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OPINION: 'गूंगे' विपक्ष के बीच सोनिया गांधी होने का अर्थ

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: November 26, 2019, 5:30 PM IST
OPINION: 'गूंगे' विपक्ष के बीच सोनिया गांधी होने का अर्थ
सोनिया की वापसी और राजनैतिक कौशल

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को पार्टी के डीएनए (DNA) का सही अंदाजा है. वह इस बात को बखूबी जानती हैं कि कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी की तरह तेज, आक्रामक और फुर्तीली नहीं हो सकती.

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  • Last Updated: November 26, 2019, 5:30 PM IST
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नई दिल्‍ली. महाराष्‍ट्र चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले लेखक की मुलाकात म‍हाराष्‍ट्र युवा कांग्रेस के खासे वरिष्‍ठ नेता से हुई. सामान्‍य तौर पर माना जाता है कि नौजवानों में बुजुर्गों की तुलना में ज्‍यादा जोश होता है. लेकिन यह युवा नेता महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर इतने निराश थे कि वे बार-बार यह कह रहे थे कि इस चुनाव में तो पार्टी की कोई संभावना है ही नहीं, बल्कि अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी शायद ही कुछ कर सके. यह अलग बात है कि पार्टी के वफादार होने के नाते वे चुनाव में अपनी पूरी ताकत लगाएंगे और चुनाव हारने के बाद संगठन को मजबूत करने में जुट जाएंगे.

लेकिन जब महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव का रिजल्‍ट आया और तमाम एग्जिट पोल को धता बताते हुए एनसीपी 54 सीट और कांग्रेस 44 सीट तक पहुंच गई तो लगा कि राहुल गांधी के अध्‍यक्ष पद से हटने के बाद कांग्रेस में जो शून्‍य पैदा हुआ था, उसने पार्टी के नेताओं को जनता से ज्‍यादा निराश कर दिया था. शायह यही वजह थी कि महाराष्‍ट्र और हरियाणा दोनों राज्‍यों में कांग्रेस ने उससे बेहतर प्रदर्शन किया, जितने की उम्‍मीद राजनैतिक पंडित और खुद पार्टी नेता कर रहे थे.

सोनिया की वापसी और राजनैतिक कौशल
लेकिन यह पंडित और नेता गलत साबित कैसे हुए. इस बीच में पार्टी के अंदर जो सबसे बड़ी चीज हुई, वह था सोनिया गांधी का वापस कांग्रेस अध्‍यक्ष पद पर लौट आना, भले अंतरिम ही सही. सोनिया गांधी ने अपने स्‍वभाव और राजनैतिक कौशल के मुताबिक एक बार फिर किसी नए प्रयोग को मौका नहीं दिया. वैसे भी दौड़ के बीच में घोड़े बदलना बुद्धिमानी की बात नहीं मानी जाती. लिहाजा महाराष्‍ट्र में सोनिया पार्टी ने पुराने मुख्‍यमंत्रियों की टीम को क्षेत्रीय मुद्दों पर चुनाव लड़ने के लिए छोड़ दिया. उन्‍होंने मुंबई कांग्रेस के मुखर अध्‍यक्ष रहे संजय निरुपम के गुस्‍से और चेतावनियों पर बिलकुल ध्‍यान नहीं दिया. इसी तरह हरियाणा में उन्‍होंने प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर को पद से हटाने और पार्टी से बाहर जाने तक पर कोई ऐतराज नहीं किया. यहां उन्‍होंने पुराने नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर यकीन किया.

शरद पवार कांग्रेस और एनसीपी दोनों का चेहरा रहे
महाराष्‍ट्र में सोनिया ने सिर्फ पुराने मुख्‍यमंत्रियों पर जोर दिया बल्कि गठबंधन सहयोगी एनसीपी के साथ पूरे धैर्य से पार्टी को जुड़ने दिया. यहां तक कि इस पूरे चुनाव में दिल्‍ली से देखने पर तो ऐसा ही लगा जैसे शरद पवार ही कांग्रेस और एनसीपी दोनों का चेहरा है. चुनाव परिणाम आने के बाद भी सोनिया गांधी ने पूरे धैर्य का परिचय दिया. अगर गौर से देखा जाए तो करीब एक पखवाड़े तक तीनों दलों के बीच चली बातचीत में कांग्रेस ने शिव सेना के साथ न के बराबर बातचीत की. शिव सेना से बातचीत पूरी तरह एनसीपी ही कर रही थी. उसके बाद एनसीपी इस बातचीत के बारे में कांग्रेस को अपडेट कर देती थी. यहां तक कि जब फडणवीस को मुख्‍यमंत्री बना दिया गया तो उस दिन भी विपक्ष की प्रेस कान्‍फ्रेंस में शिव सेना और एनसीपी साथ बैठे, कांग्रेस अलग रही.

