पंडित जसराज; जिन्होंने संगीत से पिता को जीवंत करने के लिए बड़े गुलाम अली की शागिर्दी ठुकरा दी!

पंडित जसराज; जिन्होंने संगीत से पिता को जीवंत करने के लिए बड़े गुलाम अली की शागिर्दी ठुकरा दी!
पंडित जसराज अब हमारे बीच नहीं हैं. उनका सोमवार को अमेरिका में निधन हो गया.

एक बार बड़े गुलाम अली ने पंडित जसराज से कहा कि तुम मेरे शागिर्द बन जाओ. इस प्रस्ताव को सकुचाते हुए ठुकराकर जसराज ने जवाब दिया, ‘चचा जान, ‘मैं आपसे गाना नहीं सीख सकता. क्योंकि मैं अपने पिता (पंडित मोतीराम) को जिंदा करना चाहता हूं.’ यह सुनकर उस्ताद की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने हाथ उठाकर कहा- अल्लाह तेरे मन की मुराद पूरी करे.’

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  • Last Updated: August 17, 2020, 11:47 PM IST
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(नीलेश द्विवेदी)

ख़बर आई है कि पंडित जसराज नहीं रहे. पर क्या ऐसा हो सकता है भला? ये सवाल ग़ैरवाज़िब नहीं, बल्कि सोचने लायक है. क्योंकि जो शख़्स अपने संगीत से पिता को भी जीवंत करने का इरादा रखता हो. जिसने अपने संगीत से पिता के साथ-साथ ख़ुद को भी समयातीत-सा बना लिया हो, क्या वो यूं दुनिया से छोड़ सकता है? नहीं. हां, उनकी देह का अंत हुआ है अलबत्ता और ये सच्चाई है. लेकिन बस इतनी ही. पंडित जसराज ख़ुद भी देह-गेह की बस इतनी ही सच्चाई को स्वीकार करते थे शायद. ख़ुद उनके जीवनकाल से जुड़े किस्सों से ये बात साबित होती है.

मसलन- साल 1960 का एक वाकया है. ख़ुद उन्हीं की जुबानी, ‘उस समय उस्ताद बड़े गुलाम अली को दिल का दौरा पड़ा था. वे मुंबई में थे. मेरा भी कार्यक्रम था मुंबई में. वहां पहुंचा तो मेरा मन उस्ताद से मिलने का हुआ. सो चला गया उनके पास. जब उनके घर पहुंचा तो उन्हें अकेले लेटे हुए पाया. मैं उनके पैरों के पास जाकर बैठ गया. मुझे देखकर उनके मन में प्यार उमड़ आया. उन्होंने मुझसे कहा- जसराज, तू मेरा शागिर्द बन जा. यह सुनकर मेरी तो बोलती ही बंद हो गई. कुछ देर समझ ही नहीं आया क्या जवाब दूं. फिर संभलकर मैंने उन्हें जवाब दिया, ‘चचा जान, मैं आपसे गाना नहीं सीख सकता. उन्होंने पूछा- क्यों तो मैंने कहा- क्योंकि मैं मेरे पिता (पंडित मोतीराम) को जिंदा करना चाहता हूं. यह सुनकर उस्ताद की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने हाथ उठाकर कहा- अल्लाह तेरे मन की मुराद पूरी करे.’



