Pfizer Vaccine: तो क्या सिर्फ अमीर देशों को ही मिल सकेगी कोरोना की ये वैक्सीन?

Pfizer की कोरोना वैक्सीन फेज-3 ट्रायल में 90% प्रभावी. (सांकेतिक तस्वीर)
Pfizer की कोरोना वैक्सीन फेज-3 ट्रायल में 90% प्रभावी. (सांकेतिक तस्वीर)

Pfizer Vaccine: वैक्सीनेशन सेंटर्स तक पहुंचने के बाद इन शॉट्स को -70 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखना होगा और अगर ये खराब नहीं होती है तो इसे 5 दिन के भीतर लोगों को देना होगा. फिर वेयर हाउस फ्रीजर से लोगों को दी गई वैक्सीन की इस मेहनत भरी प्रक्रिया को एक महीने बाद फिर से करना होगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 11, 2020, 10:38 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus) के खिलाफ 90 प्रतिशत असर का दावा करने वाली फायजर इंक (Pfizer Inc.) और बायोएनटेक एसई (BioNTech SE) जब कोविड-19 पूरी तरह से तैयार कर लेगी तो इसके बाद इसका अगला चरण शंघाई फोसुन फार्मास्युटिकल ग्रुप कंपनी (Shanghai Fosun Pharmaceutical Group Company) को पूरा करना होगा. ये कंपनी चीन में इस वैक्सीन को एक जटिल और महंगी प्रणाली के साथ डीप फ्रीज एयरपोर्ट वेयरहाउस, रेफ्रीजिरेटेड गाड़ियों और टीकाकरण बिंदुओं के माध्यम से इसे वितरित करने का काम करेगी. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक वैक्सीनेशन सेंटर्स तक पहुंचने के बाद इन शॉट्स को -70 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रखना होगा और अगर ये खराब नहीं होती है तो इसे 5 दिन के भीतर लोगों को देना होगा. फिर वेयर हाउस फ्रीजर से लोगों को दी गई वैक्सीन की इस मेहनत भरी प्रक्रिया को एक महीने बाद फिर से करना होगा.

ये रोडमैप ग्रेटर चीन के लिए लाइसेंस पाने वाली कंपनी द्वारा तैयार किया गया है. जो कि फाइजर की प्रायोगिक वैक्सीन देने के लिए बहुत बड़ी और चुनौतीपूर्ण लॉजिस्टिक चुनौतियों की एक झलक पेश करता है, जिसने कि अंतिम चरण के परीक्षणों के लिए "असाधारण" शुरुआती परिणाम दिखाए. इसके बाद महामारी की शुरुआत के लगभग एक साल के बाद संभावित अंत की उम्मीद है. अभी तक किसी भी में वैक्सीन को फायजर जैसा नहीं बनाया गया है जिसमें कि RNA तकनीक इस्तेमाल की गई हो. इसके जरिए मानव शरीर को प्रोटीन का उत्पादन होता है जो बाद में सुरक्षात्मक एंटीबॉडी विकसित करता है.

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सिर्फ समृद्ध देशों तक ही रहेगी पहुंच? 
इसका मतलब है कि देशों को वैक्सीन के जीवित रहने के लिए आवश्यक डीप-फ्रीज उत्पादन, भंडारण और परिवहन नेटवर्क बनाना होगा. इसमें बड़े पैमाने पर निवेश और समन्वय की आवश्यकता है, लेकिन इससे ये भी मालूम पड़ता है कि इस तक केवल समृद्ध देशों तक की पहुंच हो सकती है और वह भी सिर्फ उनकी शहरी आबादी तक ही.

मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन से फंड पाने वाले बीजिंग स्थित ग्लोबल हेल्थ ड्रग डिस्कवरी इंस्टीट्यूट के निदेशक डिंग शेंग ने कहा, "इसका उत्पादन महंगा है, इसका घटक अस्थिर है. इसके लिए कोल्ड-चेन परिवहन की भी आवश्यकता होती है और इसकी शेल्फ लाइफ कम होती है."

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फाइजर शॉट को लगाने के खर्च से मौजूदा आशंकाओं को बल मिलेगा कि अमीर देशों को सबसे अच्छा वैक्सीन पहले ही मिल जाएगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा समर्थित प्रयास कोवैक्स के बावजूद जिसके तहत गरीब देशों के लिए वैक्सीन खरीदने के लिए 18 बिलियन डॉलर जुटाने का लक्ष्य है.
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