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Opinion: एक के बाद एक नए संकट में घिरती जा रही है कांग्रेस

एक के बाद एक नए संकट में घिरती जा रही है कांग्रेस. (file pic)

एक के बाद एक नए संकट में घिरती जा रही है कांग्रेस. (file pic)

अगस्त के महीने में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) को चिट्ठी लिखकर पार्टी को नया नेतृत्व देने की मांग करने वाले नेता 5 राज्‍यों में चुनाव के समय भी राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की टांग खींचने से बाज नहीं आ रहे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 3, 2021, 10:36 AM IST
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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो चुका है. चुनावी प्रक्रिया जारी है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी इन चुनाव में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन के लिए जी तोड़ मेहनत में जुटे हुए हैं. वहीं कांग्रेस में सिरफुटव्वल जारी है. अगस्त के महीने में सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर पार्टी को नया नेतृत्व देने की मांग करने वाले नेता ऐसे वक्त भी राहुल गांधी की टांग खींचने से बाज नहीं आ रहे. पार्टी में नेतृत्व के सवाल के साथ अब कांग्रेस में पश्चिम बंगाल, केरल और असम में मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ गठबंधन को लेकर भी पार्टी में कई वरिष्ठ नेताओं ने आलाकमान के फैसले पर सवाल उठाए हैं.

पार्टी के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर सवाल
कांग्रेस में शायद यह पहला मौका है जब पार्टी के अंदर से कांग्रेस के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर सवाल उठे हैं. दरअसल पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने पीरज़ादा मौलाना अब्बास उद्दीन की पार्टी इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ गठबंधन किया है. इस फैसले पर कांग्रेस में घमासान मच गया है. पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में उपनेता रहे आनंद शर्मा ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कह दिया है कि कट्टरपंथी सोच के लोगों के साथ गठबंधन करना नेहरू गांधी की विचारधारा के खिलाफ है. इतना अहम फैसला करने से पहले कांग्रेस कार्यसमिति में इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए थी. गौरतलब है कि असम में कांग्रेस का गठबंधन एआईयूडीएफ के साथ है तो केरल में बरसों से मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस का चुनावी गठबंधन चला रहा है.

आनंद शर्मा के सुर में सुर मिलाते हुए प्रियंका गांधी के बेहद क़रीबी और सलाहकार आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भी कहा है कि कांग्रेस को कट्टरपंथी सोच वाले राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन नहीं करना चाहिए. कांग्रेस के मध्य मार्ग की पार्टी है लेकिन पार्टी में ही कुछ लोग इसे वामपंथ की तरफ़ ले जाना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि कांग्रेस तभी तक कांग्रेस है जब तक वो मध्य मार्ग पर है. जैसे ही वह दाएं-बाएं होती है वो अपनी पहचान खो देती है. कांग्रेस को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि थोड़े से चुनावी फायदे के लिए अपनी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से समझौता न करे.
मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ कांग्रेस के गठबंधन को लेकर अंदर सही उठे सवालों के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोल दिया है. कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष छवि को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. दरअसल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति भाजपा के अनुकूल है. कांग्रेस के इस क़दम से भाजपा को पांचों राज्यों के चुनाव में ध्रुवीकरण कराने का मौका मिल गया है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता इस बात को लेकर हैरान है कि जिस वक्त पार्टी को एकजुट होकर चुनाव में उतरना चाहिए ऐसे समय में पार्टी में अंदरूनी जंग छिड़ी हुई है. निश्चित तौर पर इसका ख़ामियाजा पार्टी को पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है.



वैचारिक दुविधा और तालमेल की कमी
गठबंधन के सवाल पर जहां कांग्रेस वैचारिक दुविधा में फंसी है वही पार्टी नेताओं के बीच तालमेल की भी जबरदस्त कमी देखने को मिली है. के बाद आनंद शर्मा के सवाल उठाने के बाद लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने दावा किया था कि कांग्रेस ने सीधे तौर पर आईएसएफ के साथ गठबंधन नहीं किया है. उनका गठबंधन वामपंथी दलों के साथ है. कांग्रेस ने गठबंधन में मिली अपनी 92 सीटों में से एक सीट भी आईएसएफ के लिए नहीं छोड़ी है. लेकिन सीटों के बंटवारे पर हुई गठबंधन के नेताओं की बैठक में वामपंथी दलों ने कांग्रेस से कई सीटें आईएसएफ के लिए छोड़ने का दबाव बनाया तो अधीर रंजन चौधरी बैठक से बाहर आ गए. इससे साफ पता चलता है इस गठबंधन को लेकर पार्टी की पश्चिम बंगाल इकाई और आलाकमान के बीच किसी तरह का तालमेल नहीं है.

जी-23 के तीखे होते तेवर
अगस्त के महीने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर पार्टी को नेतृत्व देने की मांग करने वाले नेताओं की गतिविधियां अचानक बढ़ गई हैं. हाल ही में जम्मू में गांधी ग्लोबल के मंच पर इन नेताओं ने कांग्रेस आलाकमान को जमकर खरी-खोटी सुनाई. इस कार्यक्रम में मंच पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के फोटो नदारद थे. इसे सोनिया नेहरू-गांधी परिवार के खिलाफ बगावत माना जा रहा है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन नेताओं की लामबंदी निकट भविष्य में कांग्रेस को दोफाड़ करने का संकेत दे रही है. जी 23 गुट ने खुद को असली कांग्रेस बताकर यह साफ संकेत दिया है कि अगर पार्टी में नेतृत्व का मसला हल नहीं हुआ तो अब वह अलग रास्ता अख्तियार करने भी पीछे नहीं हटेंगे.

जी-23 पर भाजपा के साथ सांठगांठ के आरोप
जबसे कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी है तबसे उन पर भाजपा से साठगांठ के आरोप लग रहे हैं. अगस्त में हुई हंगामेदार कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी ने ये आरोप लगाया था कि भाजपा से साठगांठ करके यह चिट्ठी लिखी गई है. इस पर काफी बवाल मचा था. तब गुलाम नबी आजाद ने खुली चुनौती दी थी कि अगर भाजपा से साठगांठ के आरोप साबित हो जाए तो वह राजनीति से संन्‍यास ले लेंगे. तब आजाद ने कहा था कि वह कांग्रेसी हैं और मरते दम तक कांग्रेसी ही रहेंगे. यही बात आनंद शर्मा और बाकी अन्य नेताओं ने भी कही थी.

हालांकि कांग्रेस आलाकमान की तरफ से यह साफ कर दिया गया था कि चिट्ठी लिखने वालों ने पार्टी के खिलाफ कोई काम नहीं किया और ना ही इसे पार्टी के खिलाफ बगावत माना जाए. लेकिन इसके बावजूद चिट्ठी लिखने वाले नेताओं पर पार्टी के छोटे-बड़े नेताओं के हमले कम नहीं हुए. पार्टी आलाकमान ने इन पर हमला बोलने वालों के खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं की. गुलाम नबी आजाद को पार्टी से निकाले जाने तक की मांग हुई. लेकिन सोनिया और राहुल मूकदर्शक बने देखते रहे. चिट्ठी लिखने वाले नेताओं की कांग्रेस निष्ठा पर सवाल उठाना पार्टी के ही दिग्गज नेताओं को नहीं पच रहा. ये सभी वो नेता हैं जिन्होंने छात्र कांग्रेस और युवक कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की और आज उस मुकाम पर पहुंचे हैं. इनमें से किसी का भी इतिहास भाजपा के साथ जाने का नहीं रहा. इसके बावजूद पार्टी के भीतर इन पर हमले कम नहीं हो रहे. लगातार इन्हें हाशिए पर धकेलने की कोशिशें जारी हैं.

