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OPINION: राजपक्षे परिवार की सत्‍ता में वापसी भारत और श्रीलंकाई तमिलों के लिए चिंता का सबब

News18Hindi
Updated: November 18, 2019, 6:49 PM IST
OPINION: राजपक्षे परिवार की सत्‍ता में वापसी भारत और श्रीलंकाई तमिलों के लिए चिंता का सबब
जब महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्‍ट्रपति थे, तब गोतबया रक्षा सचिव, बासिल आर्थिक मामलों के फैसले लेते थे और चामल संसद अध्‍यक्ष थे.

श्रीलंका (Sri Lanka) के राष्‍ट्रपति चुनाव में गोतबया राजपक्षे (Gotabaya Rajapaksa) ने जीत दर्ज कर ली है, जबकि उत्‍तर और पूर्व के अल्‍पसंख्‍यक समुदाय (Minority Communities) ने एकजुट होकर उनके खिलाफ मतदान किया था. माना जा रहा है कि 70 फीसदी सिंहला बहुसंख्‍यकों (Sinhala Majority) ने राजपक्षे के समर्थन में निर्णायक मतदान किया. पिछली बार जब राजपक्षे परिवार सत्‍ता में था, तब मुख्‍य न्‍यायाधीश (Chief Justice) के कार्यालय समेत ज्‍यादातर संवैधानिक संस्‍थाएं (Constitutional Institutions) दबाव में काम करती थीं.

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  • Last Updated: November 18, 2019, 6:49 PM IST
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(वीरराघव टीएम)

नई दिल्‍ली. श्रीलंका के सातवें राष्‍ट्रपति गोतबया राजपक्षे (Gotabaya Rajapaksa) के चुने जाने के बाद भारत (India) और श्रीलंकाई तमिल व मुस्लिमों (Tamil and Muslims) को काफी सावधानी बरतनी होगी. भारत और श्रीलंकाई तमिलों व मुस्लिमों के लिए ये चिंता का कारण है. दरअसल, श्रीलंका उत्‍तरी और पूर्वी क्षेत्र में बसे अल्‍पसंख्‍यक समुदायों (Minority Communities) ने एकजुट होकर गोतबया के खिलाफ मतदान किया था. माना जा रहा है कि देश के 70 फीसदी सिंहला बहसंख्‍यकों (Sinhala Majority) ने राजपक्षे के समर्थन में निर्णायक मतदान किया. इससे राजपक्षे बंधुओं की सत्‍ता में वापसी हो गई है. साथ ही श्रीलंका को फिर सत्‍तावादी परिवार के शासन की ओर धकेल दिया है. बता दें कि श्रीलंका में 2005 से 2015 के बीच महिंदा राजपक्षे राष्‍ट्रपति थे.

राजपक्षे ने 2009 में लिट्टे को कर दिया था नेस्तनाबूद
महिंदा राजपक्षे (Mahinda Rajapaksa) के शासन के समय सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) कार्यालय समेत ज्‍यादातर संवैधानिक संस्‍थाएं (Constitutional Institutions) दबाव में थीं. ज्‍यादातर मुख्‍य पदों (Key Positions) पर राजपक्षे परिवार के ही सदस्‍य थे. चार भाई मिलकर पूरे देश को नियंत्रित कर रहे थे. तब महिंदा राजपक्षे देश के राष्‍ट्रपति थे, तो गोतबया रक्षा सचिव, बासिल (Basil) आर्थिक मामलों के तमाम फैसले लेते थे और चामल (Chamal) संसद अध्‍यक्ष थे. पूरे परिवार पर भ्रष्‍टाचार (Corruption) और लोकतांत्रिक मूल्‍यों की हत्‍या के आरोप थे. बावजूद इसके ये परिवार देश पर शासन कर रहा था. इस परिवार ने 2009 तक आतंकी संगठन लिट्टे को नेस्‍तानाबूद कर दिया था. इसके बाद 2010 में राजपक्षे को पूर्ण बहुमत मिला.

भारत के सिर फोड़ा गया 2015 की हार का ठीकरा
राजपक्षे परिवार के लिए 2015 चुनाव के नतीजे तगड़ा झटका देने वाले रहे. राजपक्षे की हार का ठीकरा भारत के सिर फोड़ा गया. कहा गया कि राजपक्षे की हार में रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) और भारतीय इंटेलीजेंस एजेंसी की बड़ी भूमिका बताई गई. महिंदा राजपक्षे ने भारत पर चुनाव में हस्‍तक्षेप करने का आरोप लगाया. श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (SLFP) और यूनाइटेड नेशनल पार्टी (UNP) ने राजपक्षे को सत्‍ता से हटाने के लिए हाथ मिला लिए थे. ऑब्‍जर्वर्स को लगता है कि भारत ने राजपक्षे के आरोपों का पर्याप्‍त विरोध भी नहीं किया. हालांकि, राजपक्षे की हार के बाद भी एसएलएफपी और यूएनपी श्रीलंका को एकजुट सरकार नहीं दे पाईं.

गोतबया ने 2018 में रक्षा प्रभारी रहते श्रीलंका में सभी भारतीय उच्‍चायुक्‍तों की जबरदस्‍त निगरानी करवाई थी.