ऐसा ही एक किस्सा पंडित जसराज अपने पिता और चाचा (पंडित जोतीराम) से जुड़ा भी बताया करते थे. उनके मुताबिक, ‘मेरे पिता और चाचा को उनके मामा नत्थूलाल जी ने सात साल तक गाना सिखाया. फिर उनका देहांत हो गया. लेकिन उसके तीन-चार दिन बाद उनकी वाणी मेरे पिता के कानों में गूंजी. उन्होंने कहा- बेटा, मैंने तुझे सात साल तक सिखाया लेकिन रागों के नाम नहीं बताए कि फलां बंदिश का राग कौन सा है. ये मैं तुझे अब बताऊंगा. इस तरह बिना शरीर के उन्होंने लगातार अगले सात बरस तक और मेरे पिता-चाचा को गाना सिखाया… ये अविश्वसनीय है पर ऐसा हुआ है. तो ये गुरु-शिष्य परंपरा और गुरु भक्ति अनन्य उदाहरण है.’
सिर्फ़ देह-गेह ही नहीं, संगीत की पारलौकिकता को भी पंडित जसराज बखूबी महसूस किया करते थे, ऐसा कहा जा सकता है. बल्कि ये भी कह सकते हैं कि वे सुरों को अपने आस-पास ‘सशरीर’ जैसा महसूस करते थे. वह भी उनकी पूर्णता के साथ. उदाहरण के लिए कुछ किस्से उन्होंने अपनी गायकी के संदर्भ में साझा किए हैं. उनके मुताबिक, ‘पुणे के एक सज्जन हैं, विद्याधर पंडित. उन्होंने एक बार मुझसे कहा कि आप सुर को हिट (ज्यादा जोर देना) नहीं करते.…. आप सुर को ऐसे लगाते हैं, जैसे छोटे बच्चे को सहला रहे हों. उससे प्यार कर रहे हों.….तब मुझे भी ध्यान आया कि हां, वाकई मैं सुरों को हिट नहीं करता. और ये बात मुझे किसी और से पता चली.’

इसी तरह सुरों के अलग-अलग दर्जे (भिन्न रागों में एक ही सुर का अलग-अलग प्लेसमेंट) के बारे में वे कहते हैं, ‘हमारी तो पूरी रागदारी इसी पर निर्भर है.… सूक्ष्म भाव से विचार करें तो यह सब पता चलता है कि यमन की ‘ऋषभ’ (सरगम का दूसरा सुर ‘रे’), शुद्ध नट की ‘ऋषभ’ और जौनपुरी की ‘ऋषभ’ अलग-अलग हैं. तालीम होगी, चिंतन होगा, पूरी तरह डूबकर साधना करेंगे, तब साधक इस सूक्ष्मता को महसूस कर सकते हैं. उसे साकार कर सकते हैं, नहीं तो खेल ख़त्म.’

पंडित जसराज विपरीतताओं का अस्तित्व भी ऐसी ही सहजता से स्वीकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘हां, मुझे पता है कि कुछ लोग मुझे (बड़ा संगीतकार) नहीं मानते. जो असल रसिया, संगीत के समझदार श्रोता और मर्मज्ञ माने जाते हैं, वे लोग मुझे नहीं मानते. हालाँकि इसका कारण मुझे नहीं मालूम कि वो मुझे क्यों नहीं मानते.… ये अगर मुझे पता होता, तो उसे (अपने संगीत की किसी कमी के प्रश्न पर) ठीक न कर लेता.… अगर मुझे कभी यह मालूम हो जाता है कि यह व्यक्ति मेरा गाना पसंद नहीं करता तो उसे मैं समझाने की कोशिश नहीं करता. न बातों से, न गाने से और न व्यवहार से. बल्कि जरा दूर ही रहता हूं.…. ये अगर मेरी साधना तो वह भी मैं ख़ुद नहीं करता. वो (ईश्वर) करवाता है. मुझे तो पूरा यकीन है कि भाई, मैं, मैं नहीं हूं. कोई और है.…. उसे कुछ भी कह लीजिए. कोई भी नाम दे दीजिए.’

कल्पना करें कि जो अपने अस्तित्व में पारलौकिक सत्ता का अनुभव करता हो. जो सुर-संगीत को साक्षात् महसूस करता हो. जिसे गुरु-शिष्य के भाव का अहसास देह-गेह के दायरे से इतर जाकर होता हो. जो विपरीतताओं के अस्तित्व को भी सहज स्वीकार कर लेता हो, ऐसा शख़्स हमें छोड़कर कभी जा सकता है क्या? नहीं जा सकता. वे यहीं हैं और देह के बंधन से मुक्त होकर हर कहीं हैं. (ख्यात ध्रुपद गायक गुंदेचा बंधुओं की एक पुस्तक है, ‘सुनता है गुरु ज्ञानी’. पंडित जसराज का एक विस्तृत साक्षात्कार इस पुस्तक में दर्ज है. ऊपर बताए गए किस्से उसी साक्षात्कार का अंश हैं.)

(यह लेखक के निजी विचार हैं. लेखक दो दशक से मीडिया से जुड़े हुए हैं. दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, अमर उजाला, दूरदर्शन भोपाल के लिए काम कर चुके हैं. अब स्वतंत्र लेखन करते हैं.)
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