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Opinion: घटनाओं से समझिए कैसे विश्व राजनीति में बढ़ रहा है पीएम नरेंद्र मोदी का कद

Opinion: घटनाओं से समझिए कैसे विश्व राजनीति में बढ़ रहा है पीएम नरेंद्र मोदी का कद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फाइल फोटो)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फाइल फोटो)

विश्व राजनीति में नरेंद्र मोदी का कद लगातार बढ़ा है, हाल की घटनाएं साक्षी हैं. आज भारत विश्व की दो परस्पर विरोधी शक्तियों का एक जैसा मित्र है. चाहे फ़लस्तीन हो या इज़राइल, ईरान हो या सऊदी अरब या इसी तरह तरह के परस्पर विरोधी देश, भारत के साथ सबके अच्छे संबंध हैं. दक्षिण एशिया में पिछले कुछ दिनों का घटनाचक्र ध्यान से देखें, तो साफ़ हो जाता है कि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में भारत का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है.

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नई दिल्ली, विश्व राजनीति में नरेंद्र मोदी का कद लगातार बढ़ा है, हाल की घटनाएं साक्षी हैं. आज भारत विश्व की दो परस्पर विरोधी शक्तियों का एक जैसा मित्र है. चाहे फ़लस्तीन हो या इज़राइल, ईरान हो या सऊदी अरब या इसी तरह तरह के परस्पर विरोधी देश, भारत के साथ सबके अच्छे संबंध हैं. दक्षिण एशिया में पिछले कुछ दिनों का घटनाचक्र ध्यान से देखें, तो साफ़ हो जाता है कि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में भारत का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है. बच्चे, युवा, बुज़ुर्ग, महिलाएं और पुरुष सबको एक अनुभव ज़रूर होगा कि जब किसी के ख़िलाफ़ एक ही समय में बहुत सारे लोग षड्यंत्र करने लगें, तो इसका सीधा सा अर्थ होता है कि वे उससे बुरी तरह भयभीत हैं या उसके दबदबे से चिढ़े हुए हैं. बिल्कुल इसी तरह दक्षिण एशिया में पिछले कुछ दिनों का घटनाचक्र ध्यान से देखें, तो साफ़ हो जाता है कि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में भारत का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है.

यही कारण है कि परंपरागत रूप से भारत के दुश्मन नंबर एक पाकिस्तान ने भारत के विरोध में कई मोर्चों के दरवाज़े पूरी तरह खोल दिए हैं. हालांकि उसे किसी मोर्चे पर बढ़त मिलती दिखाई नहीं दे रही है और न भविष्य में वह भारत को किसी भी मोर्चे पर नीचा दिखा पाएगा. वैसे अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि भारत का दुश्मन नंबर वन पाकिस्तान नहीं, बल्कि चीन है. बात एक ही है.

चीन-पाकिस्तान पर पैनी नज़र
सभी जानते हैं कि भारत का दबदबा चीन और पाकिस्तान, दोनों को ही शुरू से फूटी आंख नहीं सुहाता है और दोनों ही एक-दूसरे के हाथ पकड़ कर भारत के लिए मुश्किलें बढ़ाने में जुटे हैं. लेकिन वर्ष 2014 में केंद्र में आई नरेंद्र मोदी सरकार ने जिस तरह कई महत्वपूर्ण नीतियों में आमूल-चूल बदलाव किए हैं, उससे पाकिस्तान और चीन को तो स्पष्ट संदेश मिले ही हैं, विश्व बिरादरी भी हमारी शक्ति के प्रति अधिक आश्वस्त हुई है. 15 अगस्त, 2021 को तालिबान के हाथों काबुल के दूसरी बार पतन की पटकथा आनन-फानन में नहीं, बल्कि दो-ढाई वर्ष पहले ही कमज़ोर पड़ते जा रहे अमेरिकी कूटनय द्वारा लिख दी गई थी. पाकिस्तान भी तब से ही लार टपकाए इंतज़ार कर रहा था, चीन की चाहतों में भी तब से ही चाशनी टपक रही थी. चीन की शह पर पाकिस्तान ने तालिबान की पूरी मदद की और अब अफ़ग़ानिस्तान पर उसके क़ब्ज़े के बाद वह चाहता है कि तालिबानी बंदूकों का मुंह भारत की ओर मोड़ दे. भारत की सटीक रणनीति की वजह से हालांकि ऐसा नहीं हो पा रहा है.

