Opinion: किसानों को सिर्फ भटकाएगी टकराव की राह, लोकतंत्र को बंधक न बनाएं; घर लौटें!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि उनके और किसानों के बीच सिर्फ़ फ़ोन कॉल भर की दूरी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि उनके और किसानों के बीच सिर्फ़ फ़ोन कॉल भर की दूरी है.

Farmer Protest: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि उनके और किसानों के बीच सिर्फ़ फ़ोन कॉल भर की दूरी है. इस बयान को भी किसानों को पूरी सकारात्मकता के साथ लेना चाहिए. राकेश टिकैत अगर इस बयान का मखौल उड़ाते हैं, तो साफ़ है कि उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार पर भरोसा नहीं है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 3, 2021, 7:46 PM IST
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तीनों कृषि सुधार क़ानूनों को वापस लेने की मांग पर अड़े किसानों को दिल्ली की सीमाओं को घेरे 70 दिन हो चुके हैं. हरियाणा के जींद ज़िले में 3 फरवरी को 50 खापों के किसानों ने महापंचायत में किसान नेता राकेश टिकैत ने ऐलान कर दिया है कि सरकार के पास अक्टूबर तक का समय है. अगर सरकार ने तीनों क़ानून तब तक वापस नहीं लिए, तो 44 लाख ट्रैक्टरों के साथ मार्च किया जाएगा. साफ़ है कि आंदोलन पर अड़े किसानों ने देश में अराजक माहौल बनाने की ठान ली है और उन्हें देश के लोकतांत्रिक सिस्टम पर कोई भरोसा नहीं है. कोई भी मांग कितनी भी जायज़ हो, उसका निपटारा संवैधानिक दायरे में ही हो सकता है. इस लिहाज़ से अब इस किसान आंदोलन की चरम परिणिति क्या होगी या हो सकती है, यह समझना मुश्किल नहीं है. न ही अब यह समझना मुश्किल है कि किसान आंदोलन की आड़ में मोदी विरोधी शक्तियों ने हाथ मिला लिए हैं और आंदोलन को जीवित रखने की योजनाएं पर्दे के पीछे से बनाई जा रही हैं. बड़ा सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में भीड़ के नाम पर या कहें कि लोक के नाम पर अराजक माहौल बनाने की इजाज़त दी जा सकती है?







लोकतंत्र पर भरोसा नहीं करता, तो उसे बदलने की संवैधानिक व्यवस्था बाक़ायदा है. यह सही है कि आज़ादी के सात दशक बाद भी किसानों के हालात उतने नहीं बदले, जितने बदल जाने चाहिए थे. लेकिन इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? किसानों को इस प्रश्न की तह तक जाना चाहिए. अगर मोदी सरकार के तीन क़ानून किसानों का भविष्य बेहतर बनाने वाले साबित नहीं होते हैं, तो यह समझने के लिए पहले उन्हें लागू तो करना ही पड़ेगा. तभी वस्तुस्थिति का सही आकलन हो सकता है. अगर ये क़ानून बेअसर साबित होते हैं, तो किसान बेशक सरकार बदलने तक का मन बना सकते हैं, लेकिन इस तरह देश भर को परेशान करने से क्या हासिल होगा?

क़ानूनों में भविष्य में संशोधन का रास्ता भी साफ़ है. सरकार तो अभी ही कह चुकी है कि वह किसानों के सुझाव मान कर क़ानूनों में बदलाव को तैयार है, लेकिन अब अगर आप इसी बात पर अड़ जाएंगे कि पहले क़ानून वापस लिए जाएं, तो यह एक तरह से देश के संविधान का मखौल उड़ाना ही है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर विशेषज्ञों की समिति काम कर ही रही है और उसके सुझावों पर कोर्ट को विचार करना है. ऐसे में आंदोलन पर अड़े किसान नेता सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट की महत्ता को कम कर रहे हैं. अगर क़ानून सही नहीं हैं, तो सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक दायरे में उन्हें रद्द करने की सिफ़ारिश कर सकती है. ऐसे में किसानों को सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए.

