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OPINION: बांग्लादेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मंदिर यात्रा का बंगाल के मतदान पर पड़ेगा असर?

जोगेश्वरी मंदिर में पीएम मोदी

जोगेश्वरी मंदिर में पीएम मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा और भारत से ओरकंडी की तीर्थयात्रा के लिए कुछ संभावित घोषणा हो सकती है. हालांकि इस बात पर अभी भी संदेह है कि क्या यह चुनाव परिणामों में कोई बड़ा प्रभाव डालेगा?

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 27, 2021, 1:43 PM IST
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प्रतीम रंजन बोस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश में मंदिर के दौरे, भारत के लिए नए नहीं हैं. हालांकि बांग्लादेश दौरे के समय दो मंदिरों को शामिल किया गया. इसमें से एक अनुसूचित जाति से संबंधित है. यह काफी दिलचस्प है. प्रधानमंत्री का दो दिवसीय बांग्लादेश दौरा शनिवार को खत्म हो जाएगा. मोदी के आलोचकों को लगता है कि इससे उन्हें पश्चिम बंगाल में चल रहे चुनावी मौसम में हिंदू वोटों को एकजुट करने में मदद मिलेगी.

आलोचकों के इस दावे पर बेशक बहस हो सकती है. विवादों ने प्रधानमंत्री को हमेशा चर्चा के केंद्र में रखा और भाजपा के लिए इससे शायद लाभ भी मिलता है. पार्टी के सबसे बड़े स्टार प्रचारक के तौर पर दो दिन के लिए मोदी चुनावी रण से बाहर रहे.

शुरुआत में मोदी का इस यात्रा या चुनाव के समय के साथ कुछ वास्ता नहीं था. बांग्लादेश अपनी स्वतंत्रता के 50 वर्ष और अपने संस्थापक 'बंगबंधु’ शेख मुजीबुर रहमान की जन्मशती मना रहा है. बांग्लादेश की वर्तमान प्रधान मंत्री शेख हसीना 'बंगबंधु' की बेटी हैं.
द्विपक्षीय समझौते करने की संभावना नहीं


भारतीय प्रधानमंत्री 10-दिवसीय कार्यक्रम के सत्र में भाग ले रहे हैं. इस दौरान मोदी और हसीना के बीच किसी भी प्रमुख द्विपक्षीय समझौते करने की संभावना नहीं है. हालांकि वे  कुछ साझा हितों के मुद्दों पर चर्चा जरूर करेंगे. बांग्लादेश द्वारा इस दौरान आम संसाधनों, विशेषकर तीस्ता जल बंटवारे के समझौते पर जोर देने की संभावना है, जो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा की गई आपत्तियों के कारण काफी समय से रुका हुआ है.

भारत के लिए, बांग्लादेश न केवल व्यापार या व्यापक-स्पेक्ट्रम आर्थिक सहयोग पहलों के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार है, बल्कि क्षेत्रीय और आंतरिक सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है. यदि पिछले दशक में असम शांत है तो हसीना ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया.

भारत को इस्लामी गतिविधियों और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति से संबंधित कुछ चिंताएं हैं, जिनके सीमा पार निहितार्थ हैं. यह सच है कि हसीना की सरकार के दौरान बांग्लादेश सबसे सुरक्षित रहा है. हालांकि, यह भी सच है कि इस्लामवादी यथास्थिति को चुनौती देने का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे हैं. सुनामगंज में हिंदुओं पर हालिया अत्याचार और मोदी की यात्राओं के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन इसकी याद दिलाते हैं.

ऐसे में प्रधानमंत्री की यात्रा के लिए हिंदू पौराणिक कथाओं की 51 शक्तिपीठों में से एक, जशोरेश्वरी काली मंदिर का चयन दिलचस्प है. मंदिर बांग्लादेश के सतखिरा जिले के ईश्वरपुर गांव में स्थित है. सतखिरा, पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के साथ सीमा साझा करता है और बांग्लादेश में कट्टरपंथी गतिविधियों के दो प्रमुख केंद्रों में से एक के रूप में जाना जाता है.

