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OPINION: मोदी के खिलाफ 2019 की लड़ाई में राहुल की कितनी मदद कर पाएंगी मायावती?

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Updated: July 18, 2018, 12:08 PM IST
OPINION: मोदी के खिलाफ 2019 की लड़ाई में राहुल की कितनी मदद कर पाएंगी मायावती?
बसपा सुप्रीम मायावती के साथ सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल फोटो)

लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. इन तीन राज्यों में कांग्रेस के साथ मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) के गठजोड़ की चर्चा भी सियासी गलियारों में हैं.

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(आशुतोष)

अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान भले ही अभी न हुआ हो, लेकिन सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. एक तरफ पीएम मोदी, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ सियासी माहौल गर्माने में जुटे हैं. दूसरी ओर विपक्षी दल महागठबंधन का ताना-बाना बुनने में लगे हैं. दलित वोट बैंक को साधने के लिए हर पार्टी 'बहनजी' यानी मायावती का साथ चाहती है. लोकसभा चुनाव से पहले मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने हैं. इन तीन राज्यों में कांग्रेस के साथ मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) के गठजोड़ की चर्चा भी सियासी गलियारों में हैं. सवाल ये है कि क्या मोदी के खिलाफ 2019 की लड़ाई में मायावती राहुल गांधी के लिए मददगार साबित हो पाएंगी? आम आदमी पार्टी के सीनियर लीडर आशुतोष पूरे मसले पर अपना नज़रिया रख रहे हैं:-

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इस साल अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होने हैं. इस वक्त बड़ा सवाल ये है कि क्या कांग्रेस को चुनावों में बीएसपी के साथ गठबंधन करना चाहिए या फिर पार्टी को पहले की तरह अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ना चाहिए? दरअसल, कांग्रेस और बीएसपी ने इसके पहले कई मौकों पर प्री-पोल अलायंस के संकेत दिए हैं. सीटों के बंटवारे को लेकर गठबंधन का पेंच अभी फंसा है, लेकिन बैठकों का दौर जारी है. आने वाले दिनों में स्थिति साफ होगी.

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अगर दोनों पार्टियों का गठबंधन होता है, तो यह एक अच्छा राजनीतिक कदम होगा, क्योंकि इससे कांग्रेस और बीएसपी दोनों 'अपमान' से बच जाएगी. 2019 की जंग के पहले ये तीन विधानसभा चुनाव इस साल के आखिरी चुनाव होंगे; जब तक प्रधानमंत्री वन 'नेशन वन इलेक्शन' के तहत कोई बड़ा ऐलान नहीं कर देते.


बीएसपी और कांग्रेस के प्रस्तावित गठबंधन की राजनीतिक पृष्ठभूमि रही है. राहुल गांधी और मायावती दोनों की पार्टी बीजेपी के सामने संघर्ष कर रही है. चुनाव में दोनों को बहुत कुछ साबित करना है. जब से राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं, तब से उन्होंने बीजेपी के खिलाफ लड़ाई का सामना तो किया है, लेकिन अब तक इस लड़ाई को जीतने के दावे नहीं किए.

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने गुजरात में बेहतरीन प्रदर्शन किया. बीजेपी को कांटे की टक्कर दी. बीजेपी के खिलाफ जंग के लिए कांग्रेस ने गुजरात की 'तिकड़ी' और युवा नेताओं हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के साथ गठजोड़ किया. फिर बीजेपी के 'हिंदुत्व' के तोड़ के रूप में 'सॉफ्ट हिंदुत्व' लेकर आई. इसके तहत राहुल गांधी ने मंदिरों-मस्जिदों का दौरा किया. 'सॉफ्ट हिंदुत्व' के जरिये राहुल ने पीएम मोदी और अमित शाह को चुनाव में जीत के लिए कठिन परिश्रम भी करने को मजबूर कर दिया. बीजेपी ने भले ही गुजरात चुनाव जीता हो, लेकिन हार के बाद भी राहुल गांधी 'बाजीगर' कहलाएं.

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इसके बाद मौका आया कर्नाटक में सरकार बनाने का. अमित शाह की लाख कोशिशों के बावजूद राहुल गांधी ने यहां बीजेपी की सरकार नहीं बनने दी. गुजरात और कर्नाटक चुनावों में राहुल गांधी ने अपनी मैच्युरिटी और पॉलिटिकल अंडरस्टैंडिंग दिखाई. कर्नाटक में बीजेपी को अपमान का घूंट पीकर रह जाना पड़ा. इससे राजनीतिक रूप से यह मैसेज गया कि अगर विपक्षी दल एक साथ आ जाए, तो मोदी और बीजेपी के विजयी रथ को रोका जा सकता है.

