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OPINION: नागरिकता संशोधन बिल पर आखिर इतना हंगामा क्यों

News18Hindi
Updated: December 11, 2019, 11:32 AM IST
OPINION: नागरिकता संशोधन बिल पर आखिर इतना हंगामा क्यों
देश के अलग-अलग हिस्सों में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध हो रहा है.

भारत में पहली बार साल 1951 में राष्ट्रीय नगरिकता पंजीकरण प्रारंभ हुआ. वहीं 1971 में बंगलादेश के निर्माण के बाद 24 मार्च 1971 तक जो भी लोग भारत में आ गए, यहां बस गए उन सभी का भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण हो गया. लेकिन उसके बाद जो आए उनको घुसपैठिया माना गया.

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  • Last Updated: December 11, 2019, 11:32 AM IST
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(डॉ .प्रवेश कुमार)

नागरिकता पर सरकार के द्वारा जैसे ही प्रयास किया गया तो जनता में विभिन्न राजनीतिक दल जो तुष्टिकरण की राजनीति सदैव से करते आए हैं उनको जैसे संजीविनी सी मिल गई फिर वही मुस्लिम-हिंदू पर राजनीति का दौरा प्रारम्भ हो गया. संसद में कई राजनीतिक दलों के सांसदों ने कहा ये बिल संविधान के ख़िलाफ़ है, मुस्लिमों के ख़िलाफ़ है. इस देश में बड़ी अजीब सी रवायत है कि हिंदू समाज के लोगों के अधिकारों, आस्थाओं आदि पर कोई आघात करे तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन किसी ने मुस्लिम समाज के प्रति हल्की सी बात कह दी तो साहब तो इंटोलरेंस सी हो जाती हैं.

इस बिल में क्या है इसका विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है जिस प्रकार का समाज में बिल को लेकर विचार निर्मित किया गया हैं असल में ऐसा कुछ है ही नहीं. समाज में इस प्रकार का वातावरण निर्माण करने का प्रयास किया जा रहा है की ये बिल देश के मुस्लिम समाज के ख़िलाफ़ है. भारत में लगभग 20 करोड़ के क़रीब जो समाज या पंथ रहता हो, क्या ये किसी की भी हिम्मत हो सकती हैं की उनके अधिकारों का कोई हल्का सा भी हनन कर दे और सबसे अहम बात ये सब लोकतंत्र में हो ये बड़ी अजीब सी बात लगती है.



सवाल उठे फिर भी हुआ विभाजन


1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई लेकिन ये आज़ादी एक ही देश के दो हिस्सों के रूप में हमें मिली दुनिया के इतिहास में भी ये पहली घटना ही थी की किसी राष्ट्र का जन्म सिर्फ़ एक विशेष पूजा पद्धति के मनाने वाले लोगों के आधार पर हुआ हो. भारत से धर्म के आधार पर भिन्न होने के चलते ही पाकिस्तान का जन्म हुआ. सबसे बुरी बात थी की भारत के नेताओं ने इसे मान लिया. महात्मा गांधी, डॉ. आंबेडकर, सरदार पटेल आदि के द्वारा कुछ प्रश्न ज़रूर इस पर उठाए गए लेकिन विभाजन तो हुआ.

विभाजन के समय लाखों की संख्या में हिंदुओं का नरसंहार किया गया लेकिन फिर भी तमाम हिंदू समाज के लोग पाकिस्तान में रह गए. इस हिंदू आबादी में बहुत बड़ी संख्या आज के भारत के दलितों की भी थी जो जोगिंदरनाथ मंडल के साथ पाकिस्तान चले गए थे, आज उनकी क्या स्थिति है इससे हर कोई वाक़िफ़ है. भारत में पहली बार साल 1951 में राष्ट्रीय नगरिकता पंजीकरण प्रारंभ हुआ. वहीं 1971 में बंगलादेश के निर्माण के बाद 24 मार्च 1971 तक जो भी लोग भारत में आ गए, यहां बस गए उन सभी का भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण हो गया. लेकिन उसके बाद जो आए उनको घुसपैठिया माना गया.



