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क्या सार्क सम्मेलन की आड़ में तालिबान को मान्यता दिलाना चाहता है पाक?

क्या सार्क सम्मेलन की आड़ में तालिबान को मान्यता दिलाना चाहता है पाक?

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान. (फाइल फोटो)

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान. (फाइल फोटो)

पिछले साल सितंबर में न्यूयॉर्क में तालिबान के प्रतिनिधि को शामिल करवाने की पाकिस्तानी जिद के चलते सार्क विदेश मंत्रियों की बैठक नहीं हो पाई थी. एक बार फिर पाकिस्तान ने सार्क शिखर सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव रखा है, और भारत को जुबानी न्यौता भी देते हुए वर्चुअल तरीके से जुड़ने का प्रस्ताव रखा. लेकिन क्या यह अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता देने की पाकिस्तान की नई पहल है?

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नई दिल्ली. सार्क सम्मेलन (SAARC summit) को लेकर एक बार फिर पाकिस्तान (Pakistan) बेचैन दिखाई दे रहा है. पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी (Shah Mahmood Qureshi) ने सोमवार को एक बार फिर पाकिस्तान में सार्क शिखर सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव रखा, और भारत को जुबानी न्यौता भी देते हुए वर्चुअल तरीके से जुड़ने का भी प्रस्ताव रखा. लेकिन क्या यह अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता देने की पाकिस्तान की नई पहल है?

गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में न्यूयॉर्क में तालिबान के प्रतिनिधि को शामिल करवाने की पाकिस्तानी जिद के चलते सार्क विदेश मंत्रियों की बैठक नहीं हो पाई थी. अभी तक पाकिस्तान समेत किसी भी देश ने तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है. ऐसे में क्या पाकिस्तान सार्क के जरिए तालिबान को क्षेत्रीय संगठन में जगह देकर अफगानिस्तान की नई सरकार को जायज ठहराना चाहता है?

लेकिन पाकिस्तान को छोड़कर कोई अन्य देश तालिबान के साथ एक मंच पर नजर आने का इच्छुक नहीं है. अगर सार्क बैठक के लिए सभी देश तैयार भी हों तो पहले यह तय करना होगा कि अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व आखिर कौन करेगा.

सार्क सम्मलेन से मिलेगी क्षेत्रीय मान्यता?
पाकिस्तान में भारत के राजदूत रह चुके राजीव डोगरा ने न्यूज़18 से कहा, ‘इस कदम के पीछे पाकिस्तान के दो मकसद हैं, एक, वो पीछे के दरवाजे से तालिबान की एंट्री चाहता है. एक बार तालिबान की एंट्री सार्क मंच पर होती है, तो यह दिखाया जा सकेगा कि अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों के लिए तालिबान का अस्तित्व सामान्य है.’

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‘दूसरा भारत के प्रमुख मुद्दे, यानी आतंकवाद से पाकिस्तान पीछे हटना चाहता है, क्योंकि भारत अपना रुख साफ कर चुका है कि आतंकवाद के रहते सार्क मीटिंग का कोई मतलब नहीं. पाकिस्तान आतंक पर रोक नहीं लगा रहा, वो तालिबान को समर्थन जारी रखे हुए हैं, क्षेत्र में आतंकी ताकतों को समर्थन भी जारी है, फिर भी पाकिस्तान दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वो क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा दे रहा है.’

क्या बोले पूर्व राजनयिक
वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रह चुके वरिष्ठ पूर्व राजनियिक विष्णु प्रकाश ने कहा, ‘पाकिस्तान का गेमप्लान कामयाब नहीं हुआ. तालिबान सत्ता में तो है लेकिन किसी ने अब तक इस सरकार को मान्यता नहीं दी है, यहां तक कि पाकिस्तान ने भी अब तक तालिबान को मान्यता देने की हिम्मत नहीं जुटाई है.’

‘तालिबान प्रतिगामी नीतियों को जारी रखकर पाकिस्तान के हितों की मदद नहीं कर रहा है. उनकी OIC बैठक हुई जो सफल नहीं हुई, पाकिस्तान का संरक्षक चीन ज्यादा मदद नहीं कर रहा है. इसलिए पाकिस्तान सार्क शिखर सम्मेलन का जुआ खेलने का प्रयास का रहा है, क्योंकि अफगानिस्तान इस क्षेत्रीय संगठन में है. मुझे नहीं लगता कि कोई भी सार्क देश पाकिस्तान की इस चाल में आएगा.’

सार्क पर फैसला जल्दबाजी में नहीं लेगा भारत
वहीं पाकिस्तान के न्यौते को लेकर भारत ने सधा हुआ रुख अपनाया हुआ है. सूत्रों ने न्यूज़18 को बताया कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और पाकिस्तान के रवैये के चलते ही सार्क सम्मेलन में रोड़ा अटका हुआ है ना कि भारत के रवैये से. सूत्रों ने बताया कि अभी तक पाकिस्तान ने केवल अपना न्योता दोहराया है ना कि औपचारिक ऐलान या औपचारिक न्यौता भेजा है. लिहाजा जब औपचारिक न्यौता आएगा, उसके बाद ही उस पर फैसला लिया जाएगा. 2016 में उरी में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने सार्क सम्मेलन का बहिष्कार किया था, जिसके चलते उस साल नवंबर में बाकी सदस्य देशों ने भी बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया था.

Tags: India pakistan, SAARC

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