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क्‍या रूस की सत्‍ता पर हमेशा काबिज रहने के लिए पुतिन ने हाईजैक कर लिया है संविधान?

News18Hindi
Updated: January 29, 2020, 9:06 PM IST
क्‍या रूस की सत्‍ता पर हमेशा काबिज रहने के लिए पुतिन ने हाईजैक कर लिया है संविधान?
राष्ट्रपति पुतिन पर आरोप लग रहे हैं कि वो सत्ता के सिंहासन को खाली नहीं करना चाहते.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन (Vladimir Putin) पर आरोप लग रहे हैं कि वो सत्ता में बने रहने के लिए मनमाने संविधान संशोधन (Constitutional Amendments) कराना चाहते हैं.

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  • Last Updated: January 29, 2020, 9:06 PM IST
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दुनियाभर में भारत के बेहद नजदीकी दोस्त के रूप में शुमार किए जाने वाले रूस (Russia) में फिलहाल राजनीतिक उथल-पुथल का दौर चल रहा है. रूस के ख्यातिप्राप्त सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन (Vladimir Putin) पर आरोप लगाया है कि उन्होंने संविधान को हाईजैक कर लिया है. आरोप है कि पुतिन सत्ता में बने रहने के लिए देश के संविधान को मनमाने ढंग से बदल रहे हैं.

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस 'संविधान हाईजैक' के पीछे मुख्य वजह पुतिन को हमेशा के लिए सत्ता पर काबिज रखना है. इन कार्यकर्ताओं ने एक सामूहिक अपील जारी की है जिसका नाम रखा है मेनीफेस्टो. इस अपील में कार्यकर्ताओं ने देश की जनता से पुतिन द्वारा प्रस्तावित संविधान संशोधनों के खिलाफ वोट करने की अपील की है.

कैसे शुरू हुई उथल-पुथल
दरअसल बीती 15 जनवरी को व्लादिमिर पुतिन ने संसद से राष्ट्र के नाम एक संदेश दिया. अप्रत्याशित रूप से उन्होंने कई संवैधानिक संशोधन प्रस्तावित किए. इन संशोधनों में देश की संसद के अधिकारों को बढ़ाए जाने और राष्ट्रपति के अधिकारों को कम किए जाने का प्रावधान है. आलोचकों का मानना है कि बीते दो दशक से रूस की सत्ता पर काबिज ( कभी राष्ट्रपति तो कभी प्रधानमंत्री के रूप में ) पुतिन का कार्यकाल 2024 में समाप्त हो रहा है. अब पुतिन चाहते हैं कि उनके बाद देश का राष्ट्रपति चाहे जो बने, सत्ता की चाबी उन्हीं के पास रहे.

Putin will continue to hold the life time for president this change can happen in the constitution of Russia

2024 के बाद संभव है पुतिन स्टेट काउंसिल के चीफ बन जाएं. शायद इसी वजह से उन्होंने संवैधानिक संशोधनों में स्टेट काउंसिल को और अधिक अधिकार देने का प्रस्ताव दिया हैं. यानी अगर वो राष्ट्रपति पद से हटेंगे तो इस पद की ताकत भी छीन लेंगे और ये ताकत उनके पास स्टेट काउंसिल चीफ के रूप में बनी रहेगी.

आर्थिक सुधारों की आड़!इसी क्रम में पुतिन ने अपने पुराने सहयोगी और देश के प्रधानमंत्री दमित्री मेदवेदेव से इस्तीफा ले लिया. इसके बाद उन्होंने इकॉनोमिस्ट और देश की फेडरल टैक्स सर्विस के डायरेक्टर मिखाइल मिशुस्तिन को देश का प्रधानमंत्री बना दिया. कैबिनेट में कई नए मंत्री भी शामिल किए गए हैं. पुतिन इन बदलावों को लेकर बहुत आशांवित हैं और उन्होंने देश की आर्थिक प्रगति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है. लेकिन आलोचका कहना है कि आर्थिक सुधारों का बहाना लेकर पुतिन सत्ता पर हमेशा के लिए काबिज हो जाना चाहते हैं. इसकी आड़ में वो संवैधानिक संशोधन कर राष्ट्रपति की शक्तियां कम कर देना चाहते हैं जिससे अगला राष्ट्रपति महज कठपुतली बनकर रह जाए.

मिखाइल मिशुस्तिन राजनीतिक हल्कों में कम पहचाने जाते हैं. अर्थशास्त्री के रूप में पहचान रखने वाला मिखाइल को लेकर कहा जा रहा है कि उन्हें देश को आर्थिक रफ्तार पकड़ाने के लिए पद सौंपा गया है.
मिखाइल मिशुस्तिन की पहचान अर्थशास्त्री के तौर पर होती है. कहा जा रहा है कि उन्हें देश को आर्थिक रफ्तार पकड़ाने के लिए पद सौंपा गया है.


