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Opinion: पीएम मोदी के शब्दकोष में नहीं है शब्द 'थकान'

Opinion: पीएम मोदी के शब्दकोष में नहीं है शब्द 'थकान'

देश को सबसे आगे ले जाने का ये ही जुनुन है जो पीएम मोदी को न थकने दे रहा है और ना ही रुकने. (PTI)

देश को सबसे आगे ले जाने का ये ही जुनुन है जो पीएम मोदी को न थकने दे रहा है और ना ही रुकने. (PTI)

PM Narendra Modi से साक्षात्कारों में एक ही सवाल सबसे पहले पूछा जाता है कि वो थकते क्यों नहीं हैं और उतनी ऊर्जा कहां से लाते हैं? 1997 से लगातार उनकी राजनीति और उनकी जीवन शैली को देख कर मैं यही कह सकता हूं कि वो हमेशा से ऐसे ही रहे हैं.

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24 फरवरी का दिन है. सुबह पीएम मोदी की दिनचर्या 10 बजे शुरू हुई और बजट पर चल रहे वेबिनार को संबोधित करके, और जरूरी बैठकें कर पीएम मोदी निकल पड़े उत्तर प्रदेश, जहां बीजेपी मोदी-योगी के नाम पर फिर से सत्ता पर काबिज होने की तैयारी में है. पहली रैली की अमेठी में- गरीबों, महिलाओं, किसानों के लिए सरकार के किए गए कामों का लेखा जोखा दिया और सभा में उपस्थित भीड़ के सामने रखा. फिर करीब घंटे भर बाद उनकी उड़ान अमेठी से निकल कर प्रयागराज में उतरी. दोनों रैली स्थलों पर उमड़ी भीड़ से साफ हो गया था कि आम जनता का उनपर भरोसा है और उनकी विश्वसनीयता बरकरार है. प्रयागराज से पीएम मोदी का काफिला शाम दिल्ली पहुंचा तो सूर्यास्त हो चुका था, लेकिन पीएम के लिए दिन अभी खत्म नहीं हुआ था.

देर शाम हो चुकी थी, लेकिन पीएम मोदी के लिए आराम का समय अभी नहीं आया था. चिंता है यूक्रेन की. वहां फंसे भारतीयों छात्रों और लोगों की. ऊपर से भारतीयों के हितों का भी ख्याल रखना है. इसलिए उत्तर प्रदेश से लौटने के तुरंत बाद पीएम मोदी ने एक उच्च स्तरीय बैठक बुला ली. मोदी कैबिनेट के शीर्ष मंत्रियों समेत, तमाम आला अधिकारी बैठक में मौजूद रहे और फिर देर रात रूस के राष्ट्रपति पुतिन से फोन पर बात की. मैं ये नहीं बताने जा रहा कि बैठक में क्या हुआ या फिर रैली में क्या हुआ या फिर सीसीएस की बैठक में क्या निकला. दरअसल 24 फरवरी की दिनचर्या बताने का मकसद ये है कि पीएम मोदी काम में किस हद तक व्यस्त रहते हैं. आज 25 फरवरी को जब मैं लिखने बैठा हूं तो पीएम मोदी सुबह बजट को लेकर एक वेबिनार को संबोधित कर चुके हैं. संगठन का काम हो या फिर गवर्नेंस का- पीएम मोदी का पूरा दिन और ध्यान हर पल सिस्टम को बेहतर और मजबूत करने पर ही होता है.

