OPINION । घरेलू मामलों से ध्यान भटकाने के लिए पाक कर रहा कुलभूषण जाधव का इस्तेमाल

पाकिस्तान में लंबे समय से राजनैतिक और आर्थिक मोर्चे पर बड़े झटके सहन करता आ रहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि अब उसने इनके प्रबंधन का आसान उपाय खोज लिया है जो हम मेजर जनरल आसिफ गफूर के बयानों में देखते आये हैं.

Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 12:09 PM IST
OPINION । घरेलू मामलों से ध्यान भटकाने के लिए पाक कर रहा कुलभूषण जाधव का इस्तेमाल
पाकिस्तान और भारत अपने-अपने तरीकों से आईसीजे के फैसले को देख रह हैं. (फाइल फोटो)
Santosh K Verma
Santosh K Verma | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 12:09 PM IST
पाकिस्तान के भारत विरोधी भ्रामक दुष्प्रचार को एक बड़ा झटका लगा जब 17 जुलाई को हेग स्थित अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय की एक बेंच, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अब्दुलकवी अहमद युसूफ कर रहे थे, ने अपने फैसले में कुलभूषण जाधव के मामले में पाकिस्तान की सैन्य अदालत द्वारा दी गई मृत्युदंड की सजा पर रोक लगा दी और स्पष्ट रूप से निर्देश दिए कि जब तक पाकिस्तान इस मामले पर 'प्रभावी रूप से समीक्षा और पुनर्विचार' नहीं कर लेता यह रोक जारी रहेगी. इसके साथ ही साथ अंतरर्राष्ट्रीय न्यायलय ने एक बार फिर इस मामले में इस्लामाबाद से नई दिल्ली को जल्द से जल्द काउंसलरएक्सेस की अनुमति उपलब्ध कराने को भी कहा है. उल्लेखनीय है कि 15-1 के बहुमत से दिए गए इस फैसले में एकमात्र विरोधी वोट पाकिस्तान के ही एड-हॉक जज तसादुक हुसैन गिलानी की ओर से आया.

पाकिस्तान ने चीफ जस्टिस के तौर पर एक साल काम कर चुके गिलानी को जाधव केस में एक एड-हॉक जज के तौर पर नियुक्त किया है. अंतरर्राष्ट्रीय न्यायलय के विधान के अनुच्छेद 31 के तहत कोई देश, जब उसका कोई भी जज बेंच में नहीं होता है तो एड-हॉक जज की नियुक्ति कर सकता है. इस मामले में चीन की भूमिका महत्वपूर्ण रही और उसकी प्रतिनिधि जज और इस सुनवाई के दौरान कोर्ट की उपाध्यक्ष जू ने इस फैसले के प्रति सहमती में वोट किया. इस मामले में फैसला आईसीजे की 15 सदस्यीय पीठ द्वारा सुनवाई के करीब पांच महीने बाद आया है, जब जस्टिस यूसुफ ने भारत और पाकिस्तान द्वारा मौखिक प्रस्तुतियां सुनने के बाद 21 फरवरी 2019 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. कार्यवाही दो साल और दो महीने तक चली. हालांकि अदालत ने पाकिस्तान में सैन्य अदालत द्वारा जाधव को दी गई सजा को रद्द करने और उनकी तत्काल रिहाई के लिए भारत की याचिका को खारिज भी किया है .

पृष्ठभूमि

इस सारे घटनाक्रम की शुरुआत लगभग 3 वर्ष पूर्व हुई जब पाकिस्तान द्वारा 3 मार्च 2016 को कुलभूषण जाधव को गिरफ्तार किया गया. 24 मार्च 2016 को पाकिस्तान की सेना समारोहपूर्वक इस बात की घोषणा करती है कि उसने 'दक्षिणी बलूचिस्तान' से एक 'भारतीय जासूस' को पकड़ा है. जिसके तुरंत बाद भारत ने इसका खंडन किया और स्पष्ट किया कि कुलभूषण जाधव भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं, भारत सरकार के अंतर्गत उनकी कोई भूमिका नहीं है और पाकिस्तान द्वारा ईरान से उनका अपहरण किया गया है. 29 मार्च 2016 को भारत ने कुलभूषण जाधव के मामले में इस्लामाबाद से काउंसलर एक्सेस की मांग की और अगले एक साल में ऐसे 16 अनुरोध किए, जिन्हें पाकिस्तान द्वारा लगातार अस्वीकार कर दिया जाता रहा. एक साल के अन्दर 10 अप्रेल 2017 को एक पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने जाधव को 'पाकिस्तान के खिलाफ जासूसी और तोड़फोड़ की गतिविधियों में शामिल होने के लिए' मौत की सजा सुना दी.

