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कौन जीतेगा तिरुअनंतपुरम? ओपिनियन पोल की मानें तो BJP, आंकड़ों की मानें तो शशि थरूर

कौन जीतेगा तिरुअनंतपुरम? ओपिनियन पोल की मानें तो BJP, आंकड़ों की मानें तो शशि थरूर

शशि थरूर. फाइल फोटो.

शशि थरूर. फाइल फोटो.

सेफ सीट के तौर पर देखी जा रहे वायनाड संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के ताल ठोकने के बावजूद, इस लोकसभा चुनाव में केरल की सबसे हाई प्रोफाइल सीट तिरुअनंतपुरम ही है, जिस पर सब नज़रें गड़ाए बैठे हैं.

    लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को पूरी उम्मीद है कि तिरुअनंतपुरम सीट से केरल में उसके लिए खाता खुल सकता है जबकि यहां दो बार से कांग्रेस के शशि थरूर सांसद हैं. लेकिन, थरूर इस बार इस सीट पर पूरी तरह सुरक्षित हैं कि नहीं? इस सवाल का जवाब देते हुए स्थानीय भाषा के कुछ चैनलों ने जो चुनावी सर्वे जारी किए हैं, उनके मुताबिक या तो यहां गलाकाट मुकाबला हो सकता है, या फिर भाजपा को फायदा. दो चैनलों ने तो सर्वे में यहां तक कहा है कि इस सीट से भाजपा बड़े मार्जिन के साथ जीतने वाली है.

    क्या ऐसा होगा? इसका जवाब इस लोकसभा सीट के इतिहास और आंकड़ों में छुपा है, जो कहते हैं कि पिछले कुछ सालों में यकीनन यहां भाजपा को फायदा तो हुआ है. बाकी केरल के साथ अगर इस सीट की तुलना की जाए तो, यहां 67 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है, जबकि राज्य के अन्य क्षेत्रों में 55 फीसद. राज्य में इस सीट पर नायरों की तीसरी सबसे बड़ी आबादी है.

    तिरुअनंतपुरम में हिंदुओं और 'सवर्ण' वोटरों का लाभ बीजेपी को मिल सकता है. यहां वोट शेयर बढ़ा है इसलिए बीजेपी की इस उम्मीद को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता. बीजेपी यहां इस फायदे को भुनाने की पूरी कोशिश में है और पार्टी के सहयोगी भी भाजपा के पक्ष में हवा बना रहे हैं और पूरी शिद्दत से कहा जा रहा है कि इस बार भाजपा प्रत्याशी यहां से जीत हासिल करेगा.

    इस सीट पर भाजपा का इतिहास 1998 से शुरू होता है, जब भाजपा के वर्मा राजा प्रत्याशी थे. भाजपा अपनी ही एक कमज़ोर छाया के तौर पर यहां उपस्थिति दर्ज कराती रही, और उसका प्रचार भी फैमिली नेटवर्क के ज़रिये हुआ. पहली बार, पार्टी ने यहां एक लाख का आंकड़ा छुआ. इसके बावजूद, यहां कड़ा मुकाबला कांग्रेस और सीपीआई के बीच ही रहा.

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    तिरुअनंतपुरम की तस्वीर विकिपीडिया पर.


    वोटों और उत्साह की बात की जाए तो, लहर के बावजूद भाजपा यहां सीमित है इसलिए उसने इस बार अपने वरिष्ठ नेता ओ राजगोपाल को चुनाव मैदान में उतारने का दांव खेला है. यह भी गौरतलब है कि 1999 में, पार्टी का वोट शेयर 67 फीसदी तक था जबकि 2004 में 44 फीसदी बढ़ा था, जब राजगोपाल पर ही दांव खेला गया था.

    वोट शेयर और भाजपा की कोशिशें
    2005 और 2009 के चुनावों में जब भाजपा ने किसी और प्रत्याशी पर दांव खेला तो उसका वोट शेयर 1998 के चुनाव से भी कम रह गया. फिर पार्टी ने 2014 में वरिष्ठ नेता राजगोपाल को रेस में उतारा. पिछली बार भी वह लगभग जीत के मुहाने पर ही थे लेकिन ऐन वक्त पर तीन तटीय क्षेत्रों के वोट थरूर के पक्ष में आने से उन्हें शिकस्त मिली.

    वास्तविकता यही है कि ज़िले की हिंदू आबादी के गणित को भाजपा के पक्ष में बिठाने का श्रेय राजगोपाल को ही रहा है इसलिए वह भाजपा के पुख्ता दावेदार हैं. स्पष्ट है कि हिंदू और नायरों के वोट यहां मुख्य भूमिका अदा करने वाले हैं. जब 2009 में थरूर ने यहां से दावा ठोका था, तब उन्होंने भी हिंदुओं और नायरों के वोटों को लुभाया था और थरूर को ट्रावनकोर के राजपरिवार के वफादार होने का भी फायदा मिला था.

    थरूर को एक लाख वोटों से ज़्यादा के अंतर से मिली जीत से साफ है कि उन्हें इस गणित का फायदा मिला. ऐसे संसदीय क्षेत्र के लिए पढ़े लिखे और चार्मिंग थरूर जैसे उम्मीदवार को बेहद मुफीद माना जाता रहा है. हालांकि थरूर ने जब 2014 में फिर यहां से दावेदारी की, तो बीजेपी ने सौम्य और प्रतिष्ठित राजगोपाल को मैदान में उतारा. अब चर्चा ये है कि क्या थरूर का पहले वाला करिश्मा और राजनीतिक गणित इस बार भी काम करेगा?

