पाकिस्तानी अखबारों ने सरकार द्वारा आतंकवाद को कुचलने के दावे को बताया झूठ

पाकिस्तानी अखबारों ने सरकार द्वारा आतंकवाद को कुचलने के दावे को बताया झूठ
प्रतीकात्मक फोटो

अखबारों ने बताया कि पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना की लगातार कोशिशों से तहरीक-ए-तालिबान जैसे संगठन के कदम पीछे हट गए लेकिन वे इतने कमज़ोर नहीं हुए कि फिर से हमले न कर सकें.

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आम चुनाव से पहले आतंकवादी हमलों में करीब 150 लोगों के मारे जाने पर पाकिस्तान रविवार को शोक दिवस मना रहा है और ऐसे में पाकिस्तान के प्रमुख अखबारों ने सेना और सरकार के इस दावे पर सवाल खड़ा किया है कि उन्होंने देश में आतंकवाद को कुचल डाला है.

अशांत बलूचिस्तान और पख्तूनख्वा प्रांतों में चुनावी रैलियों पर एक के बाद एक करके तीन हमले हुए जिनमें 150 नागरिकों के साथ दो बड़े नेता भी मारे गए. इससे यह चिंता फिर खड़ी हो गई है कि हिंसा से 25 जुलाई के मतदान में बाधा पहुंच सकती है.

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आतंकवादी हमलों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपने एडिटोरियल में लिखा, ‘‘पाकिस्तान में आतंकवादी ताकतों को खदेड़ने के सरकार के दावे में खून के छींटे हैं.’’ उसने लिखा है कि पुलिस, अर्धसैनिक बलों और सेना की लगातार कोशिशों से तहरीक-ए-तालिबान जैसे संगठन के कदम पीछे हट गए लेकिन इतने नहीं हटे कि वे फिर से घातक प्रहार नहीं कर पाएं. उसने कहा कि चुनाव प्रचार पूरे जोरों पर है और ऐसे में जब इन संगठनों से मुकाबला करने की बात सामने आती है तो सरकार की इच्छाशक्ति और ताकत पर सवाल खड़ा होता है.
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डॉन अखबार ने अपने एडिटोरियल में लिखा है कि आतंकवादी हमलों में अचानक बढ़ोत्तरी होने से ज़रूरी हो जाता है कि सरकार सुरक्षा की मांग करने वाले सभी उम्मीदवारों को अविलंब सुरक्षा देने समेत तत्काल ज़रूरी उपाय करे. बिना किसी चेतावनी के हुए इन हमलों से खुफिया तंत्र में चूक का संकेत मिलता है.

द न्यूज ने अपने संपादकीय में लिखा है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उसने खतरे में चल रहे लोगों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान कर चुनाव की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त कार्रवाई क्यों नहीं की.
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