टूट रहे हैं नापाक सपने
चीन चाहता है कि वह व्यापार युद्ध में अमेरिका को कमज़ोर करे और पड़ोसी भारत जैसी तेज़ी से उभरती विश्व शक्ति पर भी लगाम एक साथ लगा सके. ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान के बदले हालात उसे माफ़िक नज़र आते हैं. लेकिन चीन और पाकिस्तान, दोनों ही भौतिक शास्त्र का यह शाश्वत नियम भूल जाते हैं कि किसी भी क्रिया की सटीक और बिल्कुल उसी मात्रा में प्रतिक्रिया भी होती है. अपनी मौलिक शक्ति और उस प्रतिक्रिया से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा को साध कर विरोधी क्रिया पर सशक्त दोहरा प्रहार किया जा सकता है. मोदी सरकार ने यही किया है.
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े के क़रीब तीन महीने बाद अब पाकिस्तान के नापाक दिवास्वप्न टूटने लगे हैं. उसका मंसूबा था कि वह तालिबान को कश्मीर में आतंक और भड़काने के लिए मना लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है. 20 अक्टूबर को मॉस्को फॉर्मेट वार्ता में भारत भी शामिल हुआ. इससे पहली की बैठकों में भारत को नहीं बुलाया गया था और तब विपक्ष न इसे बड़ी नाकामी बताया था. बहरहाल, ताज़ा वार्ता में भारत को शामिल किए जाने से साफ़ है कि पूरे विश्व में अमन-चैन क़ायम रखने के लिए होने वाली वार्ताओं में भारत की अहमियत उसके दुश्मनों और कुछ रूठे हुए मित्रों को नए सिरे से समझ में आ रही है.

मदद से तालिबान पर दबाव
मॉस्को फॉर्मेट वार्ता में भारत ने मानवीय आधार पर अफ़ग़ानिस्तान की मदद का संकेत दिया है. इसके साथ ही यह भी साफ़ कर दिया गया है कि अभी तालिबान सरकार को मान्यता देने का भारत का कोई इरादा नहीं है. चीन, पाकिस्तान और रूस भले ही तालिबान की मदद कर रहे हों, लेकिन तकनीकी तौर पर तीनों ही देशों ने अभी तक तालिबान सरकार को कूटनैतिक मान्यता नहीं दी है. यह बात तालिबान को कहीं न कहीं बुरी ज़रूर लग रही होगी. क्योंकि वह लगातार इस प्रयास में है कि उसे मान्यता मिले. ऐसे में अगर चीन, पाकिस्तान और रूस यह पहल कर देते हैं, तो फिर यह सिलसिला आगे बढ़ सकता है. लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है. भारत ने तो तालिबान के पिछले शासन को भी मान्यता नहीं दी थी. ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान की मदद जारी रखने, वहां अधूरे पड़े प्रोजेक्ट पूरे करने के मोदी सरकार के निर्णय को अप्रत्याशित समझ कर तालिबान यक़ीनन भारतीय दबाव में आएगा. वह ऐहसान के बोझ तले दबने की मानसिकता में आएगा, यह तय है. मोदी सरकार लगातार प्रयासरत है कि अफ़ग़ानिस्तान की धरती का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए नहीं हो सके. अब लगता है कि भारत की यह मंशा पूरी होती दिखाई दे रही है. यही कारण है कि पाकिस्तान तालिबान के रवैये से कुछ-कुछ खन्न नज़र आ रहा है और इसी झल्लाहट में भारत को अशांत करने के प्रयास उसने बढ़ा दिए हैं.

बढ़ी है भारत की रफ़्तार
हमारे शत्रु पिछले दिनों से हमें घेरने के लिए सामूहिक षड्यंत्र रचने में लगे हैं, तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि अपनी सशक्त और सक्षम विदेश नीति के ज़रिए भारत विश्व शक्ति बनने की और जितनी तेज़ी से अभी अग्रसर है, उतना कभी नहीं था. आइए, एक नज़र डालते हैं अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े से कुछ पहले और फिर बाद के घटनाक्रम पर. अगस्त के पहले हफ़्ते में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में हिंदू मंदिर पर बड़े हमले की ख़बर आई. पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर दोषियों पर कार्रवाई के लिए पाकिस्तान प्रशासन को मजबूर किया और बहुत से लोग गिरफ्तार किए गए. लेकिन पहले से ही डरे हुए अल्पसंख्यक हिंदुओं में दहशत और बढ़ ही गई. पलायन की कुछ ख़बरें आई भीं. इसके कुछ दिन बाद यानी 15 अगस्त को काबुल के राष्ट्रपति भवन पर तालिबान का क़ब्ज़ा हो गया. समावेशी सरकार बनाने और भारत को निश्चिंत रहने का संदेश देने के बावजूद तालिबान ने अल्पसंख्यक हिंदू और सिखों को आतंकित करने में कसर नहीं छोड़ी. नतीजा यह हुआ कि हिंदू और सिख पलायन के लिए मजबूर हो गए. सितंबर तक ज़्यादातर भारत आ गए. इसके बाद अक्टूबर महीने में जम्मू कश्मीर में हिंदुओं और सिखों की हत्या की गई. नतीजा यह हुआ कि कश्मीर घाटी से हिंदुओं के पलायन की तस्वीरें दिखाई देने लगीं. इसके बाद 13 अक्टूबर को बांग्लादेश में षड्यंत्रपूर्वक दुर्गा पूजा के एक पंडाल में हनुमान जी की प्रतिमा के चरणों में कुरान की प्रति रख कर हिंदुओं के प्रति बड़े पैमाने पर हिंसा भड़का दी गई. बांग्लादेश में हिंदू भयभीत हैं और पलायन का वातावरण बन गया है.

