OPINION: दल-बदल कानून की काट के लिए KCR का फॉर्मूला है खतरनाक!

मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के इस कदम से अब असेंबली में दल बदल विरोधी कानून के तहत विधानसभा के स्पीकर किसी भी सदस्य को अयोग्य नहीं ठहरा सकते हैं.

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Updated: September 8, 2018, 3:25 PM IST
OPINION: दल-बदल कानून की काट के लिए KCR का फॉर्मूला है खतरनाक!
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (फ़ाइल फोटो)
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Updated: September 8, 2018, 3:25 PM IST
वीरराघव टीएम
कानून तोड़ने के लिए राजनीतिक दल हमेशा कोई न कोई रास्ता तलाश ही लेते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (TRS). पार्टी ने इस बार दल बदल विरोधी कानून से खिलवाड़ कर खतरनाक और गलत उधारण पेश किया है.

पिछले दिनों तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने इस्तीफा देकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश की. राज्यपाल ने सिफारिश को मंजूरी दे दी. मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के इस कदम से अब असेंबली में दल बदल विरोधी कानून के तहत विधानसभा के स्पीकर किसी भी सदस्य को अयोग्य नहीं ठहरा सकते हैं.

पिछले चार सालों में विपक्षी पार्टी के 26 विधायक TRS में शामिल हुए हैं. इन सारे विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने का मामला स्पीकर मधुसूदन चारी के पास पेंडिग है, लेकिन अब विधानसभा भंग होने से ये मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में चला गया.

TRS ने एक अलग राज्य की मांग को लेकर जोरदार आंदोलन चलाया था. पार्टी को इसका फायदा भी मिला. 119 सीटों में से TRS को 63 पर जीत मिली थी, लेकिन विधानसभा भंग किए जाने के समय TRS के पाले में 90 सदस्य थे.

यानी 2014 के चुनावों के बाद TRS के खाते में 27 एक्सट्रा विधायक आ गए. इसमें से TRS ने 26 विधायक को तोड़कर अपने पाले में किया. राजनीतिक गलियारों में इसे 'ऑपरेशन आकर्षण' भी कहा जाता है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के 22 में से 7 विधायक TRS में शामिल हो गए. टीडीपी ने अपने 15 विधायकों में से 12 को खो दिया और वाईएसआर कांग्रेस के तीन विधायक TRS में शामिल हो गए. मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने इनमें से 12 विधायकों को कैबिनेट मंत्री बना दिया.



सारे 26 विधायक विधानसभा भंग होने तक सदस्य बने रहे. दल बदल विरोधी कानून का जितना दुरुपयोग टीआरएस ने किया उतना किसी और पार्टी ने नहीं किया होगा.

क्या कहता है कानून?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून लाया गया था. इसमें 1985 में 2004 में दो बाद संसोधन किए गए हैं. इस कानून का मुख्य उद्देश्य है लोकसभा और विधानसभा में सदस्यों की खरीद फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) रोकना. इसके तहत कहा गया कि चुनाव के बाद अगर कोई पार्टी से अलग होता है या इस्तीफा देता है तो उसकी सदस्यता रद्द कर दी जाएगी. अयोग्य ठहराने का अधिकार स्पीकर के हाथों में होता है.

लेकिन स्पीकर के लिए किसी को अयोग्य ठहराने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है. यहां ध्यान देना अहम है कि कानून स्पष्ट रूप से ये नहीं बताता कि अगर विधायकों का एक खेमा अपने पुराने पार्टी के पास चला जाए तो क्या होगा. उसे अपने आप मान्यता मिल जाती है.

वास्तव में किस गुट को पार्टी का सिंबल दिया जाएगा जैसे कि तमिलनाडु में एआईएडीएमके के मामले में हुआ था. ऐसे हालात में फैसला अदालत द्वारा लिया जाता है.

दूसरो शब्दों में कहे तो अगर किसी पार्टी का एक तिहाई सदस्य एक साथ मिलकर अलग गुट बनाता है तो उसे अयोग्य नहीं ठहराया जाता है. इसका कोई कानूनी आधार नहीं है. 2004 में एक संशोधन के तहत इस खंड को हटा दिया गया था.

असल दिक्कत ये है कि स्पीकर के लिए किसी को अयोग्य ठहराने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है. इसी का फायदा TRS ने उठाया है. जब तक स्पीकर कोई फैसला नहीं लेते तब तक अदालत भी कुछ नहीं कर सकती है. कोर्ट सिर्फ स्पीकर के फैसले पर किसी याचिका पर सुनवाई कर सकती है.

दल बदल विरोधी कानून से खिलावाड़ कोई नई बात नहीं है. लेकिन जितने बड़े स्तर पर इसका फायदा TRS ने उठाया है वैसा इससे पहले किसी ने नहीं किया है. ऐसे में इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार है)

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