26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा के बाद ख़ुफ़िया जानकारी मिली है कि किसान आंदोलन वाली जगहों पर बड़ी संख्या में हथियार जमा किए गए हैं. ख़ास तौर पर सिंघु और टीकरी बॉर्डरों पर. 26 जनवरी को भी हमने किसानों के हाथों में तलवारें, खड्ग, भाले और लाठियां, स्टील और लोहे की रॉड देखी थीं. पुलिस कर्मियों पर उनसे हमले भी किए गए थे. ट्रैक्टरों तक को उपद्रवियों ने हथियार की तरह इस्तेमाल किया था. उसे देखते हुए पुलिस-प्रशासन इस बार ज़्यादा चौकस है. ठीक है कि लाठी-डंडे किसान आमतौर पर इस्तेमाल करते हैं और खड्ग सिखों की धार्मिक पहचान से जुड़ा चिन्ह है, लेकिन अगर उनके ज़रिए आप किसी को घायल करने का इरादा रखते हैं, तो फिर आप लोकतंत्र के सच्चे हितैषी तो कम से कम नहीं हो सकते.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि उनके और किसानों के बीच सिर्फ़ फ़ोन कॉल भर की दूरी है. इस बयान को भी किसानों को पूरी सकारात्मकता के साथ लेना चाहिए. राकेश टिकैत अगर इस बयान का मखौल उड़ाते हैं, तो साफ़ है कि उन्हें लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार पर भरोसा नहीं है. सरकार से बात करने के लिए उन्हें कोई ख़ास फ़ोन नंबर जानने की ज़रूरत नहीं है. अभी तो मीडिया किसान आंदोलन को हर पहलू से कवर कर रहा है. किसानों को अगर सरकार से बात करनी है, तो मीडिया में बयान भर जारी करना काफ़ी होगा. सरकार भी राष्ट्रपति के अभिभाषण के माध्यम से साफ़ कर चुकी है कि तीनों कृषि सुधार क़ानून सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद फ़िलहाल स्थगित हैं और सुप्रीम कोर्ट जो भी फ़ैसला करेगा, सरकार उसे मानने के लिए बाध्य होगी.

इस बीच संसद में भी किसान आंदोलन का बिगुल विपक्षी पार्टियों ने बजा दिया है. राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आज़ाद ने बुधवार को देश में किसान आंदोलन के इतिहास का ज़िक्र विस्तार से किया. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उदार रवैया अख़्तियार करने का सुझाव दिया. अच्छा होता कि आज़ाद क़रीब 55 साल तक देश और राज्यों में अपनी पार्टी के शासन काल के दौरान किसानों की बहतरी के लिए जो कुछ भी किया गया, उसका ज़िक्र भी कर पाते. बहरहाल, अब किसान आंदोलन तीन स्तरों पर चर्चा में है. सड़कों पर, सुप्रीम कोर्ट में और अब संसद के बजट सत्र में भी एक खिड़की सरकार और विपक्ष के बीच खुली है. हो सकता है कि इस खिड़की से ही कोई राह निकले.

लब्बोलुआब यह कि किसानों को हठधर्मिता छोड़नी चाहिए. कृषि सुधार क़ानून अगर कहीं से भी असंवैधानिक हैं, तो कोई भी सरकार उन्हें देश पर थोप नहीं सकती. अभी हमारे देश में लोकतंत्र की सच्ची आत्मा बसती है. अदालतों पर लोगों का भरोसा टूटा नहीं है. ऐसे में अब सिर्फ़ अपना सिर ऊंचा रखने के लिए कोई मांग कर करोड़ों लोगों को परेशान किया जा रहा है, तो यह कहीं से भी जायज़ नहीं ठहराया जा सकता. लोकतंत्र में असहमति अथवा विरोध का अधिकार हर नागरिक को है. लेकिन यह देखना भी आवश्यक है कि वह असहमति अथवा विरोध दूसरों के लोकतांत्रिक अधिकारों का अतिक्रमण न करने लगें. अनजाने में ऐसा बहुत बार हो जाता है. लेकिन जब इस बात का एहसास बड़े स्तर पर होने लगे, लोग आपके आंदोलन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने लगें, तो समझदारी इसमें ही है कि ऐसे आंदोलन की नीयत पर दोबारा विचार किया जाए.

(डिसक्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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