OPINION | राजनीति में तीसरी पीढ़ी की एंट्री के ये हैं मायने?

देश में गांधी परिवार को छोड़कर 12 ऐसे राजनीतिक घराने हैं, जिनकी तीसरी पीढ़ी या तो राजनीति में उतर चुकी है या उतरने की तैयारी में है. महाराष्ट्र इसका ताजा उदाहरण है.

News18Hindi
Updated: March 16, 2019, 12:11 PM IST
OPINION | राजनीति में तीसरी पीढ़ी की एंट्री के ये हैं मायने?
शरद पवार-उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस
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Updated: March 16, 2019, 12:11 PM IST
(वेंकटेश केसरी)

राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद को नई बात नहीं है. गांधी परिवार पर अक्सर परिवारवाद के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन अगर राजनीतिक घरानों पर नजर डालें, तो हम पाएंगे कि परिवारवाद की कमी नहीं है. देश में गांधी परिवार को छोड़कर 12 ऐसे राजनीतिक घराने हैं, जिनकी तीसरी पीढ़ी या तो राजनीति में उतर चुकी है या उतरने की तैयारी में है. महाराष्ट्र इसका ताजा उदाहरण है.

मावल से पार्थ पवार के रूप में शरद पवार की तीसरी पीढ़ी की राजनीति में एंट्री हो चुकी है. शरद पवार की पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) ने अपने उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट जारी की, जिसमें अजीत पवार के बेटे पार्थ पवार का नाम भी शामिल है. अजीत पवार शरद पवार के भतीजे हैं. महाराष्ट्र की राजनीति में तीसरी पीढ़ी को एंट्री दिलाने में सिर्फ शरद पवार ही नहीं, बल्कि और भी नेता शामिल हैं. विखे परिवार की तीसरी पीढ़ी सुजय विखे पाटिल के हाल ही में राजनीति में एंट्री ने वंशवाद की बात एक बार फिर से साबित कर दी.



कुल मिलाकर तथ्य ये है कि इस लोकसभा चुनाव में हर कोई स्थानीय स्तर से शीर्ष तक एक राजवंश बनाने की कोशिश कर रहा है.

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'मूल्यों और सिद्धांत बाद में, परिवारवाद सबसे पहले'. कभी महात्मा फुले, शाहूजी महाराज और भीमराव आंबेडकर की बातों को आदर्श मानने वाली राजनीति की अब यही सच्चाई है.

महाराष्ट्र की तरह करीब-करीब सभी राज्यों में राजनीतिक दलों में वंशवादी कार्ड चलन में है. अभी तक सिर्फ लेफ्ट ही इस वायरस से बची हुई है. ये वंश कार्ड लोकसभा चुनाव में जमकर चलाया जा रहा है. जाहिर सी बात है लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनावों में भी ये वंश कार्ड खूब चलेगा.
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बीजेपी कई मौकों पर कांग्रेस को परिवारवाद और वंशवाद पर भले ही घेरती आई हो और 'एक चायवाले' के प्रधानमंत्री बनने की बात करती हो, लेकिन वंशवाद के मामले में ये पार्टी भी पीछे नहीं है. यहां तक कि महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस जो पिछले पांच साल में एक मजबूत नेता के तौर पर उभरे, वो खुद भी वंशवाद की वजह से राजनीति में हैं. उनके पिता गंगाधर फडणवीस बीजेपी विधायक रह चुके हैं. लेकिन निश्चित तौर पर राजनीति में वंशवाद को बढ़ाने का क्रेडिट कांग्रेस पार्टी को ही जाता है.


कांग्रेस भले ही अभी बुरे दौर से गुजर रही हो, लेकिन कांग्रेस भले ही बुरे दिनों में गिर गई हो, लेकिन यह समझना होगा कि मई 2014 में मोदी लहर के समय कांग्रेसियों और अन्य विपक्षी नेताओं के रूप में बीजेपी ने राज्य में अपना ग्राफ बढ़ाया है.

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महाराष्ट्र में कई नेता धीरे-धीरे वंशवाद का ग्राफ बढ़ा रहे हैं. यहां कई नेता अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को राजनीति में एंट्री दिलाने में जुटे हैं. ताकि राजनीति में उनका 'फैमिली बिजनेस' चल सके. ये इसलिए है, क्योंकि राजनीति में वंशनाद आज के समय की पहचान और वास्तविकता बन गई है. राजनीतिक दल इसी के हिसाब से अपनी विचारधारा को विकसित कर रहे हैं.

महाराष्ट्र में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व विधानसभा में विपक्ष के नेता राधाकृष्ण विखे पाटिल के बेटे सुजय विखे पाटिल मंगलवार को बीजेपी में शामिल हो गए. सुजय ने कहा, 'मैंने अपने पिता की इच्छा के खिलाफ फैसला लिया है. मुझे नहीं पता कि मेरे इस कदम को मेरे माता-पिता कितना पसंद करेंगे. लेकिन मैं बीजेपी के निर्देशन में काम करते हुए अपने माता-पिता को गौरवान्वित महसूस करने का प्रयास करूंगा. मुख्यमंत्री और बीजेपी के विधायकों का रुख काफी सहयोगी है और मुझे फैसला लेने में उन्होंने मेरी मदद की.'

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हालांकि, बीजेपी पहले ही कह चुकी है कि इस बार मौजूदा सांसदों के परिवार में से किसी को टिकट नहीं दिया जाएगा. इसमें फडणवीस का नाम भी शामिल है. फडणवीस के अलावा, मुंडा, महाजन, खडेस, गावित जैसे अन्य राजनीतिक परिवार हैं, जिनके सदस्य वर्तमान में संसद के सदस्य हैं. पंकजा, दिवंगत उप मुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे की बेटी हैं.

बीजेपी से इतर कांग्रेस और एनसीपी तहसील से लेकर स्टेट लेवल तक वंशवाद को आगे बढ़ाने का काम कर रही है. कांग्रेस के तीन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, पृथ्वीराज चौहान और दिवंगत सुधाकर राव नाइक वंशवाद की वजह से ही राजनीति में आए.


चव्हाण के अलावा पाटिल, पवार, देशमुख, शिंदे, राणे, थोराट, कोडमा, मुंडे, क्षीरसागर, मेघ और गाविस राज्य की राजनीति को नियंत्रित कर रहे हैं. प्रकाश आंबेडकर की पैठ दलितों में इसलिए हैं, क्योंकि वह भीमराव आंबेडकर के पोते हैं. आदित्य ठाकरे की शिवसेना में इसलिए धाक है, क्योंकि उनकी पहचान शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे और बाल साहेब ठाकरे के पोते के रूप में है.

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राजनीति में परिवारवाद के बढ़ते दायरे को लेकर जानेमाने अमेरिकी कारोबारी ने कहा था, 'जब आप जीत रहे हैं, तब आप वंशवाद बनाने की कोशिश कर रहे हैं.' मौजूदा राजनीति में ये बात बिल्कुल सही साबित होती है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

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