स्टेट काउंसिल के रोल पर सबसे ज्यादा सवाल
पुतिन ने स्टेट काउंसिल के रोल को नए रूप में लाने का प्रस्ताव दिया है. स्टेट काउंसिल रूस के गवर्नरों की काउंसिल होती है. पुतिन के इस कदम को लेकर सबसे ज्यादा आलोचना की जा रही है. आलोचकों का कहना है कि पुतिन स्टेट काउंसिल को और ज्यादा ताकत देकर उसके हेड बन जाएंगे और फिर राष्ट्रपति रबर स्टांप बनकर रह जाएगा. क्योंकि पुतिन ने संसद के अधिकार भी बढ़ाए जाने का प्रस्ताव दिया है. अब देश में सत्ता के तीन केंद्र हो जाएंगे. पहला देश का राष्ट्रपति, दूसरा संसद और तीसरा स्टेट काउंसिल का हेड. पुतिन स्टेट काउंसिल को काफी अधिकार देने के पक्ष में हैं. ऐसे में नए संशोधन लागू हुए तो देश की शक्ति का मुख्य केंद्र स्टेट काउंसिल का चीफ हो जाएगा.

पुतिन के कदम की तारीफ भी हो रही है
रूसी अखबार मॉस्को टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक पुतिन ने पूरे देश को आश्चर्य में डाल दिया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि पुतिन के सुधारों के निहितार्थ समझना आसान नहीं है. क्योंकि अगर सिर्फ सत्ता में बने रहने की बात होती तो पुतिन दो बार राष्ट्रपति रहने के नियम को ही रद्द कर सकते थे. ये एक निर्णय, इतनी बड़ी कसरत से आसान होता.

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुतिन भले ही 2024 के बाद अपनी भूमिका बुन रहे हों लेकिन उन्होंने सत्ता की शक्ति का विकेंद्रीकरण तो कर ही दिया है. अभी तक राष्ट्रपति रहते हुए पुतिन के पास ही सर्वाधिक अधिकार थे. माना जा रहा है कि अब नए रिफॉर्म्स के बाद रूस में सत्ता पर चेक और बैलेंस का सिस्टम ज्यादा मजबूत होगा. रूस में लोकतंत्र की मजबूती के लिए इसे बड़ा कदम माना जा रहा है. क्योंकि प्रेसिडेंशियल रिपब्लिक के तौर पर रूस में सत्ता की चाबी राष्ट्रपति यानी पुतिन के हाथों में ही थी.

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क्या है विपक्ष का रुख
पुतिन के हालिया कदमों को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता तो मुखर हैं लेकिन विपक्ष में सन्नाटा पसरा हुआ है. अभी तक किसी बड़े विपक्षी नेता ने इसकी मुखालफत नहीं की है लेकिन माना रहा है कि जल्द ही इसका बड़ा विरोध होगा. एक छोटी विपक्षी पार्टी के नेता लेकिन रूस में पुतिन के सबसे बड़े आलोचकों में शुमार किए जाने वाले एलेक्सेई नवलनी ने इसे तख्तापलट करार दिया है.

कुछ विपक्षी नेताओं ने पड़ोसी देश कजाखस्तान का उदाहरण भी दिया है. उनके मुताबिक राष्ट्रपति पुतिन सत्ता पर हमेशा पकड़ा बनाए रखने के लिए कजाखस्तान के नेता नूरसुल्तान नज़बयेव के रास्ते पर हैं. नूरसुल्तान ने भी राष्ट्रपति पद से हटने के पहले पद को कमजोर किया. एक दूसरा मजबूत पद सृजित किया. और फिर उसी पद पर काबिज होकर खुद को लाइफटाइम लीडर घोषित कर दिया. विपक्षी नेताओं का मानना है कि अभी ये विरोध धीमा है लेकिन जल्द ही पुतिन के खिलाफ पूरे देश में प्रदर्शन होंगे. आगामी 29 फरवरी को विपक्षी दलों ने पुतिन के खिलाफ एक बड़ी रैली का आह्वान किया है.

क्या सत्ता पर बने रहेंगे पुतिन
बीते दो दशकों के दौरान व्लादिमिर पुतिन रूस की सत्ता पर अप्रत्याशित ढंग से मजबूत हुए हैं. गुजरते वर्षों के दौरान अपने नजदीकी दमित्री मेदवेदेव के साथ पद बदलकर वो सत्ता के केंद्र में बने रहे. रूस में उनका बहुत बड़ा प्रशंसक वर्ग है. देश के लोग उन्हें दुनिया में रूस की अस्मिता से जोड़कर देखने लगे हैं. अगर उनके द्वारा प्रस्तावित संशोधनों पर लोगों ने समर्थन में वोट दिया तो 2024 के बाद रूस का राष्ट्रपति चाहे कोई और बन जाए लेकिन सत्ता की चाबी पुतिन के हाथों में ही रहेगी.
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First published: January 29, 2020, 9:01 PM IST
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