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OPINION- अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ज्यादा इस बात में है RSS की जीत

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Updated: November 11, 2019, 12:04 AM IST
OPINION- अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ज्यादा इस बात में है RSS की जीत
आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने साफ कहा कि अयोध्या विवाद में आए फैसले जीत या हार की तरह नहीं देखा जाना चाहिए.

Ayodhaya Verdict: अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद (Ram Janmabhoomi-Babri Masjid case) जमीन विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोहन भागवत और पीएम मोदी का भाषण देश के साथ दुनिया भर के लिए एक संदेश था.

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  • Last Updated: November 11, 2019, 12:04 AM IST
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भवदीप कांग
अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद (Ram Janmabhoomi-Babri Masjid case) जमीन विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (RSS) ने 'विजय भव:' की जगह 'उत्साह' के साथ स्वागत किया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ज्यादा आरएसएस की जीत इस तथ्य में है कि यह बेहद संवेदनशील मामला संविधान के दायरे में ही हल हो गया और विभिन्न पक्षों ने इसका स्वागत किया.

इस मामले में आरएसएस और बीजेपी ने तमाम नेताओं तथा लोगों से संयम भरी प्रतिक्रिया की अपील की. इस साल सितंबर में राजस्थान के पुष्कर में हुई संघ की बैठक में पूरी रणनीति पर चर्चा हुई. यहां संघ के शीर्ष नेताओं ने सदस्यों से साफ कहा कि सुप्रीम कोर्ट में चाहे इस मामले में जीत हो या हार, स्वयंसेवकों को शांत रहना है.

वहीं दिल्ली स्थित छतरपुर के ध्यान साधना केंद्र में 30-31 अक्टूबर को हुई बैठक के बाद आरएसएस ने सार्वजनिक रूप से सभी लोगों से यही अपील दोहराई. आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अगली कुछ जनसभाओं में साफ शब्दों में कहा कि अयोध्या विवाद में अपने पक्ष में अगर फैसला आए तो उसे जीत या हार की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी उन्होंने यही बात दोहराई.

अक्टूबर 2018 में खुद भागवत ने भी प्रस्ताव रखा कि केंद्र सरकार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कानून पारित कराना चाहिए.


इससे पहले आरएसएस ने नवबंर के पहले हफ्ते में हरिद्वार में होने वाली अपनी बैठक रद्द कर दी. इसके साथ ही इस फैसले के मद्देनजर इस महीने होने वाले सभी कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए. सूत्रों के मुताबिक, संघ का मानना था कि जितने कम आयोजन होंगे, शांति कायम रखना उतना ही आसान होगा. इससे बयानवीरों की जुबान बंद तो नहीं लेकिन उनकी आवाज़ कुछ कम जरूर की जा सकती है.

1980 और 90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के लिए जनसमर्थन जुटाने में अग्रणी रही विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने भी भागवत की इस रणनीति को स्वीकार किया. एक साल पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई स्थगित की थी, तब वीएचपी ने देशभर में बड़े आंदोलन की चेतावनी दी थी. उसने दिल्ली में एक बड़ी रैली भी आयोजित की थी.
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अक्टूबर 2018 में खुद भागवत ने भी प्रस्ताव रखा कि केंद्र सरकार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए कानून पारित कराना चाहिए. उन्होंने कहा था, 'अयोध्या मामले की सुनवाई में देरी की कोशिशें से समाज के संयम की परीक्षा लेने जैसी हैं.' इससे पहले तक वह लगातार इस विवाद के न्यायिक हल की ही बात कहते रहे हैं.

अयोध्या विवाद पर फैसले के बाद देशभर में शांति बनाए रखने में विपक्ष की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता.


अयोध्या मामले में भागवत और वीएचपी की तरफ से पेश इस तरह का संयम और सुप्रीम कोर्ट के फैसला इंतजार करना एक तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की क्षमताओं को दर्शाता है. भागवत के संयम की एक बानगी यह भी रही कि इस साल हुए लोकसभा चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान यह मुद्दा शायद ही कभी सुनाई दिया. पीएम मोदी ने यह चुनाव हिन्दुत्व की जगह पूरी तरह राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ने का निर्णय लिया और इस तरह अयोध्या मामला इस बार ज्यादा नहीं उछला.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मोहन भागवत और पीएम मोदी का भाषण देश के साथ दुनिया भर के लिए एक संदेश था. यहां फैसले के बाद राम भक्तों का उन्माद, या भारी जश्न या हिंसा भड़कने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को ठेस पहुंचने का खतरा था.

अयोध्या विवाद पर फैसले के बाद देशभर में शांति बनाए रखने में विपक्ष की भूमिका से भी इनकार नहीं किया जा सकता. राहुल और प्रियंका गांधी से लेकर मायावती और अखिलेश यादव सहित तमाम विपक्षी पार्टियों ने 'अब इससे आगे बढ़ते हैं' की रणनीति के तहत लोगों से शांति और एकजुटता की अपील की. इस मामले में लगभग सभी दल तथा नेता एकराय के साथ ही दिखे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

 

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First published: November 10, 2019, 11:21 AM IST
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