्रतिशत) विटामिन डी की कमी से प्रभावित है, जिसमें 54.0 प्रतिशत मध्यम विटामिन डी की कमी और 25.7 प्रतिशत विटामिन डी की गंभीर कमी से ग्रस्त हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में जहां विटामिन डी की कमी 77.1 प्रतिशत के स्तर पर है, वहीं शहरी क्षेत्र में यह 83.6 प्रतिशत के स्तर पर बनी हुई है. इसका सीधा सम्बन्ध ग्रामीण और शहरी जीवन शैली के अंतर से है.

पाकिस्तान पानी की कमी से सर्वाधिक ग्रस्त क्षेत्रों में से एक है

पाकिस्तान के अपेक्षाकृत विकसित क्षेत्रों जैसे आईसीटी और पंजाब में आयोडीन युक्त नमक की खपत 85 प्रतिशत से अधिक है. वहीं खैबर पख्तून्ख्वा में आयोडीन युक्त नमक की खपत बहुत कम, लगभग 31.6 प्रतिशत है. स्वच्छ पेयजल की बाधित आपूर्ति पाकिस्तान पानी की कमी से सर्वाधिक ग्रस्त क्षेत्रों में से एक है. यह असर स्वच्छ पेय जल की आपूर्ति में भी दृष्टिगत होता है. पाकिस्तान में 56.1 प्रतिशत घरों का पीने का पानी कोलीफॉर्म से दूषित है, जिसका स्तर शहरी क्षेत्रों में 54.2 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में यह 57.3 प्रतिशत तक है. कोलीफॉर्म संदूषण की सबसे अधिक मात्रा इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र (ICT) में 92 प्रतिशत में और पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के भाग गिलगित बल्तिस्तान में सबसे कम 12 प्रतिशत देखी गई है.

रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में लगभग 36 प्रतिशत परिवार ई कोलाई से दूषित पानी पीते हैं, जिसकी मात्रा शहरी इलाकों में थोड़ी अधिक दर 37.4 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों 35.2 प्रतिशत के स्तर पर है. ई कोलाई संदूषण का सर्वाधिक प्रसार खैबर पख्तून्ख्वा में 78.3 प्रतिशत और पंजाब में सबसे कम 30.4 प्रतिशत है. कुपोषण का अर्थशास्त्र बच्चों को आवश्यक पोषण उपलब्ध न करा पाना किसी भी सरकार के लिए नैतिकता की दृष्टि से तो चिंतनीय है ही, परन्तु यदि हम इसके आर्थिक दुष्प्रभावों की तरफ ही देखें तो स्थिति की भयावहता और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है. स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (एसबीपी) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में खाद्य सुरक्षा की कमी और कुपोषण विशेषकर 5 से कम आयु के बच्चों में व्याप्त कुपोषण के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर गहन नकारात्मक आर्थिक प्रभाव देखे जा रहे हैं.

इनका मौद्रिक मूल्य लगभग 7.5 अरब अमेरिकी डॉलर अथवा पाकिस्तान के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का तीन प्रतिशत है. उच्च बाल मृत्यु दर, जस्ता और आयोडीन की कमी, बाधित विकास और एनीमिया की व्यापकता, शारीरिक और मानसिक विकास में कमी का कारण बनती है, जो देश में श्रम उत्पादकता और भविष्य की श्रम शक्ति को कमजोर करती है. रिपोर्ट के अनुसार, केवल 5 वर्ष से कम आयु वर्ग की बढ़ी हुई मृत्यु दर के परिणामस्वरूप भविष्य में श्रम शक्ति का होने वाले नुकसान का मौद्रिक मूल्य ही 2.24 अरब अमेरिकी डॉलर है. इसके अलावा सालाना 1 अरब डॉलर वह अनुमानित स्वास्थ्य व्यय है, जो परिवारों के बीच डायरिया और श्वसन संक्रमण का पता लगाने के लिए खर्च किया जाता है.

आयोडीन की कमी है बड़े नुकसान की वजह

बचपन में बाधित विकास, एनीमिया या आयोडीन की कमी के कारण भविष्य में होने वाले श्रम उत्पादकता में ह्रास के कारण पाकिस्तान को सालाना 3.7 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है. इसके साथ ही करीब 1 करोड़ कामकाजी वयस्कों में पुरानी कमजोरी और थकान जिसका कारण एनीमिया का सतत बना रहना हैं, पाकिस्तान को सालाना अनुमानित रूप से 67 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है. स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान की यह रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि देश की खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भरता हासिल नहीं की गई तो दीर्घावधि में भुगतान संतुलन से सम्बन्धित गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

दूसरी ओर इस रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया कि खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए किए गए उपाय बड़ी राजकोषीय लागतों को बढ़ावा दे सकती है, क्योंकि सरकारें कृषि क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए जहां एक ओर सब्सिडी देती हैं वहीं दूसरी ओर, निर्धन आबादी की क्रय शक्तियों को बनाए रखने के लिए सामाजिक सुरक्षा नेट का भी सहारा लेती हैं. इन दोनों ही परिस्थितियों के बीच पाकिस्तान त्रिशंकु जैसी अवस्था में लटका हुआ है. पाकिस्तान में आज केवल 63.1 प्रतिशत लोग ही खाद्य सुरक्षा के दायरे में हैं. शेष आबादी का भविष्य अधर में है और ऐसी स्थिति में जब पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति दयनीय स्तर पर पहुंच चुकी है तो उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त उपाय यही रह जाता है कि वह संसाधनों का आवंटन उचित और युक्तिसंगत तरीके से करे. पाकिस्तान की लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को भी समझना होगा कि वह जनता के प्रति जवाबदेह है “डीप स्टेट” के प्रति नहीं.

(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं )

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First published: August 3, 2019, 12:12 PM IST
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