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OPINION: हम सब गांधी के हत्यारे हैं

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Updated: November 28, 2019, 12:15 PM IST
OPINION: हम सब गांधी के हत्यारे हैं
फ़ाइल फोटो

लोकसभा में डीएमके सांसद ए. राजा की ओर से एसपीजी संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान एक बार फिर बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने महात्मा गांधी के हत्यारे को 'देशभक्त' कहा है.

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  • Last Updated: November 28, 2019, 12:15 PM IST
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(अनुराग अन्वेषी)

मध्य प्रदेश के भोपाल से बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एक बार फिर महात्मा गांधी के हत्यारे को 'देशभक्त' कहा है. दरअसल बुधवार को लोकसभा में डीएमके सांसद ए. राजा ने एसपीजी संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान एक टिप्पणी की. वह कह रहे थे, ‘महात्मा गांधी हत्याकांड में जब अपीलीय अदालत में अपील दायर की गई थी तब गोडसे ने एक बयान दिया था, मैं उसके कुछ वाक्य पढ़ने की अनुमति चाहूंगा. मैं उद्धृत करता हूं...’ गोडसे का अदालत में दिया बयान वह पढ़ ही रहे थे कि हस्तक्षेप करते हुए साध्वी प्रज्ञा ने गोडसे को देशभक्त बताया. यह कोई पहली बार नहीं है. यह तब है जब प्रधानमंत्री ने इससे पहले दिए साध्वी के ऐसे ही बयान पर कहा था कि वह साध्वी प्रज्ञा को दिल से कभी माफ नहीं करेंगे.

अभी हाल ही में जब जलियांवाला बाग नेशनल मेमोरियल संशोधन बिल राज्यसभा में पेश किया गया था, तब इस मसले पर बोलते हुए बीजेपी सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा ‘भविष्य में यह नहीं कहा जाना चाहिए कि हमने आजादी बिना रक्त बहाए पाई है.’ उन्होंने कहा कि हम कभी यह नहीं कहेंगे कि आजादी हमें बिना खड्ग और ढाल के मिल गई. आजादी का संघर्ष ही तब शुरू हुआ, जब हजारों लोगों ने गोलियां झेलीं और अपना खून बहाया. सुधांशु त्रिवेदी को गांधी विरोध शायद इतना भाता है कि वह इस गीत का मूल स्वर भूल गए. यह गीत यह नहीं कहता कि देश के लोगों ने गोलियां नहीं झेलीं, वह तो यह कहता है कि महात्मा ने देश के लोगों को अहिंसा नाम का वह औजार दिया, जिसके बल पर हमें आजादी मिली. इससे पहले बताने वालों ने तो गांधी की जाति तलाश कर उपहास स्वरूप उन्हें बनिया भी बताया है. गांधी विरोध के नाम पर कभी गोडसे की मूर्ति बनवाई जाती है तो कभी गांधी की प्रतिमा को गोली मारी जाती है.

जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने तो महात्मा गांधी को ब्रिटिश एजेंट बता दिया था. उन्होंने गांधी के जादू को समझने की जगह घटनाओं की बड़ी सपाट व्याख्या कर दी और उन पर वे आरोप मढ़ दिए जो किसी ने नहीं लगाए थे. किसी ने उन्हें कभी ब्रिटिश एजेंट नहीं माना और न ही हिंदू-मुस्लिम समुदायों में दरार डालने वाला. काटजू अगर यहां तक सोच पाए तो इसलिए कि शायद उनकी सोच का दायरा यहीं तक जाता है. धार्मिकता और सांप्रदायिकता में फर्क होता है, यह फर्क वो देख ही नहीं पाए. वो भूल गए कि जिस महात्मा को उन्होंने ब्रिटिश एजेंट कहा, उसी महात्मा की आंखें ब्रिटिश हुकूमत से आंख मिलाती रहीं. महात्मा की आंखों ने ही ब्रिटिश शासन को आंखें नीची करने पर बाध्य किया.

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गांधी ने हमेशा ही विरोध और प्रतिरोध झेले
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गांधी के जाने के बाद गाहे-बगाहे उठते विरोध के ये स्वर यह ध्यान दिलाते हैं कि महात्मा गांधी को धार्मिक, परंपरावादी और कठमुल्ला तक बताने वालों की कमी नहीं रही है. सच तो यह है कि अपने जीवन काल में गांधी ने कहीं ज्यादा विरोध और प्रतिरोध झेले. नेहरू और आंबेडकर दोनों अपनी-अपनी वजहों से उनकी आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत की अवधारणा को संदेह से देखते रहे. दोनों को उनकी पारंपरिकता अलग-अलग ढंग से तंग करती रही. कवि गुरु रवींद्र नाथ टैगोर गांधी से गहरी असहमति रखते थे और सुभाष चंद्र बोस गहरी नाराजगी. पर क्या गोडसे की मूर्तियां बनवाने वाले या उसे देशभक्त बताने वाली जमात यह समझ पाएगी कि इस देश में गोडसे कभी जिंदा नहीं हो सकता. पर असल सवाल यह है कि इस देश में वो कौन सी वैचारिकी है जो गांधी का विरोध करती है. यह वही वैचारिकी है जिसने गोडसे को पैदा किया, जहां से साध्वी प्रज्ञा आईं. यह वही वैचारिकी है जो धर्म का नाम लेकर सांप्रदायिकता को पोसती है. जो भारत-माता की जड़ मूर्ति बनाती है और राष्ट्रवाद को सांप्रदायिक पहचान के आधार पर बांटती है. यह बात दुहराए जाने की है कि गांधी धार्मिक थे. लेकिन वो धर्म के कर्मकांड की अवहेलना करते हुए उसका मर्म खोज लाते थे. उनके धर्म की ताबीज और उसके मर्म से एक ऐसी राजनीति सधती थी जो एक नया देश और नया समाज बना सकती थी.

