विधायक से लेकर विदेश मंत्री तक, पढ़ें सुषमा स्वराज का पूरा सफरनामा

वरिष्ठ बीजेपी नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का 67 साल की उम्र में मंगलवार रात हार्ट अटैक से निधन हो गया. पिछले कुछ वक्त से वे अस्वस्थ थीं.

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Updated: August 7, 2019, 6:51 AM IST
विधायक से लेकर विदेश मंत्री तक, पढ़ें सुषमा स्वराज का पूरा सफरनामा
मंगलवार रात सुषमा स्वराज का हार्ट अटैक से निधन हो गया (फाइल फोटो)
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Updated: August 7, 2019, 6:51 AM IST
वरिष्ठ बीजेपी नेता और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का 67 साल की उम्र में मंगलवार रात हार्ट अटैक से निधन हो गया. सुषमा स्वराज पिछले कुछ वक्त से अस्वस्थ चल रही थीं. अपने स्वास्थ्य का ही हवाला देते हुए उन्होंने 2019 के आम चुनावों में उम्मीदवारी के लिए भी मना कर दिया था.

सुषमा स्वराज के निधन की ख़बर पाकर नितिन गडकरी और हर्षवर्धन समेत भाजपा के कई बड़े नेता उनके दर्शन के लिए पहुंचे. आइए जानें कैसा रहा सुषमा स्वराज का राजनीतिक सफर...

राजनीति में आने से पहले की थी राजनीति विज्ञान की पढ़ाई
सुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 में अविभाजित पंजाब की अंबाला छावनी में हुआ था. परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के लाहौर का था, जो विभाजन के बाद अंबाला आ गया. सुषमा के पिता हरदेव शर्मा कट्टर सनातनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य थे, लिहाजा घर में अक्सर राजनैतिक चर्चाएं फिजाओं में तैरा करती थीं. सुषमा ने अंबाला के सनातन धर्म कॉलेज से संस्कृत और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई की.

इसी दौरान उन्हें कॉलेज की सर्वश्रेष्ठ छात्रा और अपने ओजस्वी भाषण की वजह से लगातार तीन सालों तक सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार मिला. यहां से सुषमा चंडीगढ़ पहुंचीं और पंजाब विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री ली. लॉ कॉलेज में भी सुषमा ने अपने प्रखर और स्पष्ट विचारों से जल्द ही विद्यार्थियों से लेकर प्रोफेसरों के बीच भी धाक जमा ली.

सुषमा स्वराज को मिला अपने ही जैसा जीवन साथी
साल 1973 में तेजतर्रार सुषमा ने सुप्रीम कोर्ट में बतौर अधिवक्ता करियर की शुरुआत की और इसके बाद से कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ती ही गईं. इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में ही उनकी मुलाकात स्वराज कौशल से हुई. वैचारिक समानता और देश की सामाजिक-राजनैतिक चर्चाओं-बहसों के बीच दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और 1975 में उनका विवाह हो गया. दोनों का जोड़ टक्कर का रहा. कौशल के नाम भी कई उपलब्धियां दर्ज हैं, साथ ही वे छह साल तक राज्यसभा में सांसद भी रहे. दोनों की एक बेटी है बांसुरी स्वराज जो लंदन में वकालत कर रही है.
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आपातकाल के दौर में जेपी आंदोलन से जुड़ीं सुषमा स्वराज
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही सुषमा का राजनीति में रुझान दिखने लगा था. वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गईं थीं लेकिन उनके असली तेवर आपातकाल के दौरान सामने आए, जब वे जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का हिस्सा बनीं, आपातकाल में इंदिरा की निर्ममता के मद्देनजर उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए उठाया गया ये कदम पूरे देश में आग की तरह फैल गया और इसके साथ ही जन्म हुआ राजनीतिज्ञ सुषमा स्वराज का.

