OPINION: हिंदुत्व के पुरोधा

OPINION: हिंदुत्व के पुरोधा
जिस हिंदवी साम्राज्य की कल्पना को छत्रपति शिवाजी ने साकार रूप दिया उसी की पुनर्स्थापना तथा सर्वांगीण उन्नति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई. (सांकेतिक तस्वीर)

देश का इतिहास लिखने वाले वामपंथी इतिहासकारों ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण उनके साथ न्याय नहीं किया. छत्रपति शिवाजी, स्वातंत्र्य वीर सावरकर तथा माधव सदाशिव गोलवरकर को जो स्थान देश के इतिहास में मिलने चाहिए थे, नहीं मिले.

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(राजीव तुली)

नई दिल्ली. 28 मई से 5 जून के बीच तीन ऐसे महत्वपूर्ण दिवस हैं जिनका देश में सत्तारूढ़ सरकार से सीधा सीधा सम्बंध है. परंतु यह भी विडम्बना ही है कि तीनों के विषय में आज भी देश की जनता और समाज बहुत कम जानता है. और जितना जानता है, वह भी जानकारी के अभाव में ठीक नहीं है. देश का इतिहास लिखने वाले वामपंथी इतिहासकारों ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण उनके साथ न्याय नहीं किया. छत्रपति शिवाजी, स्वातंत्र्य वीर सावरकर तथा माधव सदाशिव गोलवरकर को जो स्थान देश के इतिहास में मिलने चाहिए थे, नहीं मिले. 28 मई को सावरकर की जन्म जयंती थी, 3 जून को हिंदू पादशाही की स्थापना हुई तथा 5 जून को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर "श्री गुरु जी" का निर्वाण दिवस है.

हिंदुओं को गौरवपूर्ण स्थान दिलाने में शिवाजी की अहम भूमिका
छत्रपति शिवाजी ने हिंदू पद पादशाही की स्थापना उस समय की जब पूरे भारत में हिंदू राजा न के बराबर थे. उत्तर तथा मध्य भारत में मुग़लों का आतंक था तथा दक्षिण में आदिलशाही थी. ऐसे में एक क़िले को जीत कर शुरुआत करने से ले कर पूरा साम्राज्य स्थापित करने का काम शिवाजी महाराज ने किया. मुग़लिया सल्तनत को समाप्त करने तथा हिन्दुओं को पुनः गौरव पूर्ण स्थान दिलाने में शिवाजी महाराज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उत्तर भारत से कवि भूषण ने मराठा राज्य में आ कर शिवा बावनी में छत्रपति शिवाजी के साम्राज्य तथा उत्कर्ष के विषय की महत्ता का बखान करते हुए लिखा है :
कासी हू की कला गई मथुरा मसीत भई


शिवाजी न होतो तो सुनति होती सबकी॥


सावरकर के लिए प्रेरणा स्त्रोत बना शिवाजी महाराज का जीवन चरित्र
विनायक दामोदर सावरकर ने इन्हीं शिवाजी महाराज का जीवन चरित्र अपनी पुस्तक हिंदू पद पादशाही में किया है. और हिंदुत्व की वास्तविक प्रेरणा का स्रोत भी वही बना है. सावरकर लिखते हैं कि हिंदू मुस्लिम एकता उस दिन से थोड़ा बहुत सम्भव होने लगी जिस दिन सन् 1761 में हिंदू राष्ट्र के वीरों ने दिल्ली में विजय पताका फहराई और मुग़लों का तख़्त ताज और झंडा वीर सेनानी भाऊराव और नवयुवक विश्वास राव के चरणों में टुकड़े-टुकड़े हो कर धूल में मिल गया क्योंकि उस दिन हिन्दुओं ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता प्राप्त की और इस विश्व के रंग मंच पर एक जीवित राष्ट्र के रूप में खड़े रहने के अधिकार का प्रमाण दिया. उन्होंने एक विजेता पर विजय पाई और तब वह समय था जब यदि मुग़ल चाहता तो देशवासी और मित्र के नाते उसे गले लगाया जा सकता था. इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो मराठों का इतिहास हिंदू मुस्लिम एकता की राह में बाधा होने के स्थान पर चिरस्थायी एकता के मार्ग का निर्देश करता है जो कि इससे पहले दुर्गम था.”

छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन में नहीं होता था भेदभाव
संस्कृति के चार अध्याय में रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि “देश में हिंदू मुस्लिम एकता तभी सम्भव है जब मुसलमान विजेता और हिंदू विज़ित का भाव त्याग दें.” शायद 1761 मे इसी भाव का कुछ मात्रा में परिमार्जन हुआ था. सावरकर आगे लिखते हैं, “यह हिंदू पद पादशाही- अर्थात् स्वतंत्र हिंदू साम्राज्य की स्थापना का उच्च आदर्श ही था जिसने हिंदू स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले नेताओं को दृढ़ विश्वास के साथ उभारा और उसमें अपार शक्ति भर दी, और मराठों को पीढ़ी दर पीढ़ी इसके लिए प्रयत्नशील रखा.”

छत्रपति शिवाजी महाराज के शासन में जाति, धर्म, मत, पंथ, सम्प्रदाय के आधार पर भेद भाव नहीं होता था. राज्य की संचालन व्यवस्था हो या नौसेना का निर्माण या युद्ध नीति सभी अध्ययन के योग्य हैं. इन्हीं सब को आधार बना कर हिंदी साम्राज्य की सेना दिल्ली ही नहीं सिंधु तक पहुंची थी. पानीपत की तीसरी लड़ाई के साथ इस हिंदवी साम्राज्य का अंत हुआ और पुनः भारत ग़ुलाम बना. जिस हिंदवी साम्राज्य की कल्पना को छत्रपति शिवाजी ने साकार रूप दिया उसी की पुनर्स्थापना तथा सर्वांगीण उन्नति के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई. 1940 में माधव सदाशिव गोलवलकर “श्री गुरुजी” संघ के दूसरे सरसंघचालक बने. 1940 तक संघ देश के सभी प्रांतों में पहुंच चुका था. श्री गुरुजी मात्र 34 वर्ष की आयु में संघ प्रमुख के स्थान पर नामित हुए और 33 वर्ष तक इस पद पर रहे.

तीनों महापुरुषों के अंतर्निहित सम्बन्धों की छाप लिए हुए है भाजपा
इन 33 वर्षों में संघ के लगभग सभी बड़े संगठन प्रारम्भ हुए. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय जनसंघ ( वर्तमान की भारतीय जनता पार्टी), विश्व हिंदू परिषद, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, भारतीय किसान संघ, भारतीय मज़दूर संघ इत्यादि विविध संगठन मनुष्य जीवन के सभी आयामों को छूते हैं. परंतु सबका लक्ष्य छत्रपति शिवाजी महाराज की ही तरह हिंदवी साम्राज्य का है. श्री गुरुजी शायद इतिहास के उन महान चरित्रों में से एक हैं जिनको देश के इतिहास में उचित मूल्यांकन और स्थान नहीं मिला. आज मानव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम करने वाले बड़े संगठन उन्हीं की दूर दृष्टि का परिणाम हैं. आज सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी जिस हिंदुत्व की विचारधारा का अनुसरण करती दिखती है कहीं न कहीं इन तीनों महापुरुषों के अंतर्निहित सम्बन्धों की छाप लिए हुए है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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