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गांधी के आग्रहों का कई बार उपहास उड़ाया जाता रहा है
हमें यह समझना होगा कि गांधी की इस धार्मिकता से न परंपरावादी मुस्लिम घबराते थे न परंपरावादी हिंदू डरते थे. यह सांप्रदायिक हिंदुत्व था जिसकी शिकायत थी कि गांधी मुसलमानों के प्रति बहुत उदार हैं और पाकिस्तान के साथ ममत्व भरा बरताव कर रहे हैं. यही वह वैचारिकी है जो बार-बार साध्वी प्रज्ञा जैसे लोगों को उकसाती है. एक दौर था जब गांधी धीरे-धीरे अपनी सनातनी परंपरा को लगातार प्रश्नांकित कर रहे थे. पर उस समय भी कुछ लोग उन्हें उनकी पारंपरिकता के आधार पर कट्टर हिंदू बताते रहे. उन्होंने सायास और अनायास इस बात को नजरअंदाज किया कि अपने समय में अस्पृश्यता के खिलाफ गांधी ने जो विराट संग्राम छेड़ा, उसने भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के ऊपर आने में बड़ी भूमिका अदा की. अपनी सोच की सफाई को लेकर गांधी का आग्रह दुराग्रह की सीमा तक जाता दिखता है. गांधी के ऐसे आग्रहों का कई बार उपहास उड़ाया जाता रहा. इस उपहास ने हमें इन आग्रहों के मर्म तक जाने से रोका और हम समझ ही नहीं पाए कि दुराग्रह की सीमा तक पहुंचा गांधी का आग्रह अपने वक्त के भारतीय समाज के कहीं ज्यादा बड़े दुराग्रह से मुठभेड़ कर रहा था. ऐसे समय में गांधीजी की यह स्वीकारोक्ति याद रखने लायक है, ‘पहले मै ईश्वर को सत्य मानता था, लेकिन अब सत्य को ईश्वर मानने लगा हूं.'

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भारतीय समाज गांधी के विचारों के रेशे से बंधा हुआ समाज है
एक सवाल मन में और घुमड़ता है कि आखिर इतने विरोधों के बावजूद फिर यह वैचारिकी गांधी के अनुसरण का ढोंग क्यों करती है? दरअसल, भारतीय समाज में अपनी पैठ बनाने के लिए इस वैचारिकी को गांधी नाम की लाठी का सहारा चाहिए. यह वैचारिकी जानती है कि भारतीय समाज अंततः गांधी के विचारों के रेशे से बंधा हुआ समाज हैं जहां गांधी विरोध की धारा इस वैचारिकी को हाशिये पर ठेलती है. इसलिए वह घूम-फिर कर महात्मा के पास लौटने का उपक्रम करती है. पर यह सोचनीय है कि हाल के वर्षों में गांधी के विचारों की ओट में उन्हें जड़ मूर्ति में तब्दील करने की कोशिशें तेज हुई हैं.

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गांधी के नाम पर विलाप काफी हास्यास्पद है
अगर ताजा घटनाक्रमों की ओर लौटें तो यह सवाल पैदा होता है कि आखिर गांधी के हत्यारे को देशभक्त बताने पर हायतौबा करने का नैतिक अधिकार हमारे पास है? गांधी के नाम पर जो विलाप हम कर रहे हैं, दरअसल वह हास्यास्पद है. अगर हम गांधी के रास्ते पर चले होते तो शायद यह नौबत ही नहीं आती. यह बात अब स्वीकार करनी पड़ती है कि गांधी के गुनहगार दोनों हैं - उनको मानने वाले भी और उनको मारने वाले भी. बल्कि सच तो यह है कि गांधी को मानने का दावा करने वालों का गुनाह कहीं ज्यादा बड़ा है. उन्होंने गांधी को नीयत से और नीति से हटने का काम बरसों पहले बेहद चुपचाप किया. फर्क बस इतना है कि मानने वालों ने दस्ताने पहन कर गांधी को मारा, जबकि विरोधी वैचारिकी ने दस्ताने उतारकर.

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First published: November 28, 2019, 12:15 PM IST
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