71 साल में भी युवाओं से ज्यादा काम का जुनून

अपनी जिम्मेदारियों को लेकर पीएम मोदी खासे संवेदनशील हैं. जिम्मेदारी देश को आगे ले जाने की, जिम्मेदारी कतार में खड़े आखिरी व्यक्ति को सभी सुविधाएं मुहैया कराने की है, जिम्मेदारी माताओं और बहनों के सशक्तिकरण की- जब सब कुछ बदल देने का बीड़ा उठा कर बतौर पीएम अपनी राह पर चल पड़े हैं तो फिर बिना जुनून के ये संभव नहीं है. यही जुनून है, जो पीएम तो ना थकने दे रहा है और ना ही रूकने. बतौर आरएसएस प्रचारक भी पीएम मोदी एक प्रवास से दूसरे प्रवास पर निकलने में ज्यादा वक्त नहीं लगाते थे. जब बीजेपी में आ गए तो भी दिनचर्या सुबह से शुरू होकर देर शाम तक बैठकों पर निकल जाती थी. उसके बाद भी उस समय के गिने चुने चैनलों पर देर शाम बैठने का वक्त निकाल ही लेते थे. चैनलों के लिए बाइट भी उतनी ही मिलती थी, जितनी उनके संगठन और देश के हित में हो.

आज से 20 साल पहले 2002 के गुजरात के विधानसभा चुनावों की याद आ रही है. मुझे मौका मिला था उनके साथ पूरे दिन के कैंपैंन में उनके साथ रहने का. दिन लंबा होने वाला था. और दिनों की तुलना में उस दिन कुछ ज्यादा ही यानि 6 जनसभाएं थी, जिसमें एक रैली दूर आदिवासी इलाके डांग में होने वाली थी. तय समय के मुताबिक सुबह 7 बजे मैं गांधीनगर में उनके आवास पर पहुंच गया. थोड़े ही समय में मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी बाहर आए तो मुझे देख कर एक ही लाइन कही कि पूरे दिन यात्रा करनी है अमिताभ बाबू, थकोगे तो नहीं.

एक के बाद एक जनभाएं फिर बीच में वडोदरा में हेलीकॉप्टर का रीफ्यूलिंग के लिए उतरना. दोपहर की चिलचिलाती धूप में हमें थोड़ी झपकी भी आने लगी थी, लेकिन मोदीजी के भाषणों में वही जोश बरकरार था, जो उनकी पहली रैली में नजर आया था. और ना ही मैंने उन्हें पूरे दिन आंखें बंद कर किसी भी तरह के आराम के मूड में आते देखा. पांचवीं सभा पूरी होते होते सूर्यास्त हो चला था और पायलट ने उड़ने से मना कर दिया, तब भी सीएम मोदी ने संयम नहीं खोया. आखिरी सभा भी संबोधित की और फिर गांधीनगर तक की लगभग 40 किमी की दूरी रोड से ही तय की. मैं तो थक चुका था, लेकिन मोदीजी पूछ रहे थे कि तेरा पूरे दिन के बाद क्या फीडबैक है.

यही जज्बा मुझे तब भी नजर आया जब पिछले महीने उनकी कार बीच फ्लाईओवर पर फंस गयी और आगे आंदोलनकारी बैठे थे. पीएम मोदी ने अपना संयम नहीं खोया. अपनी सुरक्षा टीम से बात करते रहे और सड़क मार्ग से ही वापस लौट गए. आम तौर पर बीजेपी कार्यालय में जब पीएम मोदी जाते हैं तो संसदीय बोर्ड जैसी बैठकें आम तौर पर देर शाम ही शुरू होती हैं और आधी रात के बाद खत्म होती हैं. लेकिन रात को लौटते वक्त भी पीएम मोदी के माथे पर न कोई शिकन नजर आती है और ना ही कोई थकान.

