Opinion: अपनी खास कार्यशैली के बीच राहुल को थोड़ी और सावधानी की जरूरत है

Opinion: अपनी खास कार्यशैली के बीच राहुल को थोड़ी और सावधानी की जरूरत है
राहुल गांधी अपने सबसे बड़े शब्दबाण चला रहे होते हैं, तब उन्हें बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है. (फाइल फोटो)

जब राहुल गांधी (Rahul Gandhi) अपने सबसे बड़े शब्दबाण चला रहे होते हैं, तब उन्हें बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है. 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने राफेल विमान सौदे का ज़िक्र क़रीब-क़रीब हर जनसभा में किया.

  • Share this:
राहुल गांधी 50 साल के हो गए हैं. गंभीर विश्लेषण किया जाए, तो लगता है कि देश के आंगन में उनकी छवि गढ़ने वाले कांग्रेस के कथित शिल्पकारों से शुरुआत से ही बड़ी चूक हुई है. इसमें कोई शक नहीं कि राजनीति राहुल गांधी को विरासत में मिली. ऐसा नहीं है कि गांधी परिवार के सारे सदस्यों में राजनीति का डीएनए अपने पुरखों की तरह ही बहुत दमदार रहा है, लेकिन समय के चक्र ने कुछ ऐसा खेल खेला है कि नेहरू के इंदिरा गांधी होने के बाद ख़ानदान के सारे गांधियों को राजनीति के पंकिल पथ पर चलना ही पड़ा है. राहुल गांधी को ऐसे दौर में कांग्रेस में जान फूंकने उतरना पड़ा, जब कई कद्दावर नेता पार्टी छोड़कर अपने मजबूत किले बना चुके थे और पार्टी में रहने के बावजूद बहुत से नेता अपने-अपने स्वार्थ साधने में लगे थे.

राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी कुशलता पूर्वक हवाई जहाज़ उड़ाते थे. साफ़ है कि उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं थी और साथ ही यह भी पूरी तरह साफ़ है कि उनकी माता जी इंदिरा गांधी के ज़ेहन में भी स्पष्ट था कि राजीव को राजनीति में नहीं उतारना है. अगर वे चाहतीं, तो किस कांग्रेस नेता में यह हिम्मत थी कि वह राजीव गांधी को सिर-माथे नहीं बैठाता. कांग्रेस के इंदिरा मय होने के बाद पार्टी में परिवार के प्रति चापलूसी की पराकाष्ठाओं की बहुत सी तस्वीरें राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले अधेड़ भारतीयों के ज़ेहन में बहुत शिद्दत से उभरती होंगी. हमने देखा है कि कालांतर में कांग्रेस के बहुत बड़े नेता बने छुटभैये किस तरह संजय गांधी की पैर से अनायास उतरी चप्पलें तक उठाकर गदगद होकर उन्हें हृदय से लगा लेते थे.

राजनीति को जिन्होंने करियर नहीं बनाया, ऐसे राजीव गांधी इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद अनायास ही देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठ गए. यह कहें कि कांग्रेस के अंदरूनी सियासी समीकरणों में मची उथल-पुथल की वजह से राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनना पड़ा, तो ज़्यादा सही होगा. बहरहाल, यह भी सही है कि राजीव खुद भले ही राजनीति में नहीं आना चाहते होंगे, लेकिन देश के ज़्यादातर लोगों ने इंदिरा गांधी के वारिस के तौर पर उन्हें अपना नेता सहज ही स्वीकार कर लिया. साथ यह भी सही है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव गांधी ने कई अवसरों पर राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया. सरकार एक रुपया भेजती है, तो नीचे तक 15 पैसे पहुंचते हैं, सार्वजनिक सभाओं में यह बयान देकर उन्होंने देश के लोगों का दिल जीता. देश में कंप्यूटर क्रांति लाने का श्रेय भी उन्हें ही दिया जाता है. उस समय भले ही कंप्यूटर क्रांति को लेकर भ्रम की स्थितियां बनाने की कोशिश की गईं, लेकिन आज हम कह सकते हैं कि इस मामले में राजीव गांधी दूरदृष्टि रखने वाले नेता थे. इसे कांग्रेस की कमज़ोरी ही कहेंगे कि राजीव गांधी का यह स्पष्ट श्रेय आज मोदी सरकार की झोली में डाल दिया गया है.