फिर मात्र 25 साल की उम्र में कैबिनेट मंत्री बनीं सुषमा स्वराज
आपातकाल खत्म होने के साथ ही वे सक्रिय राजनीति के लिए जनता पार्टी से जुड़ गईं. साल 1977 में ही उन्होंने श्रममंत्री का पद संभालकर महज 25 साल की उम्र में यानी सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बनने की उपलब्धि हासिल की.

उनके नाम सबसे कम उम्र में जनता पार्टी हरियाणा की अध्यक्ष बनने का रिकॉर्ड भी है. 1987 में जब सुषमा स्वराज हरियाणा विधानसभा में फिर से चुनकर आईं तो उसके बाद उन्होंने 1987 से 1990 तक सिविल आपूर्ति, खाद्य और शिक्षा मंत्रालय आदि का भार संभालती रहीं.

सूचना प्रसारण मंत्री के तौर पर शुरू करवाया लोकसभा की कार्यवाही का लाइव प्रसारण
अप्रैल, 1990 में वे राज्यसभा में निर्वाचित हुईं. 1996 में वे 11वीं लोकसभा में भी चुनी गईं और अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिनों की सरकार के दौरान उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाला. इसी दौरान उन्होंने केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में लोकसभा की कार्यवाही के लाइव प्रसारण की शुरुआत की.

1998 में वे 12वीं लोकसभा में भी चुनकर आईं. वर्ष 1998 में ही उन्होंने 13 अक्टूबर से 3 दिसंबर तक दिल्ली की पहली मुख्यमंत्री के तौर पर भी काम किया.

बेल्लारी से सुषमा स्वराज ने लड़ा सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव
उनके राजनीतिक करियर ने साल 1999 में फिर से टर्न लिया और उन्हें सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी से चुनावी रण में उतारा गया. दरअसल, बीजेपी का यह कदम विदेशी बहू सोनिया गांधी के जवाब में भारतीय बेटी को उतारने की नीति का हिस्सा था. हालांकि सुषमा यह चुनाव हार गईं. जिसके बाद साल 2000 में वह राज्यसभा सांसद चुनी गईं और अटल बिहारी सरकार में फिर से सूचना प्रसारण मंत्री बनीं.

इस दौरान न सिर्फ बीजेपी बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनका कद काफी बढ़ गया था. यही कारण था कि साल 2009 में उन्हें बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री उम्मीदवार माना जा रहा था. हालांकि जब इन चुनावों में कांग्रेस फिर से सत्ता में आई तब स्वराज विपक्ष की नेता के तौर पर चुनी गईं. इस पद पर वह साल 2014 तक बनी रहीं. 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने के बाद मोदी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया. इस दौरान ट्विटर की मदद से वो लोगों की मदद करतीं रहीं.

जब संयुक्त राष्ट्र के मंच पर खड़े होकर पूछे संयुक्त राष्ट्र से सवाल
30 सितंबर, 2018 का दिन भारतीयों को भुलाए नहीं भूलेगा. इस दिन केंद्रीय विदेश मंत्री रहते हुए सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र के मंच से उसे ही सीख दे दी थी. उन्होंने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र को तत्काल सुधारों की जरूरत है. उन्होंने इस मौके पर कहा था कि वे संयुक्त राष्ट्र की विशिष्ट और सकारात्मक भूमिका को रेखांकित करते हुए अपनी बात शुरू करेंगी लेकिन वे यह जरूर कहेंगीं कि कदम दर कदम इस संस्था के महत्व, प्रभाव, सम्मान और मूल्यों में गिरावट शुरू हो रही है.

सुषमा स्वराज ने कहा था कि वसुधैव कुटुंबकम की बुनियाद परिवार है और परिवार प्यार से चलता है, व्यापार से नहीं. परिवार मोह से चलता है, लोभ से नहीं. इसलिए हमें यूएन को परिवार के सिद्धांतों पर चलाना होगा.

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First published: August 7, 2019, 6:51 AM IST
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