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सिरीसेना-विक्रमसिंघे के मतभेद बार-बार सामने आए
राजपक्षे की हार के बाद सत्‍ता में आए राष्‍ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेना और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के बीच मतभेद बार-बार सामने आते रहे. वहीं, अप्रैल, 2019 में ईस्‍टर पर आत्‍मघती आतंकियों के किए धमाकों में 259 लोगों की मौत ने लोगों को सत्‍तारूढ़ दलों के खिलाफ कर दिया. इस घटना ने आम लोगों का रुझान सत्‍तावादी राजपक्षे परिवार की ओर मोड़ने का काम किया. इस आतंकी घटना के काफी पहले ही भारत ने श्रीलंका के साथ धमाकों की तारीख और जगहों की खुफिया जानकारी साझा कर ली थी. बावजूद इसके श्रीलंका सरकार ने इससे निपटने के नाकफी इंतजाम किए.

ईस्‍टर धमाकों ने राजपक्षे के समर्थन में बनाया माहौल
दशकों तक गृहयुद्ध (Civil War) की आग में झुलसे श्रीलंका के लोगों के मन में ईस्‍टर धमाकों से असुरक्षा की भावना घर कर गई. साथ ही इन्‍हीं धमाकों ने लिट्टे के खिलाफ मजबूत सैन्‍य कार्रवाई करने वाले राजपक्षे के समर्थन में माहौल तैयार कर दिया. लोगों ने असुरक्षित राष्‍ट्र और कमजोर सरकार के बजाय तानाशाही परिवार के जोखिम को चुनने का फैसला कर लिया.इस साल की शुरुआत में केंद्रीय बैंक घोटाले में शामिल होने के आरोपों ने सत्‍तारूढ़ गठबंधन की विश्‍वसनीयता को भी नुकसान पहुंचाया. साथ ही राजपक्षे की वापसी की राह खोल दी. इसके अलावा गोतबया राजपक्षे के नेतृत्‍व में श्रीलंका के नई दिल्‍ली के साथ संबंध अच्‍छे रहने की उम्‍मीद बहुत कम है.

गोतबया ने भारतीय उच्‍चायुक्‍तों की कराई निगरानी
महिंदा राजपक्षे जब 2018 में तख्‍तापलट के बाद 51 दिन के लिए श्रीलंका के प्रधानमंत्री बने तब गोतबया रक्षा प्रभारी थे. गोतबया ने तब श्रीलंका में सभी भारतीय उच्‍चायुक्‍तों की जबरदस्‍त निगरानी करवाई थी. यह भविष्‍य का संकेत हो सकता है, जो नई दिल्ली के लिए अच्छी मिसाल नहीं है. इसके अलावा राजपक्षे परिवार का झुकाव चीन की ओर है. ये एक और कारण है, जो भारत की चिंता बढ़ाएगा. ऐसे में नई दिल्‍ली को कोलंबो में नई सत्‍ता के रुख को भांपते हुए धीरे-धीरे कदम बढ़ाना होगा. हालांकि, श्रीलंका की ओर से राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा के दृष्टिकोण से खुले तौर पर नजरअंदाज या विरोध करने के लिए भारत बहुत शक्तिशाली राष्‍ट्र है.

राजपक्षे परिवार का झुकाव चीन की ओर ज्‍यादा होना भी भारत के लिए चिंता का बड़ा कारण है.


राजपक्षे परिवार का झुकाव चीन की ओर है ज्‍यादा
श्रीलंका चीन का साथ मिलने के कारण तीनों देशों के बीच अलग ही कूटनीतिक कहानी लिख सकता है. ये तय है कि इस कूटनीतिक कहानी के केंद्र में राजपक्षे परिवार होगा. श्रीलंका में अल्‍पसंख्‍यकों और खासकर तमिलों के समर्थन के कारण भारत का भी तगड़ा दखल है. बहुसंख्‍यक सिंहली मतदाताओं के राजपक्षे के समर्थन में आने के कारण तमिल और मुस्लिम अल्‍पसंख्‍यकों को भारत के पक्ष में होने का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान देश में संवैधानिक सुधार भी नहीं किए जा सके. ऐसे में बिलकुल नहीं लगता कि गोतबया अल्‍पसंख्‍यकों के प्रति नरम रुख अपनाएंगे.

तमिल-मुस्लिम पार्टियों के रुख से तय होंगे संसदीय चुनाव
एक साल के भीतर श्रीलंका में संसदीय चुनाव भी होने हैं. इन चुनावों का फैसला तमिल और मुस्लिम पार्टियों के रुख से तय होगा. अभी तो यह भी स्‍पष्‍ट नहीं हो पा रहा है कि ये पार्टियां नए राष्‍ट्रपति के सामने लोकतरंत्रिक विवाद का रास्‍ता अपना भी पाएंगी या नहीं. अंत में यही कहा जा सकता है कि संसदीय चुनावों में विपक्ष की ताकत और श्रीलंका के संवैधानिक व लोतांत्रिक मूल्‍यों के साथ खड़े होने का परीक्षण हो जाएगा. श्रीलंकाई तमिल और भारत केवल यही उम्‍मीद करेंगे कि गोतबाया राजपक्षे अपने विरोधियों को निराश करते हुए लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था को अपनाएं.
(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ये उनके निजी हैं.)

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First published: November 18, 2019, 4:21 PM IST
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