    पिछले दो फैक्टर इस बार नहीं!
    ऐसा हो भी सकता है क्योंकि राजगोपाल ने 2014 में अपने भरसक प्रयासों से भाजपा के लिए ज़्यादा से ज़्यादा फायदा निचोड़ने का काम किया था और तिरुअनंतपुरम में दो और फैक्टर गौरतलब रहे: पहला, कथित मोदी लहर, जिसमें बेदाग सरकार और वर्ल्ड क्लास विकास का वादा किया गया था, जबकि कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के घोटाले और शिथिल नीतियां उजागर हो रही थीं. और दूसरा, पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत को लेकर थरूर के खिलाफ हुआ प्रचार था. इस बार, मोदी लहर नहीं है और थरूर के खिलाफ लेफ्ट ने जो प्रचार किया है, वह भी ज़ोर नहीं पकड़ पाया है. इसके बावजूद राजगोपाल का प्रोफाइल कमज़ोर नहीं है.

    साल 2014 में, राजगोपाल के हिस्से में जो वोट आए, उनका बड़ा कारण हिंदू और नायरों के वोटों के विस्थापन को माना जा रहा था. इस बार भी इस सीट की आबादी के आंकड़े खास रोल में हैं. थरूर के खाते में जो हिंदू और नायरों के वोट जाते रहे हैं, वो इस बार संसदीय क्षेत्र में कम हैं और अल्पसंख्यकों के आंकड़े हावी हैं. 2014 में, तीन अल्पसंख्यक क्षेत्रों के वोटों की वजह से अंतिम क्षणों में उन्होंने मुकाबला जीता था. इस बार भी कहा जा रहा है कि उनका मन बदलने का कोई कारण नहीं है.

    कांग्रेस के वोटों का गढ़ है तिरुअनंतपुरम का ये गणित
    इस बार भी अल्पसंख्यकों का मन कांग्रेस के साथ होने के दावे हैं. राहुल गांधी के केरल में दौरों और प्रचार अभियान के बाद अल्पसंख्यकों का समर्थन बढ़ा है और माना जा रहा है कि कांग्रेस के वोट बैंक से इस समुदाय के जो वोट निकल गए थे, वो भी वापस आ रहे हैं.

    तिरुअनंतपुरम में नाडार और लैटिन वोट निर्णायक होते हैं, यह नई बात नहीं है. 1980 से 1996 तक, यह विश्वसनीय क्षेत्र रहे हैं, जिनके कारण चुनावों का फैसला होता रहा है और वो भी कांग्रेस के पक्ष में. 2014 में भी यही फॉर्मूला चला और कोई कारण नहीं है कि 2019 में भी ये न चले.

    सीपीएम और लेफ्ट को पता है कि यहां कोवलम, नेयात्तिंकारा और परस्सला क्षेत्रों के नाडार और लैटिन वोटर ही निर्णायक होते हैं और अब तक थरूर को जिताते रहे हैं इसलिए जीत का रास्ता यहीं से निकलता है. पार्टी के प्रॉक्सी समर्थकों ने हाल में ही थरूर के एक ट्वीट को आधार बनाकर थरूर को मछुआरों का विरोधी करार देकर थरूर के खिलाफ प्रचार अभियान छेड़ दिया है. हालांकि थरूर ने इस पर फौरन एक रणनीति के तहत प्रहार करना भी शुरू कर दिया है.

    कांग्रेस का दावा बनाम भाजपा की कोशिश
    पिछले कई सालों से थरूर ने तटीय इलाकों में काफी काम किया है और वोटरों के हित का खयाल रखा है इसलिए उम्मीद कम है कि वोटर उनके खिलाफ जाएं. इसके बावजूद, थरूर के लिए खतरा उनकी अपनी ही पार्टी साबित हो सकती है.

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    ऐसी खबरें फैली हैं कि कांग्रेस की कुछ स्थानीय इकाइयां थरूर के खिलाफ ही काम कर रही हैं. मैदानी काम ठीक से नहीं हो रहे, घर घर जाकर प्रचार करने में कोताही बरती जा रही है. दूसरी तरफ, बीजेपी कोई कसर नहीं छोड़ रही है और संघ की मदद से प्रचार किया जा रहा है. इस बार के उम्मीदवार कुम्मानम राजशेखरन के पोस्टर और परचे हर तरफ दिखाई दे रहे हैं.

    क्या हिंदू और नायर वोटों का विस्थापन 2014 से ज़्यादा बीजेपी की तरफ होगा? ऐसा होगा तो क्या राहुल का चुनावी अभियान उन वोटों को वापस खींच पाएगा? नाडार और लैटिन वोट इस नुकसान की भरपाई कर पाएंगे? क्या राजगोपाल से बेहतर और ज़्यादा लोकप्रिय कुम्मानम साबित होंगे? इन सवालों के जवाब इस बार का फैसले में अहम होंगे.

    कुछ भी हो, तिरुअनंतपुरम सीट पर मुकाबला बेहद दिलचस्प होने वाला है और यह तय माना जा रहा है कि अल्पसंख्यकों के वोट थरूर को ज़रूर बचाएंगे. और यह भी तकरीबन तय है कि अगर सीट भाजपा के खाते में जाती दिखी तो लेफ्ट के वोटर भी थरूर के पक्ष में वोट दे सकते हैं.

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