खुल चुकी है पाकिस्तान की पोल
उपरोक्त सभी घटनाक्रम कश्मीर और पड़ोसी देशों में इस्लामी कट्टरपंथी जेहाद के द्वारा हिंदुओं को आतंकित करने से संबंधित हैं. ज़ाहिर है कि यह महज़ संयोग नहीं हो सकता. इन सारे घटनाक्रमों के पीछे पाकिस्तान ही है, यह साबित करने के लिए किसी गणित की ज़रूरत नहीं है. धार्मिक आधार पर आतंकवाद को भड़काने की साज़िशें रचने में पाकिस्तान का ही मुख्य हाथ रहता है, एबटाबाद में लादेन के मारे जाने के बाद यह पूरी दुनिया जानती है. अफ़ग़ानिस्तान में 20 वर्षों तक मौजूद रहने के बावजूद कामयाबी हासिल नहीं कर पाने की अमेरिकी तिलमिलाहट से ज़्यादा पाकिस्तान के दोहरे रवैये के बारे में कौन समझ सकता है? इस समय पूरी दुनिया में 80 ऐसे ख़तरनाक बर्बर आतंकी संगठन हैं, जो जेहाद के नाम पर ख़ून बहाने में लगे हुए हैं. ये कट्टर इस्लामी मान्यताओं को दुनिया पर थोपना चाहते हैं. दुनिया भर में आतंक का ख़ूनी खेल खेल रहे इन सभी संगठनों की जड़ें पाकिस्तान में हैं.

पड़ोस और सुदूर में भारत की धमक
भारत की मोदी सरकार ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया है. यह भी साबित कर दिया है कि अगर हिमाक़त बढ़ी, तो करारा जवाब मिलेगा. जुलाई में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था मज़बूती से प्रकट करते हुए आतंकवाद के साथ-साथ चीन और पाकिस्तान को आइना दिखाया. सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन में नाम लिए बिना पाकिस्तान और चीन को खरीखोटी सुनाते हुए नसीहतें दीं. इससे पहले 24 सितंबर को मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और जापान के प्रधानमंत्री योशीहिदे सुगा के साथ क्वाड शिखर सम्मेलन में शामिल हुए. वहां भी आतंकवाद की कमर तोड़ने पर सहमति बनी. बाइडेन के साथ वन टू वन मुलाक़ात में भी मोदी प्रभावशाली नज़र आए.
भारत के बढ़ते प्रभाव के कारण ही अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश में हिंदुओं के प्रति हिंसा के तुरंत बाद निंदा करते हुए कहा कि धर्म चुनने की आज़ादी, मानवाधिकार है. दुनिया के किसी भी धर्म या आस्था को मानने वाले व्यक्ति को अपने त्यौहार मनाने के लिए सुरक्षित महसूस करना जरूरी है. वहीं, संयुक्त राष्ट्र ने बांग्लादेश सरकार से हिंदुओं पर हिंसा रोकने के लिए कार्रवाई की अपील की. संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले उसके संविधान में निहित मूल्यों के खिलाफ हैं. प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार को घटनाओं की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने की जरूरत है. इस त्वरित वैश्विक प्रतिक्रिया का कारण मोदी सरकार के प्रयासों की वजह से भारत का बढ़ा दबदबा ही है.

नकारात्मक राजनीति न करे विपक्ष
भारत में विपक्षी पार्टियां मोदी सरकार की विदेश नीति पर असफलता का आरोप लगाकर भले ही अरण्य रोदन में लगी हुई हैं, लेकिन उन्हें पता है कि सच्चाई क्या है. विपक्ष के घड़ियाली आंसू मीडिया में सुर्ख़ियां बनाने भर के लिए हैं. हक़ीक़त यह है कि मोदी सरकार आने के बाद जिस तरह अंदरूनी मामलात पर ध्यान दिया गया है, उसी तरह अंतर्राष्ट्रीय कूटनय पर. यही कारण है कि आज भारत विश्व की दो परस्पर विरोधी शक्तियों का एक जैसा मित्र है. चाहे फ़लस्तीन हो या इज़राइल, ईरान हो या सऊदी अरब या इसी तरह तरह के परस्पर विरोधी देश, भारत के साथ सबके अच्छे संबंध हैं. बात चाहे पड़ोसी देशों की हो या विश्व के बड़े शक्ति समीकरणों की, आज भारत का दबदबा पूरी दुनिया एकमत से मान रही है. इसके लिए मोदी सरकार की प्रशंसा न की जाए, तो यह बहुत बड़ी भूल ही होगी. विपक्ष की राजनीति को विश्व कूटनय में मोदी सरकार की धमक सुनाई ज़रूर देती है, लेकिन वह स्वार्थवश बहरा बनने का नाटक करती है, तो यह सही बात नहीं है. कम से कम भारत के दोबारा विश्व गुरु बनने के सफ़र में साथ रहिए.

Tags: Narendra modi, Pm narendra modi, Prime Minister Narendra Modi

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