OPINION: क्या है राज्यसभा में हरिवंश बाबू की जीत के मायने?

हरिवंश नारायण सिंह के लिए असली चुनौती तो तब शुरू होगी जब रोजमर्रा के झंझटों से उभरे गतिरोध को आसन पर बैठकर उन्हें सुलझाना होगा.

अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 12:38 PM IST
OPINION: क्या है राज्यसभा में हरिवंश बाबू की जीत के मायने?
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश (फाइल फोटो)
अमिताभ सिन्हा | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 12:38 PM IST
'अब राज्यसभा हरि भरोसे'- राज्यसभा में एनडीए उपसभापति उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह की जीत के बाद पीएम मोदी ने जैसे ही ये बात कही, तमाम सांसदों के चेहरों पर मुस्कुराहट आ गई. आखिरकार कई हफ्तों से अटके पड़े चुनाव को लेकर एनडीए-यूपीए में आर-पार की लड़ाई के कारण आई तल्खी भी खत्म हो गयी. हरिवंश जब राज्यसभा में नेता विपक्ष के साथ बनी अपनी सीट पर बैठे तो खुद पीएम मोदी ने वहां जाकर उन्हें बधाई दी. फिर क्या था सबने उनकी पत्रकारिता और उनके सादगी भरे जीवन की तारिफों के पुल बांध दिए. लेकिन उनके लिए असली चुनौती तो तब शुरू होगी जब रोजमर्रा के झंझटों से उभरे गतिरोध को आसन पर बैठकर उन्हें सुलझाना होगा.

पिछले 26 सालों से उपसभापति के पद का चुनाव निर्विरोध होता आया था. आखिरी बार राज्यसभा के उपसभापति के पद के लिए चुनाव 1992 में नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार के दौर में हुआ था. न्यूज 18 इंडिया की 'बैठक' में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने साफ कर दिया था कि जीत एनडीए उम्मीदवार की ही होगी और अगर निर्विरोध चुनने की प्रकिया को इस बार झटका लगा है तो वो सिर्फ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के टकराव के रुख के कारण रहा है.

कांग्रेस ने भी तय किया था कि एनडीए उम्मीदवार के लिए रास्ता आसान नहीं होने देंगे. तभी तो उन्होंने पहले डीएमके के त्रीची शिवा और एनसीपी को उम्मीदवार बनाने का प्रस्ताव दिया. लेकिन नीतीश कुमार की बीजेडी और टीआरएस से बातचीत के बाद शरद पवार भी समझ गए कि अब दाल गलने वाली नहीं है तो उन्होंने भी उम्मीदवार खड़े करने से इंकार कर दिया. आखिरकार कांग्रेस को अपने सांसद हरि प्रसाद को मैदान में उतारना पड़ा.

चुनौती तो दोनों एनडीए और यूपीए को थी. असंतोष दोनों पक्षों में उभरा था. कांग्रेस अपने सहयोगियों को उम्मीदवारी देने को तैयार बैठी थी तो बीजेपी को हरिवंश जी को उम्मीदवार बनाना भी आसान नहीं था. पुराने सहयोगी अकाली दल को उम्मीद थी कि ये पद उन्हीं को मिलेगा. तभी तो नाम के ऐलान के फौरन बाद अकाली दल का असंतोष उभर कर सामने आया. शिवसेना को मनाना भी एक चुनौती थी. लेकिन जब नामांकन भरने का समय आया तो दोनों पार्टियां बीजेपी के साथ खड़ी नजर आयीं और जीत के बाद उन्हें बधाई देने से पीछे वो नहीं रहे.

ये मानना होगा कि नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू का उम्मीदवार बनाया जाना पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के राजनीतिक कौशल का परिणाम रहा. बीजेपी और एनडीए के कुल 92 वोट थे. जबकि जरूरत थी 122 वोटों की. ऐसे में नीतीश कुमार ने बीजेडी सुप्रीमो नवीन पटनायक से बात की. साथ ही उन्होंने टीआरएस के मुखिया और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव से भी बात कर उन्हें मना लिया. यानि बीजेडी के 9 और टीआरएस के 6 सांसदों का समर्थन पक्का हो गया. तीन निर्दलीय सांसदों का समर्थन जुटाया. तीन नामांकित सांसदों का वोट अपने पक्ष में किया. साथ ही एआईएडीएमके के 13 सांसदों का वोट उन्होंने पहले ही सुनिश्चित कर रखा था. जाहिर है जब वोटिंग से पहले एनडीए की बैठक हुई तो साफ हो हो गया कि कुल 244 में से 125 से ज्यादा वोट एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में पडेंगे.

ये तो थी चुनाव के पीछे की राजनीति. हम बात करते है कि इस चुनाव में किसने क्या खोया और क्या पाया. पहले बात एनडीए की. एक बात तो साफ हो गयी कि अब तक राज्यसभा में पटखनी खा रही बीजेपी को चाल चलना आ गया है. उनके पास नंबर भी हो गए है जिसके बूते वो आने वाले दिनों में नए बिल पास करवा सकेंगे. दूसरा जेडीयू को आगे कर नीतीश के कंधे पर दूसरे समाजवादी नेताओं को साथ लाने की मुहिम भी सफल हो गयी है. बीजेडी और टीआरएस जैसे संभावित सहयोगी भी सामने आए. तीसरे खुद अमित शाह संसद में बैठ कर एक के बाद एक बैठकें करते रहे. शिवसेना ने तल्खी दिखाई तो सीधे उद्धव ठाकरे से बात की. अकाली नाराज हुए तो उन्हें भी मनाया. यानि एक अरसे के बाद एनडीए की एकजुटता सामने आयी.

उधर कांग्रेस ने भी इस लड़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी. उन्होंने राहत की सांस ली कि आखिर 100 से ज्यादा वोट तो उन्हें मिले. सबसे बड़ा झटका ये कि राज्य सभा में आजादी के बाद से चला आ रहा वर्चस्व इस बार खत्म हो गया. मोदी सरकार के कई बिल राज्य सभा में ही अटक जाते थे लेकिन अब स्थिति कुछ और होगी.

राहुल गांधी की कांग्रेस बीजेपी से नाराज गुटों को एकजुट नहीं रख सकी. देश भर में महागठबंधन बनाने की मुहिम में लगे राहुल को गैर बीजेपी गैर एनडीए वोट भी पूरे नही मिल पाए. 3 सांसदों वाली आम आदमी पार्टी ने ताल ठोकनी शुरू की और कहा कि जब तक राहुल केजरीवाल से बात नहीं करेंगे वो उनके पक्ष में वोट नहीं देंगे. साफ है कि देश भर में एक गठबंधन को अंतिम रूप देने में राहुल गांधी और कांग्रेस के रणनीतिकारों को अभी खासी मशक्कत करनी पड़ेगी.  लेकिन हार के बाद भी सोनिया गांधी ने हिम्मत न हारने वाला स्टैंड लेते हुए कहा कि चुनावों में जीत हार तो चलती ही रहती है.

इसे एक मिनी इलेक्शन कहा जा सकता है जहां देश के तमाम राज्यों के सांसद मौजुद रहते हैं और वोट करते हैं. इसे मिशन 2019 का ट्रेलर माने तो बीजेपी अब यही कहेगी कि मोदी सरकार का कोई विकल्प नहीं है और महागठबंधन के नारे खोखले हैं.

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