बतौर प्रचारक सुबह उठने की आदत अब भी कायम है…

अक्सर पीएम मोदी से साक्षात्कारों में एक ही सवाल सबसे पहले पूछा जाता है कि वो थकते नहीं है और उतनी ऊर्जा कहां से लाते हैं. 1997 से लगातार उनकी राजनीति और जीवन शैली को देख कर मैं यही कह सकता हूं कि वो हमेशा से ऐसे ही रहे हैं. कितने बजे उठते हैं, कितने बजे सोते हैं. सूत्र बताते हैं कि किसी दिन बहुत देर हो तो वे सुबह 5 बजे तक उठते हैं और अपना ऑफिस छोड़ते हुए भी उन्हें रात के दस साढ़े दस बजते हैं लेकिन काम उसके बाद भी जारी रहता है, क्योंकि उन्हें सोने जाते-जाते हर रोज रात के बारह तो बज ही जाते हैं और साथ जुड़े लोगों का कहना है कि रात 12 बजे भी पीएम मोदी का कोई संदेश उनके फोन में न आए इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती, लेकिन चंद घंटों की नींद के बावजूद पीएम मोदी हर सुबह वैसे ही तरोताजा नजर आते हैं.

ये तो बहुत बड़ी सीख है, आज के युवा वर्ग को भी कि एक अनुशासन से भरी दिनचर्या आपको न सिर्फ हर वक्त चुस्त दुरुस्त रखती है, बल्कि आपकी सोच में सकारात्मकता लाती है. तभी तो पीएम मोदी बच्चों और युवाओं से संवाद करने और अपना अनुभव साझा करने का कोई मौका नहीं चूकते.

हर मुद्दे पर रहते हैं अपडेटेड

अपने लेख की शुरुआत में मैंने बताया था कि कैसे मैंने आज से 20 साल पहले एक पूरा दिन सीएम मोदी के साथ बिताया था. दोपहर में हेलिकॉप्टर में ही अल्पाहार करने के बाद तीन बजे के आस पास हेलिकॉप्टर में ही अपनी जेब से एक मोबाइल फोन निकाला और करीब आधे घंटे उस पर कुछ बोले नहीं सिर्फ सुनते रहे. जाहिर है कि पूरे राज्य में क्या चल रहा है इसका अपडेट ले रहे थे. एक बात तो मुझे तब ही साफ हो गई की ध्यान सिर्फ रैली पर नहीं हैं, बल्कि राज्य में क्या घट रहा है. इसकी भी पल-पल की खबर रखते हैं. 20 सालों के बाद अब लगता है कि जो आधुनिक फोन तब उनकी हाथ में देखा था, नयी तकनीकी को इस्तेमाल करने का जुनून और नई चीजों का प्रयोग करने की जिज्ञासा उनमें हमेशा से रही है, जो अब भी कायम है. आलम ये है कि बच्चों के साथ संवाद करते हैं तो पीएम मोदी उनके खेलने वाले ऐप का नाम लेकर उनको खुश कर देते हैं.

हाल में ही तमाम ओलंपिक विजेता जब उनसे मिलने पहुंचे तो उनके पास हर खिलाड़ी की व्यक्तिगत जानकारी थी. उनके गांव, उनके परिवार, उनकी मुश्किलें और मुलाकात के दौरान उन्होंने अपने इसी अंदाज के कारण सबका दिल जीत लिया. चाहे फिल्म उद्योग के लोग हों या उद्योग जगत के या स्टार्ट अप्स के सूरमा हों- सबका कच्चा चिठ्ठा उनके पहुंचने के पहले पीएम मोदी के पास पहुंच जाता है और उन्हें सब याद भी रहता है.

अब बात सरकार में काम कर रहे अधिकारियों की. चाहे किसी भी विभाग की फाइल पीएम हाउस आए, चाहे कोई भी अधिकारी उनसे मिलने आए, कोई भी आश्चर्य से अपने दांतों तले उंगली दबाए नहीं लौटता. सबको झटका इस बात का लग जाता है कि आखिर पीएम मोदी उनसे ज्यादा तैयार कैसे थे. 7 लोक कल्याण मार्ग से जुड़े स्टाफ का भी पीएम खासा ख्याल रखते हैं और दिवाली-होली पर उनके पूरे परिवार से मिलने का समय जरूर निकाल लेते हैं. देश को सबसे आगे ले जाने का ये ही जुनून है जो पीएम मोदी को न थकने दे रहा है और ना ही रूकने…

(डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

Tags: Narendra modi, PM Modi, Pm narendra modi

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