कांग्रेस के विचारकों के बीच इतना अंतर्द्वंद्व था कि राजीव गांधी की हत्या के बाद उनकी पत्नी सोनिया गांधी को पार्टी की राजनीति का सिरमौर बना दिया गया. नेता बहुत थे, लेकिन सभी एक-दूसरे की टांग खींचने में व्यस्त थे. सभी ने सोचा होगा कि सोनिया गांधी प्रतीकात्मक रूप से कठपुतली के तौर पर कांग्रेस की सर्वोच्च कुर्सी पर विराजमान रहेंगी, लेकिन देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर न बैठकर उन्होंने अपनी परिपक्वता का परिचय दिया. सांस्कृतिक मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाले भावुक भारत में हत्या जैसी जघन्य वारदात के बाद परिवार के ही किसी व्यक्ति को उसकी सियासी विरासत की पगड़ी पहनाना समय की मजबूरी ही होगी, वरना कई दिग्गज और शातिर कांग्रेसियों के मन में कांग्रेस अध्यक्ष बनने का सपना बार-बार कौंधता रहा होगा और आज भी कौंधता होगा. राजीव की हत्या के बाद नहीं चाहते हुए भी राहुल गांधी की मां सोनिया गांधी को कांग्रेस का सर्वेसर्वा होना पड़ा.
राहुल गांधी की बहन प्रियंका गांधी को भी पारिवारिक परंपरात रिवाज़ के उलट राजनीति में नहीं उतारा गया, तो हो सकता है कि उनकी अनिच्छा ही इसकी सबसे बड़ी वजह रही होगी. अगर प्रियंका के मन में राजनीति में उतरने की बात रही होती, तो उन्हें बहुत शुरुआत में ही धूमधाम से लॉन्च किया गया होता और इंदिरा जैसी शक्ल-सूरत और हाव-भाव वाली प्रियंका देश के युवा जनमानस में गहरी छाप छोड़ सकती थीं. लेकिन वे राजनीतिक रथ पर तब सवार हुईं, जब भ्रष्टाचार के आरोप झेल रही और नेतृत्वविहीन जैसी लग रही कांग्रेस के तमाम गगनचुंबी किले ढह चुके थे. उनके भाई राहुल गांधी विभिन्न बाहरी कारणों से नेपथ्य में चले गए थे. तब मजबूरन प्रियंका वाड्रा को उनके रथ के अश्वों की वल्गाएं थामने आना पड़ा. लेकिन वे करिश्मा नहीं कर पाईं. राजनैतिक गलियारों में इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि राहुल गांधी के नेतृत्व में मोदी का विजय रथ रोकने में उल्लेखनीय रूप से कामयाब हुई कांग्रेस गति बरकरार क्यों नहीं रख पाई? तमाम मेहनत के बावजूद राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा.

राहुल को जब कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा होगा, तब उनके मन में कितनी निराशा और मायूसी रही होगी. इसका अंदाज़ा हर उस व्यक्ति को होना चाहिए, जो दिल से बहुत ज्यादा सोचता है, दिमाग़ से नहीं. या इस तरह कहें कि क़ुदरतन जिसका दिल, उसके दिमाग़ से ज्यादा सक्रिय रहता है. ऐसा नहीं हो सकता कि कांग्रेस की कुर्सी पर दोबारा मां के ही बैठने के बावजूद राहुल गांधी के मन में कोई मलाल नहीं पनप रहा होगा. अगर राहुल अपना अक़्स टटोलते होंगे, तो उन्हें अपनी असफलताओं की कुछ नितांत निजी वजहें नज़र आती होंगी. मसलन, अंग्रेज़ी में पले-बढ़े होने की वजह से वे ठेठ भदेसी भारतीय अंदाज़ को नहीं अपना पाए. लेकिन उन्होंने अपनी वेशभूषा, अपने तेवरों से आज के भारत के युवाओं से ख़ुद को कनेक्ट किया, इसमें कोई शक नहीं है. राहुल आज कांग्रेस अध्यक्ष नहीं हैं, तब भी आज की सियासत का ध्रुवीकरण नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी के रूप में ही है.

