मंडी और एमएसपी सिस्‍टम से अलग राह पर हैं जैविक किसान, ऐसे कमाते हैं मुनाफा

सिंघु बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन जारी है.

सिंघु बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन जारी है.

कृषि सुधार कानून आने से पहले ही कुछ किसानों ने मंडी व्‍यवस्‍था और एमएसपी सिस्‍टम के बाहर जाकर अपना सफल कारोबार किया है. सरीन ने कहा कि यदि आप जैविक खेती के संबंध में पूछेंगे तो मैं कहना चाहूंगी कि जैविक खेती करने वाले अधिकतर लोग मौजूदा सिस्‍टम का उपयोग तक नहीं करते.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 8, 2021, 10:12 PM IST
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सीमंतिनी दे

कृषि सुधार कानून के बनने से कहीं पहले ही, जैविक खेती करने वाले किसानों ने अपना सफल व्‍यापार बिना मंडी और एमएसपी सिस्‍टम के कर दिखाया है. सरकार के मौजूदा सिस्‍टम को अधिकतर जैविक किसान इस्‍तेमाल ही नहीं करते.

केंद्र सरकार और आंदोलन करने वाले किसानों के बीच का गतिरोध पिछले एक माह से छाया हुआ है. कृषि सुधार कानून यानी कृषि व्यवस्था में सुधार से जुड़े तीन विधेयक यानी- किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य, (संवर्धन व सुविधा) विधेयक, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं पर किसान (सशक्तीकरण व संरक्षण) समझौता अध्यादेश और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम को लेकर सरकार बार-बार दोहरा रही है कि इससे किसानों का फायदा होगा. कुछ किसानों को आशंका है कि इन कानून से वर्तमान एमएसपी (न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य) सिस्‍टम खत्‍म हो जाएगा, सरकारी मंडियां बेकार हो जाएंगी और सबसे अहम कि निजी कंपनियां इस क्षेत्र में आकर किसानों को बुरी तरह प्रभावित करेंगी.

इन आशंकाओं के कारण वे आंदोलन पर डटे हुए हैं. सरकार को इसका कोई उपाय सोचना चाहिए. यह बात सामाजिक कार्यकर्ता और ''भूमिजा'' संस्‍था की संस्‍थापक डायरेक्‍टर गौरी सरीन ने खास बातचीत में कही. संस्‍था जैविक खेती से जुड़े किसानों के लिए काम करती है.
न्‍यूज18 से चर्चा में उन्‍होंने कहा कि सरकारी हल व्‍यापक होने चाहिए. इनकी पहुंच अधिक किसानों तक हो, इसके जरिए गरीब और अमीर किसानों के बीच अंतर हो और वास्‍तविक बदलाव के लिए एमएसपी एक जरिया बनना चाहिए. कृषि क्षेत्र का निगमीकरण करना दोधारी तलवार जैसा होगा. वहीं कृषि विविधता कोल्‍ड चेन में निवेश भी जरूरी है. सरकार को स्‍थानीयता को सहयोग देने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र को प्रतिस्‍पर्धी और किसानों के लिए लाभकारी बनाना होगा. वहीं उपभोक्‍ता का भी ध्‍यान रखना होगा.

सरीन ने कहा कि यदि निजी क्षेत्र की कंपनियां इस मार्केट में आएंगी, तो इसका मतलब हमेशा यह नहीं निकालना चाहिए कि इसका बुरा प्रभाव ही होगा. ऐसे बहुत से उदाहरण है जहां निजी कंपनियों ने मदद की है. बिहार और ओडिसा के किसानों ने विक्रेताओं को ऐसा प्रबंध किया है जिससे उन्‍हें डिमांड आधारित सिस्‍टम बनाने में सफलता मिली है.

कृषि सुधार कानून आने से पहले ही कुछ किसानों ने मंडी व्‍यवस्‍था और एमएसपी सिस्‍टम के बाहर जाकर अपना सफल कारोबार किया है. सरीन ने कहा कि ' यदि आप जैविक खेती के संबंध में पूछेंगे तो मैं कहना चाहूंगी कि जैविक खेती करने वाले अधिकतर लोग मौजूदा सिस्‍टम का उपयोग तक नहीं करते. वे न तो एमएसपी लेते हैं और न ही अपनी पैदावार मंडी में बेचते हैं. वे अपना निजी नेटवर्क ही इस्‍तेमाल करते हैं. कई जैविक किसान तो उत्‍पादन के साथ बेचने का काम भी खुद ही करते हैं. उन्‍होंने अपनी अलग राह बना ली है. मंडी सिस्‍टम से अलग राह का यह एक उदाहरण हो सकता है.



उन्‍होंने चेतावनी देते हुए कहा कि मुक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था में बड़े खिलाड़ी सौदेबाजी पर उतर सकते हैं. इसलिए जिम्‍मेदारी सरकार पर बनती है कि वह गरीब किसानों की देखभाल करें और सभी को एक जैसा वातावरण उपलब्‍ध कराए. उन्‍होंने कहा कि मेरी व्‍यक्तिगत राय है कि मुक्‍त अर्थव्‍यवस्‍था मॉडल सबके लिए अच्‍छा नहीं होता. ऐसे में जिनके पास कम जमीन है और खेती के अलावा आय के अन्‍य स्रोत नहीं है, उनके लिए सरकार को कुछ करना चाहिए ताकि उन्‍हें गरीबी का सामना न करना पड़े.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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