गठबंधन को लेकर सजग थी कांग्रेस
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शायद कांग्रेस इस गठबंधन को फूंक-फूंक कर आगे बढ़ा रही थी. वह सावधान थी कि अगर शिव सेना से ज्‍यादा मुहब्‍बत दिखाई और अंत में सरकार न बन पाई तो, न तो खुदा मिला न बिसाले सनम वाली हालत हो जाएगी. यह एक ऐसा धैर्य है जो सोनिया के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस ही दिखा सकती है.

सोनिया गांधी का राजनैतिक अनुभव
असल में सोनिया गांधी का राजनैतिक अनुभव लंबा है और दो तरह का है. उनका पहला अनुभव तो राजनैतिक परिवार के अराजनैतिक सदस्‍य वाला है. जहां पहले वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बहू की तरह और बाद में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पत्‍नी की तरह राजनीति को देखती रहीं. इसी अनुभव के दौरान उन्‍हें इन दोनों प्रियजनों की हत्‍या भी देखनी पड़ी. उसके बाद नरसिंह राव के जमाने में वह राजनीति से दूर राजनेता की तरह राजनीति चलाती रहीं. अंत में वह खुद राजनीति में आईं और पार्टी के शीर्ष नेता की तरह पार्टी को चलाती रहीं और चला रही हैं.

पार्टी की हर नब्‍ज को जानती हैं सोनिया
सोनिया गांधी को पार्टी के डीएनए का सही अंदाजा है. वह इस बात को बखूबी जानती हैं कि कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी की तरह तेज, आक्रामक और फुर्तीली नहीं हो सकती. उनकी पार्टी किसी बात पर आसमान सिर पर नहीं उठा सकती और न उसके बड़े नेता महंगाई के विरोध में आलू प्‍याज की माला टांगकर सड़क पर उतर सकते हैं. उन्‍हें पता है कि पार्टी में उनके बाद का शीर्ष नेतृत्‍व एक खास किस्‍म के पढ़े लिखे एलीट वर्ग से बना है, जो ऊंची आवाज में बात नहीं करता. लेकिन वह यह भी जानती है कि यह सब चीजें कांग्रेस की कमजोरी नहीं ताकत हैं. वे वीर रस या रौद्र रस की जगह शांत रस को ही कांग्रेस का स्‍थायी भाव बनाने की हामी हैं. उन्‍हें यह भी पता है कि किसी मुद्दे को कितना भी गरमा दिया जाए लेकिन अंतत: उसे ठंडा होना पड़ता है.

समाज भी किसी खास आवेग से एक दिन उतर ही आता है और जब लोगों का यह जोश उतरे तो उसके पास राजनैतिक विकल्‍प के तौर पर कांग्रेस मौजूद हो. आखिर शरद पवार भी तो कभी सोनिया के विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर कांग्रेस से अलग हुए थे, लेकिन आज कांग्रेस के सबसे करीबी नेता हैं. सोनिया जानती हैं कि राजनीति निजी राग द्वेष से नहीं बल्कि परिस्थितियों और विचारधाराओं के घर्षण से चलती है. इसमें भावुकता की बहुत कम गुंजाइश है, जो अक्‍सर जोशीले युवा नेता दिखा जाते हैं. जाहिर है यह काम पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी की तरह करिश्‍माई तो नहीं है, लेकिन यह उतना खतरनाक भी नहीं है जो सत्‍ता हासिल करने के लिए लोकतंत्र को ही दांव पर लगा दे.

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First published: November 26, 2019, 5:26 PM IST
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