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OPINION: उद्धव के सीएम बनने के बाद राज साबित हो सकते हैं बाल ठाकरे की विरासत के असली वारिस!

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे महाराष्‍ट्र के सीएम पद की शपथ लेते ही ठाकरे परिवार की सत्‍ता में शामिल नहीं होने की पुरानी परंपरा को तोड़ देंगे. वहीं, राज की आक्रामकता बाल ठाकरे जैसी है.

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे महाराष्‍ट्र के सीएम पद की शपथ लेते ही ठाकरे परिवार की सत्‍ता में शामिल नहीं होने की पुरानी परंपरा को तोड़ देंगे. वहीं, राज की आक्रामकता बाल ठाकरे जैसी है.

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेते ही पार्टी संस्‍थापक बाल ठाकरे (Bal Thackeray) की स्‍थापित की हुई परंपरा को भी तोड़ देंगे. बाल ठाकरे जीवन भर सत्‍ता में सीधे शामिल नहीं हुए. वह अकसर कहते थे भी कि हम सरकारें बनाते हैं, सरकारों में शामिल नहीं होते. इस मामले में अब तक राज ठाकरे (Raj Thackeray) भी सत्‍ता से दूर ही रहे हैं. वहीं, उद्धव ठाकरे पिता के उलट शांत स्‍वभाव के हैं, जबकि राज के तेवर बाल ठाकरे की ही तरह आक्रामक हैं. इसके अलावा राज और बाल ठाकरे में कई अन्‍य समानताएं भी हैं.

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महाराष्‍ट्र (Maharashtra) में जबरदस्‍त सियासी उठापटक के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) का मुख्‍यमंत्री बनना तय हो गया है. वह कल यानी बृहस्‍पतिवार को अपने मंत्रिमंडल के साथ पद व गोपनीयता की शपथ भी ले लेंगे. इस सियासी सफलता के बीच उद्धव ठाकरे ने अपने पिता और शिवसेना के संस्‍थापक बाला साहेब ठाकरे (Bal Thackeray) की उस परंपरा को तोड़ दिया है, जिसके तहत परिवार का कोई भी सदस्‍य सीधे सत्‍ता में शामिल नहीं हुआ.

बाल ठाकरे ने कई मौकों पर कहा भी था कि हम सरकार में रहते नहीं हैं, बल्कि हम सरकारें बनाते हैं. वहीं, उनके चचेरे भाई और शिवसेना छोड़कर अपनी अलग पार्टी महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) बनाने वाले राज ठाकरे (Raj Thackeray) अब तक उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि वह बाल ठाकरे की विरासत के असली वारिस साबित हो सकते हैं. हालांकि, इसके लिए उन्‍हें अभी काफी कुछ साबित करना होगा और अपना सियासी आधार बढ़ाने पर ध्‍यान देना होगा. उन्‍हें महाराष्‍ट्र में बने नए गठबंधन के सहयोगियों के कारण शिवसेना की ओर से ठंडे बस्‍ते में डाले जाने वाले हिंदुत्‍व के मुद्दे को मराठी मानुष के एजेंडे में शामिल करना होगा.

उद्धव के उलट राज ठाकरे कार्यकर्ताओं को व्‍यक्तिगत तौर पर पहचानते हैं
बाल ठाकरे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही आम लोगों से भी आसानी से मिलते और उनकी समस्‍याएं या सुझाव सुनते थे. बहुत से कार्यकर्ताओं को वह व्‍यक्तिगत तौर पर पहचानते थे. वहीं, उद्धव ठाकरे से मिलना इतना आसान नहीं माना जाता है. उद्धव को करीब से जानने वालों का कहना है कि पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भी उनसे मुलाकात के लिए किसी की सिफारिश होना जरूरी होता है. धवल कुलकर्णी की किताब 'द कजिंस ठाकरे: उद्धव, राज एंड द शैडो ऑफ देयर सेनाज' में जिक्र किया गया है कि उद्धव ठाकरे से मुलाकात के पहले उनके निजी सहायक मिलिंद नरवेकर से टाइम लेना पड़ता है. इस मामले में राज ठाकरे को बाल ठाकरे की तरह माना जाता है. उनसे मिलना उद्धव ठाकरे के मुकाबले कहीं ज्‍यादा आसान है. राज भी मनसे के काफी कार्यकर्ताओं को व्‍यक्तिगत तौर पर पहचानते हैं.

बाल ठाकरे ही तरह मनसे प्रमुख ने भी अपनी पार्टी के एजेंडा में मराठी मानुष को सबसे ऊपर रखा है.