यह सही है कि राहुल ने सियासत में अपना अलग अंदाज स्थापित करने में कामयाबी पाई. वे भ्रष्टाचार रहित राजनीति करने वाले नेता के तौर पर ख़ुद को साबित कर पाए. कहा जा सकता है कि वे ऐसे दौर में पार्टी के अगुवा बने, जब वह बिखरी हुई थी. बहुत बार अकेली शक्तिशाली दीवार खोखली नींव पर टिकी नहीं रह पाती. राहुल गांधी के सियासी हश्र पर हमें महाभारत में चक्रव्यूह भेदते हुए अभिमन्यु की याद आ सकती है. तमाम दिग्गज अपने-अपने द्वार सुरक्षित नहीं रख पाए और आख़िरकार क्या हुआ. उनके नेतृत्व में 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने न्यूनतम आय योजना यानी न्याय योजना पेश की. इसके तहत देश के सबसे ग़रीब पांच करोड़ लोगों को हर साल 72 हजार रुपये दिए जाने थे. लेकिन बाक़ी के कांग्रेस नेता आम लोगों तक यह बात पहुंचाने में नाकाम रहे. लोगों ने मोदी के छह हजार रुपए पर ही विश्वास किया, तो यह राहुल गांधी की व्यक्तिगत नाकामी नहीं, बल्कि कांग्रेस के अंतर्विरोधों की नाकामी रही.

कहा जा सकता है कि राहुल गांधी के लिए राजनीति की दिशा और काल उनकी तमाम सकारात्मक कोशिशों के बाद भी उनके माफिक साबित नहीं हो पाया. पार्टी के बहुत से नेता उनके ईमानदार और अड़ियल नेतृत्व को पचा नहीं पाए. वे परिवारवाद के आरोप से इस क़दर आहत थे कि उन्होंने पार्टी से युवाओं को जोड़ने के लिए बाक़ायदा इंटरव्यू की प्रक्रिया की शुरूआत की. पार्टी की मज़बूती के लिए दूसरे बहुत से स्तरों पर काम किया. हालांकि यह भी सही है कि राहुल गांधी को अपनी कार्यशैली और अपने व्यक्तित्व में थोड़ा बदलाव लाने की ज़रूरत है.

जब राहुल गांधी अपने सबसे बड़े शब्दबाण चला रहे होते हैं, तब उन्हें बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है. 2019 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने राफेल विमान सौदे का ज़िक्र क़रीब-क़रीब हर जनसभा में किया. लेकिन राफेल विमान की क़ीमत अलग-अलग बता कर हास्यास्पद बन गए. इसी तरह के और बहुत से बयानों ने उन्हें चुटुकुलों का नुक्कड़ नायक बना दिया.  मुझे लगता है कि राहुल अगर चीखें नहीं, सहजता से अपनी बात रखें, चेहरे पर विकृत भाव कम लाएं और थोड़ा अध्ययन ख़ुद करें, तो वे अपेक्षाकृत ज़्यादा स्वीकृति पा सकते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि इस समय वे विपक्ष के बड़े नेता की अपनी भूमिका सक्रिय रूप से अदा कर रहे हैं, लेकिन इसमें निरंतरता रहनी चाहिए. इसमें कोई शक नहीं है कि कांग्रेस में राहुल गांधी ने अपनी स्पष्ट लीक बना ली है और ठान लिया है कि उस पर ही चलेंगे. बस ज़रा सावधानी बरतने की ज़रूरत है. राहुल को जन्मदिन बहुत मुबारक! (ये लेखक के निजी विचार हैं)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज