OPINION: कांग्रेस क्यों लगातार दे रही थी बीजेपी को तख्तापलट का मौका!

  कमलनाथ (फाइल फोटो)
कमलनाथ (फाइल फोटो)

सवाल उठता है जब बीजेपी लगातार सिंधिया समर्थकों के साथ मिलकर सरकार गिराने की योजना बना रही थी तो मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके सबसे ख़ास नेता दिग्विजय सिंह क्या कर रहे थे!

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2020, 1:01 PM IST
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मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में आखिरकार मुख्यमंत्री कमलनाथ (Kaml nath) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. 2018 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद से ही राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई थी. इस राजनीतिक अस्थिरता के लिए भले ही कांग्रेस और कमलनाथ बीजेपी और केंद्र सरकार को जिम्मेदार बता रहे हैं लेकिन इस अस्थिरता के पीछे असली कारण कांग्रेस पार्टी का अंदरूनी असंतोष था जिसे पार्टी समय रहते नहीं संभाल पाई. पार्टी में ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट लगातार अपने विधायकों और अपने नेता की अनदेखी का आरोप लगा रहा था. सिंधिया के समर्थक विधायक और मंत्री लगातार अनदेखी की बात खुले मंच से कर रहे थे, लेकिन कमलनाथ और कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व उनकी एक भी बात सुनने को तैयार नहीं दिख रहा था.


 आखिर कहां चूक गई कमलनाथ-दिग्विजय की जोड़ी
इस पूरे मामले को समझने के लिए हम दिसंबर 2018 में मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद के राजनीतिक समीकरण के देखें तो आज जो हालात पैदा हुए हैं, उनकी आहट राज्य में चुनावों के पहले और बाद में दिखने लगी थी. चुनावों के पहले कांग्रेस के हाथ सत्ता आएगी या नहीं इस सवाल का सही सही जबाब नहीं था, इसलिए ये आहट थोड़ी कम सुनाई दे रही थी, लेकिन सत्ता के पास पहुंचते ही मध्य प्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी अपने चरम पर पहुंच गई.


सिंधिया समर्थक ज्योतिरादित्य को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सड़कों पर आ चुके थे. दिग्विजय सिंह को भी मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठने लगी थी, लेकिन कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने कमलनाथ पर भरोसा जताया और उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया. साथ में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को कुछ मंत्री पद दिए गए, लेकिन सिंधिया समर्थक इससे खुश नहीं थे. वे लगातार सरकार के खिलाफ खुलकर बोल रहे थे. बीजेपी सिंधिया समर्थकों के साथ मिलकर सरकार गिरा सकती है ये बात बीजेपी के मंचों से हो रही थी. सड़कों और अखबारों में इसकी चर्चा थी.


ऐसे में सवाल उठता है जब बीजेपी लगातार सिंधिया समर्थकों के साथ मिलकर सरकार गिराने की योजना बना रही थी तो मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके सबसे ख़ास नेता दिग्विजय सिंह क्या कर रहे थे! क्या वे अंदाजा नहीं लगा पाए कि सिंधिया के पास कितने विधायक हैं. क्या उन्होंने सिंधाया गुट के विधायकों को अपने पास गुट में लाने की कोई कोशिश नहीं की, या अतिआत्मविश्वास और दिग्विजय सिंह पर भरोसा कमलनाथ को ले डूबा. यहां सवाल कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व पर भी उठता है कि क्या सिर्फ एक लोकसभा चुनाव हार जाने से ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे दिग्गज नेता को हाशिए पर ढकेल दिया जाना ठीक था.


 बीजेपी ने किया सही समय का इंतजार
2018 में कांग्रेस पार्टी में सत्ता को लेकर जो संघर्ष शुरू हुआ उससे पार्टी में जो जख्म पड़े केंद्रीय नेतृत्व उसके इलाज की कोशिश करता नहीं दिखा. लगातार उठ रहे विवादों के बाद भी कमलनाथ मुख्यमंत्री के साथ-साथ पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर भी काबिज रहे. कमलनाथ को मजबूत करने के लिए 2019 के लोकसभा चुनावों में ज्योतिरादित्य को मध्यप्रदेश से बाहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया.




ज्योतिरादित्य के समर्थकों का कहना है कि राज्य के बाहर होने के कारण ही सिंधिया अपनी सीट भी हार गए और इसके बाद ही वह कांग्रेस में अपने वजूद की लड़ाई के लिए आर-पार के मूड में आ गए.


राज्यसभा के लिए मध्य प्रदेश से तीन सीटों पर होने वाले चुनाव ने बीजेपी को वो मौका दे दिया जिसका वो इंतजार कर रही थी. जैसे ही कांग्रेस खेमे से सिंधिया के लिए राज्यसभा चुनाव में टिकट को लेकर निगेटिव खबरें आईं, बीजेपी ने अपनी चाल चल दी. सिंधिया को ऐसा प्रस्ताव भेजा कि वो ना नहीं कर पाए और देखते ही देखते सिंधिया समर्थक 22 विधायक बेंगलुरू पहुंच गए और कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई. कुछ दिन तक सियासी ड्रामा चला. कांग्रेस को उम्मीद थी कि कुछ विधायक वापस आ जाएंगे, लेकिन बीजेपी ने जो चक्रव्यूह तैयार किया था उससे निकलना कांग्रेस और कमलनाथ दोनों के लिए असंभव था.


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