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कलाकारों, लेखकों और पूर्व जजों ने सरकार से की सिटिज़नशिप बिल वापस लेने की अपील

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Updated: December 10, 2019, 11:06 PM IST
कलाकारों, लेखकों और पूर्व जजों ने सरकार से की सिटिज़नशिप बिल वापस लेने की अपील
600 कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पूर्व जजों ने सरकार से इस विधेयक को वापस लेने की मांग की है

सात घंटे से अधिक समय तक चली बहस के बाद लोकसभा ने सोमवार आधी रात को नागरिकता (संशोधन) विधेयक (Citizenship Amendment Bill) को पारित कर दिया. इस विधेयक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है.

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  • Last Updated: December 10, 2019, 11:06 PM IST
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नई दिल्ली. करीब 600 कलाकारों, लेखकों, शिक्षाविदों, पूर्व न्यायाधीशों और पूर्व नौकरशाहों ने सरकार से नागरिकता (संशोधन) विधेयक (Citizenship Amendment Bill) वापस लेने की अपील करते हुए इसे भेदभावपूर्ण, विभाजनकारी और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ बताया है. इन लोगों ने लिखे एक खुले पत्र में इस बात पर जोर दिया है कि प्रस्तावित कानून भारतीय गणतंत्र (Republic of India) के मूल चरित्र को आधारभूत रूप से बदल देगा और यह संविधान द्वारा मुहैया कराये गए संघीय ढांचे को खतरा उत्पन्न करेगा.

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में इतिहासकार रोमिला थापर (Romila Thapar), लेखक अमिताव घोष (Amitav Ghosh), अभिनेत्री नंदिता दास (Nandita Das), फिल्मकार अपर्णा सेन (Aparna Sen) और आनंद पटवर्धन (Anand Patwardhan), सामाजिक कार्यकर्ताओं योगेंद्र यादव, तीस्ता सीतलवाड, हर्ष मंदर, अरुणा राय और बेजवाड विल्सन, दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह और देश के पहले सीआईसी वजाहत हबीबुल्ला आदि शामिल हैं.

पत्र में लिखी गई ये बात
इस पत्र में लिखा है, 'सांस्कृतिक और शैक्षिक समुदायों से जुड़े हम सभी लोग इस विधेयक को विभाजनकारी, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक करार देते हुए निंदा करते हैं. देशव्यापी एनआरसी के साथ यह देशभर के लोगों के लिए अनकही पीड़ा लेकर आएगा. यह भारतीय गणतंत्र की प्रकृति को आधारभूत रूप से अपूरणीय क्षति पहुंचाएगा. यही कारण है कि हम

सात घंटे से अधिक समय तक चली बहस के बाद लोकसभा ने सोमवार आधी रात को इस विसरकार से इस विधेयक को वापस लेने की मांग करते हैं.'धेयक को पारित कर दिया. इस विधेयक में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है.

गुजरात में भी विरोध
गुजरात (Gujarat) से कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी लोकसभा में विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक (कैब) के पारित होने की निंदा करते हुए कहा कि इस प्रस्तावित कानून से सांप्रदायिक विभाजन बढ़ेगा जबकि इसका असली उद्देश्य हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाना है. गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) अनहद के देव देसाई और 230 अन्य कार्यकर्ताओं द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया है, 'नागरिकता संशोधन विधेयक का घोषित उद्देश्य पड़ोसी देशों से उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को शरण देना है, लेकिन यह केवल अल्पसंख्यकों और देशों के एक छोटे, बहुत खास समूह पर लागू होता है. इसमें पाकिस्तान से अहमदियों, म्यामां से रोहिंग्या और श्रीलंका से तमिलों को आसानी से छोड़ दिया गया है.'

इसमें कहा गया है, 'यह विधेयक शरणार्थियों की रक्षा करने के बारे में नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य केवल हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाना है.

'सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ाएगा बिल'
यह प्रस्तावित कानून देशभर में और विशेषकर बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भावनाओं को भड़कायेगा और सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ायेगा.' सामाजिक कार्यकर्ता शीबा जॉर्ज, एडमिरल रामदास, अनहद की शबनम हाशमी, जन संघर्ष मंच के एन सिन्हा और हेमंतकुमार शाह उन अन्य लोगों में शामिल हैं जिनके पत्र में हस्ताक्षर हैं. नागरिकता संशोधन विधेयक में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए गैर मुस्लिम शरणार्थी - हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने का पात्र बनाने का प्रावधान है.

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First published: December 10, 2019, 11:04 PM IST
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