पाकिस्तान द्वारा कुलभूषण जाधव को काउंसलर एक्सेस देने से लगातार इनकार और इस संभावना पर कि उनका मृत्युदंड कभी भी निष्पादित किया जा सकता है, भारत ने 8 मई 2017 को हेग में अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. 18 मई 2017 को न्यायालय की एक पीठ ने पाकिस्तान को कुलभूषण जाधव को फांसी देने से तब तक के लिए रोक दिया, जब तक कि अदालत इस मामले पर किसी नतीजे तक नहीं पहुंच जाती. जून 2017 से भारत और पाकिस्तान द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों के आधार पर इस वर्ष 18 से 21 फरवरी के बीच कोर्ट ने चार दिन की सुनवाई पूरी की और फैसला सुरक्षित रखा जो 17 जुलाई 2019 को सुनाया गया .



इस पूरे मामले में पाकिस्तान द्वारा कई भयंकर अनियमितताएं की गईं जो विश्व समुदाय के सामने इसे शंकास्पद बनाती हैं. पाकिस्तान ने कुलभूषण जाधव को 3 मार्च 2016 को गिरफ्तार किया, जबकि भारत को इसकी सूचना 24 मार्च को दी गई. इसके बाद भारत द्वारा की गई काउंसलर एक्सेस की मांग को लगातार ठुकराया जाता रहा. आखिर पाकिस्तान को इससे क्या डर हो सकता था कि अगर जाधव को भारतीय प्रतिनिधि से मिल लेने दिया जाता?
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अप्रैल 2017 में एक पाकिस्तानी सैन्य अदालत (फील्ड जनरल कोर्ट मार्शल (FGCM) ने जाधव को उनके तथाकथित 'कबूलनामे' के आधार पर मौत की सजा सुनाई. FGCM एक सैन्य अदालत है जिसमें पाकिस्तानी सेना के अधिकारी शामिल हैं. जिसमे सेना के अधिकारी वकील और न्यायाधीश हैं और साथ ही इसके न्यायाधीशों को कानून की विधिवत शिक्षा-दीक्षा तक की आवश्यकता नहीं है. अब सेना ही कुलभूषण जाधव को अपनी कस्टडी में रखती है. वही गुनाह कबूल करवाती है, फिर वही अपने द्वारा बनाई गई अदालत में अभियोजन लाती है और उसे सजा भी सुना देती है. यह पाकिस्तान सरकार की तथाकथित 'निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया' का एक नमूना है .

खास बात इस दौरान समस्त प्रक्रिया में हास्यास्पद रूप से अत्यंत मूर्खतापूर्ण प्रलाप जारी रहते हैं. कुलभूषण के खिलाफ आरोपों को और अधिक सशक्त बनाने के लिए पाकिस्तान 'तहरीके तालिबान पाकिस्तान' का सहारा लेने से भी नहीं चूकता. पाकिस्तान की सेना द्वारा तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) और जमात-उल-अहरार के पूर्व प्रवक्ता एहसानुल्लाह एहसान जो अप्रेल 2017 में अफगानिस्तान से लगी सीमा पर पकड़ा जाता है पाकिस्तान में 'भारत के नापाक मंसूबों' का खुलासा करने लगता है. पाकिस्तान की सेना के अनुसार अपने गोपनीय बयान में, एहसान ने दावा किया कि टीटीपी और जमात, जो अफगानिस्तान में भारतीय और अफगान सुरक्षा एजेंसियों के समन्वय में कार्य कर रहे हैं, पाकिस्तान में घुसपैठ करने के लिए भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ इनका निर्देशन करती है. उल्लेखनीय है ये वही टीटीपी है जो पाकिस्तान की सरकार के खिलाफ इस आधार पर युद्ध छेड़े हुए है कि यह अमेरिका के साथ सहयोग और तथाकथित इस्लाम विरोधी नीतियों पर चल रही है और पाकिस्तान की सरकार भी जानती है कि यह संगठन कैसे खड़ा हुआ और कैसे उसके नियंत्रण से बाहर निकल गया .



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अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय और भारतीय पक्ष

चूंकि अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय, अंतरराष्ट्रीय कानूनों से बंधा है और इसकी अपनी जटिलताएं और सीमायें हैं, जिसका परिणाम यह है कि कुलभूषण जाधव मामले से जुड़े अनेक तथ्यों पर ध्यान ही नहीं दिया गया. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में व्यक्ति नहीं बल्कि राष्ट्र पक्ष होते हैं और यहां अंतरर्राष्ट्रीय राजनीतिक गुटबाजी के प्रभावी होने के प्रबल अवसर होते हैं जो कई बार न्याय प्राप्ति को जटिल और अंतरर्राष्ट्रीय संबंधों के उलझे ताने बाने का हिस्सा बना देती है .