मराठी मानुष को हर मामले में प्राथमिकता की करते रहे हैं वकालत
बाल ठाकरे ने 'मराठी मानुष' और 'मराठी भाषी' लोगों को प्राथमिकता के मुद्दे को लेकर राजनीतिक सफर शुरू किया था. हालांकि, बाद में उन्‍होंने खुद को हिंदुत्‍व के बड़े पैरोकार के तौर पेश किया. राज ठाकरे ने सियासत का ककहरा बाल ठाकरे के साथ रहकर ही सीखा है. राज ने भी महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना के एजेंडा में मराठी मानुष को प्राथमिकता दी. वह अकसर यूपी और बिहार के कामगारों के खिलाफ तीखी बयानबाजी करते हुए नजर आते रहे हैं. कई बार इसकी सफाई में उन्‍होंने कहा है कि मैं मराठी लोगों को पहले काम देने की वकालत करता हूं. इसके बाद बाकी राज्‍यों से आए लोगों को काम दिया जाए. साथ ही यह भी कहते रहे हैं कि बाकी राज्‍यों को अपने यहां इतने रोजगार पैदा करने चाहिए कि उन्‍हें महाराष्‍ट्र पर बोझ न बनना पड़े. उनका यह रुख बाल ठाकरे से मेल खाता है.

बाल ठाकरे की तरह आक्रामक तेवर के लिए पहचाने जाते हैं राज
उद्धव को बाल ठाकरे और शिवसेना के आक्रामक रुख के उलट शांत नेता माना जाता है. वह अमूमन आक्रामक बयानबाजी से बचते हैं. वहीं, राज ठाकरे शिवसेना संस्‍थापक की ही तरह आक्रामक तेवरों के लिए पहचाने जाते हैं. मराठी मानुष का मुद्दा हो या उत्‍तर भारतीयों के विरोध का मसला, राज बाल ठाकरे की ही तरह बेखौफ होकर जिम्‍मेदारी लेते हैं. उदाहरण के तौर पर जब बाबरी मस्जिद विध्‍वंस ढहाने के बाद कोई भी संगठन घटना की जिम्‍मेदारी लेने को तैयार नहीं था, तब बाल ठाकरे ने कहा था, 'अगर अयोध्‍या में हुई कारसेवा शिवसैनिकों ने की है तो मुझे उन पर गर्व है.' इसके अलावा राज और बाल ठाकरे में कई अन्‍य समानताएं हैं जो उन्‍हें शिवसेना संस्‍थापक का असली वारिस साबित करती हैं.

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने भी शिवसेना संस्‍थापक बाल ठाकरे की ही तरह कार्टून को अपना हथियार बनाया.


राज ने भी बाल ठाकरे की तरह कार्टून को बनाया अपना हथियार
बाल ठाकरे महाराष्‍ट्र की समस्‍याओं पर प्रहार करने के लिए कार्टून का इस्‍तेमाल करते थे. बाल ठाकरे ने अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए पहले मार्मिक व्यंग्यचित्र साप्ताहिक निकाला था. इसके बाद उन्होंने सामना अखबार शुरू किया. राज्य में शिवसेना की सत्ता होने या न होने लेकिन सामना बाल ठाकरे का प्रभावी अस्त्र बना रहा. इसके जरिए उन्होंने शिवसेना का विस्तार भी किया. आज यह शिवसेना के मुखपत्र के रूप में जाना जाता है. वहीं, राज ठाकरे भी कार्टून बनाने में माहिर हैं. राज्‍य के कई अखबारों में उनके बनाए कार्टून छपते रहते हैं. राज ठाकरे ने भी 2015 में मराठा नाम से अखबार शुरू किया, जो शिवसेना की तरह मनसे का मुखपत्र था. हालांकि, यह ज्‍यादा समय तक चल नहीं पाया.

सियासत उसी को तव्‍वजो देती है, जो खुद को चर्चा में रखना जानते हैं
हालांकि, इन समानताओं के बावजूद राज ठाकरे को बाला साहेब की सियासी विरासत का असली वारिस साबित करने से पहले महाराष्‍ट्र की राजनीति में खुद को पूरे दमखम के साथ स्‍थापित करना पड़ेगा. उन्‍हें बार-बार सियासी गलियारों से गायब होने की अपनी आदत को छोड़ना पड़ेगा. उन्‍हें राज्‍य की सियासत में दखल बढ़ाते हुए जन सरोकार के मुद्दों पर भी बात करनी होगी. उन्‍हें यह ध्‍यान रखना होगा कि एक समय के बाद बाल ठाकरे को भी शिवसेना के विस्‍तार के लिए मराठी मानुष के साथ ही हर वर्ग, हर क्षेत्र के लोगों से जुड़ी समस्‍याओं को अपने एजेंडे में शामिल करना पड़ा था. साथ ही उन्‍हें साबित करना होगा कि वह न सिर्फ बाल ठाकरे की तरह आक्रामक तेवर रखते हैं बल्कि उनकी सियासी सूझबूझ भी उन्‍हीं की तरह है. क्‍योंकि सियासत उसी को तव्‍वजो देती है, जो खुद को चर्चा में रखना जानते हैं.

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