मंदिर के महत्वपूर्ण होने की एक और वजह 
जशोरेश्वरी मंदिर के महत्वपूर्ण होने की एक वजह और है. यह गुमनाम गांव महाराजा प्रतापदित्य (1561-1611) का केंद्र था. जिन्होंने मुगलों से स्वतंत्रता की घोषणा करने के बाद प्रतिष्ठित दर्जा प्राप्त किया था. असम और अविभाजित बंगाल में 'बारो-भूयान' के रूप में पहचाने जाने वाले सैनिक-भूस्वामियों के संघर्ष के बीच सबसे प्रमुख, प्रतापदित्य ने कोलकाता के कुछ हिस्सों सहित दक्षिण बंगाल के बड़े हिस्सों पर शासन किया.

हालांकि इतिहास के इस टुकड़े को आज के बंगाल में मुश्किल से याद किया जाता है और चुनाव में शून्य प्रासंगिकता है. प्रधान मंत्री की यात्रा से स्थानीय भावनाओं में बदलाव आ सकता है और मंदिर को लंबे समय बाद पर्यटक केंद्र में बदला जा सकता है.

ओरकंडी में मतुआ मंदिर में पीएम मोदी
पीएम की यात्रा में शामिल दूसरा मंदिर बांग्लादेश के गोपालगंज जिले के ओरकंडी में मतुआ मंदिर है. 'बंगबंधु’ के पैतृक घर के तौर पर प्रचलित जिले में सीमा के दोनों ओर बड़ी संख्या में हिंदू गांव हैं. इसे परिप्रेक्ष्य में यह संदेश देने की कोशिश है कि अगर सतखीरा में हिन्दू असुरक्षित हैं तो वहीं गोपालगंज में वह पूरी तरह सुरक्षित हैं.

पश्चिम बंगाल में पेट्रापोल सीमा से कुछ 100 किलोमीटर की दूरी पर, ओरकांडी हरिचंद ठाकुर का जन्मस्थान है. जिन्होंने 1860 के आसपास मतुआ संप्रदाय की स्थापना की. इनमें से अधिकांश भारत में स्थानांतरित हो गए हैं. मतुआ पश्चिम बंगाल में 23 प्रतिशत अनुसूचित जाति की आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो मुस्लिम वोटों के प्रभाव को बेअसर करने के लिए भाजपा के लिए अहम साबित हो सकते है.

इसका सीधा असर मतदान पर होगा?
विभाजन के बाद कई वर्षों तक, मतुआ समुदाय के लोग फागुन (फरवरी-मार्च) के महीने में 'बरुनी स्नान उत्सव' के वार्षिक उत्सव के दौरान ओरकंडी जाते थे. हालांकि, समय के साथ तीर्थयात्रियों की संख्या कम हो गई. आंशिक रूप से भारत या बांग्लादेश से संस्थागत समर्थन की कमी और पश्चिम बंगाल में सीमा पार  बनगांव के ठाकुरनगर में एक वैकल्पिक केंद्र बन जाने के कारण ऐसा हुआ.

प्रधानमंत्री की यात्रा और भारत से ओरकंडी की तीर्थयात्रा के लिए कुछ संभावित घोषणा हो सकती है.  हालांकि इस बात पर अभी भी संदेह है कि क्या यह चुनाव परिणामों में कोई बड़ा प्रभाव डालेगा? मतुआ समुदाय के अधिकांश लोग पहले ही भाजपा के प्रति झुकाव रखने लगे हैं. खासतौर से ऐसा CAA के बाद हुआ. साल 2019 के लोकसभै चुनाव में बनगांव लोकसभा सीट पर इसका असर भी देखने को मिला था.

पश्चिम बंगाल में शरणार्थी आबादी के साथ ही मतुओं को अब सीएए के लागू का बेसब्री से इंतजार है, क्योंकि यह उनकी नागरिकता की स्थिति पर कानूनी दिक्कत को सही करने में मदद करेगा. संक्षेप में, मंदिर के दौरे से नरेंद्र मोदी को पश्चिम बंगाल में भाजपा के अभियान के गति को बनाए रखने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसका सीधा असर मतदान पर नहीं हो सकता है.  (यह लेखक के निजी विचार हैं.)
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