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OPINION: मोदी-जिनपिंग की हर मुलाकात में असल मुद्दों पर व्‍यक्तिगत संबंधों को दी गई तरजीह

News18Hindi
Updated: October 11, 2019, 10:54 AM IST
OPINION: मोदी-जिनपिंग की हर मुलाकात में असल मुद्दों पर व्‍यक्तिगत संबंधों को दी गई तरजीह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग की ज्‍यादातर अनौपचारिक मुलाकातें द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाने तक ही सीमित रही हैं.

भारत और चीन (India-China) के रिश्‍ते द्विपक्षीय संबंधों में मतभेदों के प्रबंधन तक सीमित होकर रह गए हैं. डोकलाम में भारत और चीन की सेनाओं के बीच तनाव (Doklam standoff) के कुछ महीने बाद वुहान समिट (Wuhan Summit) हुई थी. इस बार भी पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग (President Xi Jinping) की मुलाकात जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) हटाने के बाद बने तनावपूर्ण माहौल के बीच हो रही है.

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  • Last Updated: October 11, 2019, 10:54 AM IST
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ज़का जैकब

नई दिल्‍ली. भारत-चीन (India-china) के मामले में अनौपचारिक मुलाकातों में एक जैसी बातें ही होती हैं. साबरमती से लेकर वुहान और अब महाबलिपुरम तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) तथा चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग (President Xi Jinping) की मुलाकातों में व्‍यक्तिगत संबंधों (Personal Chemistry) को वास्‍तविक मुद्दों से ज्‍यादा तरजीह दी गई. हालांकि, इस दौरान दोनों नेताओं के पास सभी औपचारिकताओं को किनारे रखकर नया और बेहतर करने का भरपूर मौका था. वहीं, अनौपचारिक मुलाकातों की सबसे बड़ी समस्‍या यही है कि इसमें बैठक के वास्‍तविक नतीजे पता नहीं चल पाते हैं. पता नहीं चल पाता है कि बैठक का असली नतीजा क्‍या निकला.

मतभेदों के समाधान खोजने तक सीमित रहीं अनौपचारिक मुलाकातें
भारत-चीन के रिश्‍ते द्विपक्षीय संबंध (Bilateral Relations) में उभरने वाले मतभेदों (Differences) के समाधान खोजने तक सीमित होकर रह गए हैं. डोकलाम में दोनों देशों की सेनाओं के बीच 72 दिन तक चले तनाव (Doklam standoff) के कुछ महीने बाद पीएम मोदी और राष्‍ट्रपति जिनपिंग की वुहान (Wuhan) में मुलाकात हुई थी. इस दौरान दोनों देशों के संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की ही कोशिश की गई. दोनों शीर्ष नेताओं ने अपने-अपने नौकरशाहों (Bureaucrats) और नागरिकों (Citizens) को संदेश दिया कि उच्‍चस्‍तर पर सब ठीक है. दुर्भाग्‍य से दोनों शीर्ष नेताओं ने इस भावना को निचले स्‍तर तक पहुंचाने के बजाय व्‍यक्तिगत रिश्‍तों को तरजीह दी.

जम्‍मू-कश्‍मीर पर पाकिस्‍तान के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है बीजिंग
महाबलिपुरम में आज होने वाली मोदी-जिनपिंग बैठक भी जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) से अनुच्‍छेद-370 (Article-370) हटाए जाने के फैसले के बाद बने तनाव भरे माहौल में हो रही है. दोनों ही पक्ष इस फैसले को अपने-अपने नजरिये से देख रहे हैं. भारत इसे आतंरिक मामला (Internal Issue) बता रहा है. वहीं, चीन इसे यथास्थिति में एकपक्षीय (Unilateral) बदलाव बता रहा है. शुरुआत में चीन भी लद्दाख (Ladakh) पर इस फैसले के असर को लेकर चिंतित था. लेकिन, पाकिस्‍तान (Pakistan) के रुख को देखकर चीन उसके पक्ष में खड़ा हो गया.

चीन के लिए भारत से कमतर नहीं है पाकिस्‍तान की अहमियत
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चीन ने सबसे पहले संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) की अनौपचारिक चर्चा में मोदी सरकार (Modi Government) के इस फैसले का विरोध किया. संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा (UNGA) में चीन के विदेश मंत्री ने भी इसके खिलाफ बोला था. पाकिस्‍तान के पीएम इमरान खान (PM Imran Khan) के बीजिंग दौरे के बाद संयुक्‍त वक्‍तव्‍य में भी चीन ने विरोध की भाषा बोली. यहां तक कि हाल में चीन की ओर से कहा गया कि शी जिनपिंग हालात पर करीबी नजर बनाए हुए हैं. बीजिंग बार-बार यह बताने की कोशिश करता है कि चीन के लिए पाकिस्‍तान की अहमियत भारत से कमतर नहीं है.

सिर्फ भारत अटका सकता है चीन की महत्‍वाकांक्षा में रोड़े
दक्षिण एशिया में भारत ही इकलौता देश है जो आने वाले समय में चीन के सामने हर मामले में चुनौती पेश कर सकता है. वहीं, चीन अगले 30 साल को जी-2 (चीन और अमेरिका) के दशकों के तौर पर देख रहा है. शिन्‍हुआ यूनिवर्सिटी के विद्वानों का कहना है कि दूसरे विश्‍व युद्ध (World War-2) के बाद अमेरिका (US) ऐसे आगे बढ़ा कि कोई देश उसको अटलांटिक या प्रशांत क्षेत्र में चुनौती नहीं दे पाए. उनका कहना है कि चीन भी महाशक्ति बनने की महत्‍वकांक्षा पाल रहा है. उसकी इस इच्‍छा में सिर्फ भारत ही रुकावट डाल सकता है.

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First published: October 11, 2019, 10:54 AM IST
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