अगर अब बात करें मायावती की, तो यूपी में पिछले दो चुनावों (लोकसभा और विधानसभा) मायावती के लिए बहुत दुखद रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई. वहीं, 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में मायावती दोबारा यूपी की सत्ता में आने के दावें कर रही थीं. लेकिन, बीएसपी को सिर्फ 18 सीटें मिली, जो अब तक के विधानसभा चुनावों में इसका सबसे खराब प्रदर्शन है.

मायावती के नेतृत्व और पार्टी पर सवाल तब खड़े हुए, जब राज्यसभा में वह अपना एकमात्र कैंडिडेट भी नहीं भेज पाईं. इसके बाद कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने मायावती के सियासी करियर पर 'ऑबिच्युरी' तक लिख दी थी. उन्हें शाब्दिक रूप से 'खत्म' मान लिया गया था. आरएसएस और बीजेपी डींगे मारते थे कि एकमात्र मायावती ही दलितों में जाटव हैं, बाकी सभी बीजेपी में शामिल हो चुके हैं.


जाटव समुदाय यूपी की कुल आबादी का 11 फीसदी है, जबकि 9 फीसदी आबादी दलित है. अपने जमीनी काम और प्रॉपगेंडे के तहत बीजेपी इन दलितों को लुभाने में जुटी है.

2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के यूपी में बड़े पैमाने पर उभरने के बाद बीएसपी के लिए नई चुनौती खड़ी हो गई. ये चुनौती थी अपनी और अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखने की. यही वजह है कि गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में बीएसपी ने समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाया. बुआ और भतीजे की जोड़ी यानी अखिलेश-मायावती के एक साथ आने का दोनों पार्टियों को फायदा हुआ. बीएसपी समर्थित सपा कैंडिडेट्स ने दोनों सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों को धूल चटाई. दोनों पार्टियों को समझ में आ गया कि ये मॉडल काम कर रहा है. अब इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर दोहराने की योजना है.

एक नेता के रूप में उभरवने से पहले मायावती बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में दलित चेतना फैलाने के विचार से प्रयोग किया था. वह अविभाजित मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब और दिल्ली में स्थानीय दलितों के लिए काम करते थे. इससे चुनावों में उन्हें प्रत्याशित फायदा भी होता था.


इसी बीच बीएसपी एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरी, जिसे चुनाव आयोग ने भी मान्यता दी. कांशीराम के निधन के बाद पार्टी की बागडोर मायावती के हाथ में आई. लेकिन, मायावती वो सब काम करना भूल गईं, जो कांशीराम किया करते थे. फिर भी, बीएसपी ने इन राज्यों में थोड़ी बहुत अपनी जगह बना ही ली.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी को मजबूत विरोधी लहरों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में कांग्रेस को भी अहसास है कि अगर वह बीजेपी विरोधी वोटों को मजबूत कर लेती है, तो इससे न सिर्फ एक मजबूत लड़ाई को जीत लेगी, बल्कि अपनी पार्टी को एक नए आयाम तक ले जा पाएगी. अगर हम 2003, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों पर नज़र डालें, तो हम देख पाएंगे कि कांग्रेस और बीएसपी का वोट प्रतिशत बेहतर होता जा रहा है, जो बीजेपी के लिए अच्छी खबर तो कतई नहीं हो सकती.


इन तीन राज्यों में हुए पिछले चुनावों में कांग्रेस और बीएसपी का औसत वोट शेयर 40.16% के आसपास है, जबकि इन तीन राज्यों में बीजेपी का औसत वोट शेयर 37.54% है. मध्य प्रदेश में  कांग्रेस-बीएसपी का औसत वोट शेयर 40.9 6%, जबकि बीजेपी का 41.70% वोट शेयर है. वहीं, बात करें छत्तीसगढ़ की, तो यहां कांग्रेस-बीएसपी औसत वोट शेयर 43.48% और बीजेपी का वोट शेयर सिर्फ 40.21% रहा.

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यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से साफ करता है कि राजस्थान में कांग्रेस और बीएसपी वोट शेयर के मामले में बीजेपी से आगे है. छत्तीसगढ़ में उसका मार्जिन बीजेपी से 3.27% तक ज्यादा है. मध्य प्रदेश में बीजेपी ने कांग्रेस और बीएसपी पर 86% की बढ़ोतरी बरकरार रखी है. ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मतदाता पारंपरिक पैटर्न का पालन करते हैं. ऐसे में अगर बीएसपी- कांग्रेस साथ आती है, तो इन तीन राज्यों में बीजेपी की परेशानी बढ़नी तय है.

(लेखक आम आदमी पार्टी के लीडर हैं, ये उनके निजी विचार हैं.)

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First published: July 18, 2018, 9:55 AM IST
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