आजाद के मोदी प्रेम ने बढ़ाई मुश्किलें
राज्यसभा से रिटायर होने के बाद चाहिए गुलाम नबी आजाद लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं. आजाद के राज्यसभा से विदा होते वक्त जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भावुक हुए और बाद में आजाद भी मोदी को लेकर बाबू हुए उससे कांग्रेस की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं. आजाद का मोदी प्रेम सिर्फ राज्यसभा का सीमित नहीं रहा. हाल ही में एक कार्यक्रम में उन्होंने मोदी की जमकर तारीफ की. इसके बाद पार्टी में कई नेताओं का पारा चढ़ गया. आजाद के खिलाफ जम्मू में मंगलवार को प्रदर्शन हुआ. देश के कई और हिस्सों में भी आजाद के खिलाफ इसी तरह का प्रदर्शन हो सकता है. बताया जा रहा है कि प्रदर्शन कराने में कांग्रेस के ही कुछ बड़े नेताओं का हाथ है.

लगातार कयास लगाए जा रहे हैं जो गुलाम नबी आजाद देर सबेर कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम सकते हैं. प्रधानमंत्री मोदी को लेकर आजाद बार-बार जिस तरह भावुक हो रहे हैं उसे देखते हुए कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं को इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं लगता. हालांकि आजाद यह कह चुके हैं कि जिस दिन कश्मीर में काली बर्फ पड़ेगी उस दिन वह भाजपा में शामिल होंगे. लेकिन इससे पहले कांग्रेस में कई ऐसे उदाहरण है कि कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार से वफादारी का दंभ भरने वालों ने मौका मिलते ही पलटी मारी. चाहे 2004 में नजमा हेपतुल्ला का मामला रहा हो या 2016 में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे विजय बहुगुणा और बाद में उनकी बहन रीता बहुगुणा. पिछले साल राहुल और प्रियंका के बेहद करीबी माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी पार्टी और नेहरु-गांधी परिवार से अपनी लंबी व खानदानी वफादारी को तिलांजलि देकर मोदी-शाह की गोद में बैठना बेहतर समझा. इन उदाहरणों के आधार पर कहा जा रहा है कि गुलाम नबी आजाद भी देश में पाला बदल सकते हैं.

कब लगेगा चिंतन शिविर?
इस वक्त कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर और सबसे बड़े संकट से गुजर रही है. उसके सामने न सिर्फ़ अपना वजूद बचाने का संकट है बल्कि उस विचारधारा पर भी टिके रहने की चुनौती खड़ी हो गई है जिसे गांधी-नेहरू जैसे नेताओं ने पार्टी की बुनियाद बनाया था. एक के बाद एक आ रही इन चुनौतियों से कांग्रेस का मौजूदा आलाकमान निपटने में सक्षम नहीं दिख रहा है. हालांकि दिसंबर के महीने में हुई अहम बैठक में पार्टी की वैचारिक दिशा तय करने, गठबंधन की राजनीति और नेतृत्व के संकट जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिए एक चिंतन शिविर लगाने पर सहमति बनी थी लेकिन यह चिंतन शिविर कब लगेगा और कहां लगेगा इसका कुछ भी अता पता नहीं है.

ऐसे हालात में जबकि पार्टी में नेताओं के पास अपनी बात कहने का कोई मंच नहीं है तो तो फिर ट्यूटर बाजी होगी ही. चिट्ठी भी लिखी जाएंगी. ऐसे मंच भी तलाशे जाएंगे जहां से आलाकमान पर पर निशाना साधा जा सके. यही सब आज कांग्रेस में हो रहा है. यह इस बात का साफ संकेत है कि गांधी-नेहरू परिवार की पकड़ कांग्रेस पर अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही है. इसीलिए लगातार उसके खिलाफ बगावत बढ़ती जा रही है. इन हालात में कांग्रेस को एकजुट रखना एक बड़ी चुनौती है. इस चुनौती से मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व कैसे निपटेगा, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा. (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
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