यद्यपि न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कुलभूषण जाधव वाले मामले में काउंसलर एक्सेस सुविधा न देने से उनके उन मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ जिनका उल्लेख अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार संविदा आइसीसीपीआर में है. इसके साथ ही 18 मई 2017 वाले निर्णय का निष्कर्ष यह भी था कि इस्लामाबाद ने वियना कन्वेंशन ऑफ काउंसलर रिलेशंस, 1963 के अनुच्छेद 36 का उल्लंघन किया था, जिसमें पाकिस्तान सेना द्वारा हिरासत में लेने के तुरंत बाद जाधव की गिरफ्तारी के बारे में नई दिल्ली को सूचित नहीं किया गया था.

भारत को क्या करना है?

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के बयान के अनुसार वह अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान के कानूनों के अनुसार काउंसलर एक्सेस देने को तैयार हो गया है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के अनुसार अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय के फैसले के आधार पर कमांडर कुलभूषण जाधव को राजनयिक संबंधों पर विएना संधि के अनुच्छेद 36 के पैराग्राफ 1 के तहत उनके अधिकारों के विषय में अवगत करा दिया गया है. भारत लंबे समय से इसकी मांग करता आ रहा था और अब उसे इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन करनी है. सर्वप्रथम जाधव के मामले को देखने के लिए न्यायिक विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित करानी होगी ताकि इस मामले से सम्बन्धित तथ्यों और साक्ष्यों की जांच की जा सके, जो कि सैन्य अदालतों में चल रहे मुकदमों में पाकिस्तान उपलब्ध नहीं कराता .

पाकिस्तान का रुख

पाकिस्तान में लंबे समय से राजनैतिक और आर्थिक मोर्चे पर बड़े झटके सहन करता आ रहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि अब उसने इनके प्रबंधन का आसान उपाय खोज लिया है जो हम मेजर जनरल आसिफ गफूर के बयानों में देखते आये हैं. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय के बाद पाकिस्तान ने जोर-शोर से अपनी जीत के दावे पेश कर दिए. कारण यह बताया गया कि कुलभूषण को उसकी हिरासत में रहना होगा. स्पष्ट है कि इसका उद्देश्य सरकार द्वारा अपनी इज्जत बचाना है. पाकिस्तान की नई सरकार लगभग हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है और आम आदमी का जीवन दुभर हो चुका है और पाकिस्तान में गहरा तनाव और असंतोष व्याप्त है. ऐसी स्थिति में यह अंतरर्राष्ट्रीय फजीहत पाकिस्तान की सरकार को और भी अधिक शर्मिदगी का अहसास कराती, लिहाजा उन्होंने इसका सरल उपाय निकाला और अपनी हार को जीत में रूपांतरित कर दिया .



पाकिस्तान की सैन्य अदालत द्वारा कुलभूषण जाधव को दिया गया मृत्युदंड अविवेकपूर्ण और मनमाने तरीके से दिया गया है. अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा इस मामले में दिए गए निर्णयों में पाकिस्तान द्वारा की गई गड़बड़ी के संकेत भी प्राप्त होते हैं. मई 2017 में इस मामले की सुनवाई करते हुए अंतरर्राष्ट्रीय न्यायालय के जस्टिस रोनी अब्राहम ने कहा था कि पाकिस्तान द्वारा उपलब्ध कराये गए सबूतों के आधार पर जाधव को पाकिस्तान द्वारा जासूस बताने वाला दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता और साथ ही जाधव की गिरफ्तारी को विवादित मुद्दा भी बताया .

वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान के न्यायिक प्रणाली में बड़ी कमी अंतर्निहित हैं. इस देश के अन्दर समानांतर शासन व्यवस्था की ही तरह एक समानांतर कानूनी प्रणाली भी मौजूद है, जिसका संचालन सेना द्वारा किया जाता है, जिसकी न तो पाकिस्तान के संविधान में, न ही लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के प्रति, न तो तकनीकी और न ही नैतिक जिम्मेदारी है.

कुलभूषण जाधव को अप्रैल 2017 में सजा सुनाये जाने के समय पर ही पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के बार एसोसिएशन ने पाकिस्तान की सेना की न्यायालय के रूप में इस भूमिका को जो उसे 21 वें संविधान संशोधन द्वारा दी गई, के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया था, जिसमे स्पष्ट रूप से कहा गया कि यह पाकिस्तान के लोगों के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है और 1973 के संविधान के अनुच्छेद 175 के भी विरुद्ध है. यह स्पष्ट करता है कि पाकिस्तान का सैन्य तंत्र जो अपने देशवासियों के प्रति ईमानदार नहीं हो पाता, वह किसी अन्य देश के नागरिक के प्रति यह भावना कैसे प्रदर्शित कर सकता है, और विशेषकर उस देश के प्रति तो बिल्कुल भी नहीं जिसने उस पर कई मौकों पर पराजय का भार लादा है .

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(लेखक पाकिस्तान संबंधी विषयों के विशेषज्ञ हैं. प्रस्तुत लेख में लेखक के विचार, उनके व्यक्तिगत विचार हैं)

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First published: July 22, 2019, 11:59 AM IST
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