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कश्मीरी पंडितों के पलायन पर अनुपम खेर ने सुनाई ये भावुक कविता

कश्मीरी पंडितों के पलायन पर अनुपम खेर ने सुनाई ये भावुक कविता

File Photo: Getty Images

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फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने कश्मीरी पंडितों के इसी दर्द पर एक कविता ट्विटर पर शेयर की है। कविता में पंडितों की तस्वीरों के साथ, उनके घरों को भी दिखाया गया है।

    नई दिल्ली। कश्मीरी पंडितों के राज्य से पलायन के आज 27 साल पूरे हो गए हैं। 19 जनवरी 1990 की रात ही कट्टरपंथियों के जुल्म से तंग 4 लाख कश्मीरी पंडितों ने मजबूरी में अपनी जमीन, अपना घर छोड़ा था। फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने कश्मीरी पंडितों के इसी दर्द पर एक कविता ट्विटर पर शेयर की है। कविता में पंडितों की तस्वीरों के साथ, उनके घरों को भी दिखाया गया है।

    अनुपम ने अपने ट्विटर अकाउंट से 'फैलेगा-फैलेगा..हमारा मौन...समुद्र के पानी में नमक की तरह...' नाम की कविता का वीडियो शेयर किया है। यह कविता पंडितों के कहानी को सामने लेकर आती है। कविता की चंद लाइने हैं- '19 जनवरी 1990, 27 साल पहले, जब कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया... दुनिया ने इसे खामोशी से देखा... फैलेगा फैलेगा, हमारा मौन। समुद्र के पानी में नमक की तरह। नसों में दौड़ते रक्त में घुलता हुआ, पहुंचेगा दिलों की धड़कनों के बहुत समीप और बोरी से रिसते आटे सा, देगा हमारा पता...।'

    ठीक 27 साल पहले, आज ही के दिन कश्मीर से पंडितों का विस्थापन शुरू हुआ था। कश्मीरी पंडितों ने अपनी जान और इज्जत बचाने के लिए देश के दूसरे हिस्सों में शरण ली थी। खेर ने अपने भावुक संदेश में बताया है कि कश्मीरी पंडितों के पलायन को मनाया नहीं जाता लेकिन इसे याद किया जाता है। उन्होंने आगे बताया कि 27 जनवरी,1990 की उस रात को कोई भूल नहीं सकता, जब कश्मीरी पंडितों पर यह गाज गिरी थी। लाखों लोग सड़क पर आ गए थे।



    कश्मीरी पंडितों का विस्थापन

    वर्ष 1985 के बाद से कश्मीर पंडितों को कट्टरपंथियों और आतंकवादियों से लगातार धमकियां मिलने लगी थीं। आखिरकार 19 जनवरी 1990 को कट्टरपंथियों ने 4 लाख कश्मीरी पंडितों को उनके घर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। घाटी में कश्मीरी पंडितों के भयानक दिनों की शुरुआत 14 सितंबर 1989 से हुई। 14 सितंबर, 1989 को बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष टिक्कू लाल टपलू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुआ आतंक का दौर समय के साथ और वीभत्स होता चला गया।

    टिक्कू की हत्या के महीने भर बाद ही जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल बट को मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। फिर 13 फरवरी को श्रीनगर के टेलीविजन केंद्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के साथ ही आतंक अपने चरम पर पहुंच गया था। उस दौर के अधिकतर हिंदू नेताओं की हत्या कर दी गई। उसके बाद 300 से अधिक हिंदू-महिलाओँ और पुरुषों की आतंकियों ने हत्या की।

    Tags: Anupam kher

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