राजीव गांधी ने किया था समर्थन अब कांग्रेस कर रही विरोध
1985 में असम में अखिल असम छात्र परिषद (AASU) एवं तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जी के द्वारा एक समझौता हुआ जिसमें ये माना गया की बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचान कर उनके देश उनको भेजा जाएगा. उसी समय देश का बड़ा छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भी बांग्लादेशी घुसपैठ के ख़िलाफ़ पूरे देश में समाज जागरण में लगा था. लेकिन खेद इस बात का रहा की राजीव गांधी जो देश के प्रधानमंत्री थे और अखिल असम छात्र परिषद (AASU) के बीच जो समझौता हुआ वो जो राजनीति के कारण लागू नहीं हो पाया. राजीव गांधी जी कांग्रेस से ही देश के प्रधानमंत्री थे वे बिल के साथ थे,आज कांग्रेस इस बिल का विरोध कर रही है.




assam, guwahati
गुवाहाटी के एक वृद्धाश्रम में नागरिकता संशोधन बिल का विरोध करती बुज़ुर्ग महिलाएं


2013 में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अखिल असम छात्र परिषद (AASU) और सरकार के बीच हुए समझोते को लागू करने का आदेश दिया लेकिन फिर भी तत्कालीन सरकारों ने इसे नहीं किया. आज लगभग 34 साल बाद किसी सरकार ने राजीव गांधी और अखिल असम छात्र परिषद के बीच हुए समझौते एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को देश में लागू करने का निर्णय लिया जिसकी प्रसंशा ही होनी चाहिए. इसी का परिणाम है, संसद में जब नगरीकता बिल लाया गया तो स्पष्ट किया गया की ये कोई नया बिल नहीं है बल्कि विधेयक में केवल संशोधन है. जिसका लाभ उन अल्पसंख्यक समाज के लोगों को मिलेगा जो किसी राष्ट्र में रह रहे हैं लेकिन पंथ, पूजा पद्धति भिन्न होने के कारण उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है. इस प्रताड़ना से तंग आकर वो भारत में आ गए और यह शरणार्थी की तरह अपना गुज़र बसर कर रहे है.



'हिंदू भारत मे नहीं आएगा तो और कहां जाएगा'



एक और अहम चीज ये है की ये कोई घुसपैठिया नहीं है, बल्कि शरणार्थी है. धार्मिक उत्पीड़न के कारण कोई अपने राष्ट्र को छोड़ भारत मे शरण लेने आये हैं. ऐसे में भारत को इन मतावलंबियों को भारत की नागरिकता देने में दिक्कत क्या है. हिंदू भारत मे नहीं आएगा तो और कहां जाएगा? भारत ही ऐसा राष्ट्र है जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं. इसलिए दूसरे राष्ट्रों के हिंदू या अन्य पंथ के रहने वाले लोगों को भारत मे ज़्यादा सुरक्षा का भाव रहता है. ये मुस्लिम विरोधी है, तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश ये तीनो राष्ट्र भारत की सीमा के साथ लगे हुए हैं और यहां पर मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है. यहां रहने वाला हिंदू, जैन, बौद्ध, पारसी, ईसाई आदि सभी अल्पसंख्यक हैं. अगर इन्हें इन राष्ट्रों में प्रताड़ित किया जा रहा हैं तो वो कहां भाग कर जायेंगे? जहां उनकी जड़े हैं, तो जड़े तो इनकी भारत में ही हैं.

अगर आप देखें कि राष्ट्रों में रहने वाले अल्पसंख्यको की क्या स्थिति हैं? तो इन आंकड़ों से आसानी से मालूम हो जाता है. आप देखें कि पाकिस्तान में आज़ादी के समय हिंदू जनसंख्या 1947 में 23% आबादी हिंदू थी अभी 2011 की जनसंख्या देखे तो ये सिर्फ 3.7% रह गई है ये हिंदू समाज कहां चला गया? इसी प्रकार 1971 के बाद बंगलादेश का निर्माण हुआ तो वहां भी तेज़ी से हिंदू समाज की संख्या कम हुई है.



'किसी ने नहीं की हिंदू समाज की चिंता'
1971 में हिंदू समाज 23.8% और 2011 मे 9.6 रह गया है. ये हिंदू समाज कहां चला गया? कोई धरती तो नहीं निगल सकती इतने बड़े समाज को. इसका अर्थ है कि इस समाज को प्रताड़ित किया गया अगर उन्होंने मुस्लिम धर्म , पूजा पद्धति स्वीकारी तो उनको देश मे रहने दिया गया, नहीं तो उनको प्रताड़ित किया या मार दिया गया. मुस्लिम वर्ग के मानव अधिकारों पर दुनिया भर अक्सर चर्चा होती रहती है लेकिन क्या किसी ने इतने बड़े हिंदू समाज की चिंता की? आज भारत सरकार ने इस ओर अपना क़दम बढ़ाया है जिसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है.


(लेखक जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं)


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First published: December 10, 2019, 10:16 PM IST
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