समान उत्तराधिकार एवं विरासत कानून के लिए सुप्रीम कोर्ट में डाली गई PIL

सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के अधिकारों को लेकर विरासत कानून बनाए जाने की मांग करते हुए PIL दाखिल की गई है (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के अधिकारों को लेकर विरासत कानून बनाए जाने की मांग करते हुए PIL दाखिल की गई है (फाइल फोटो)

अधिवक्ता (Advoacte) अश्विनी कुमार दुबे के जरिए दायर याचिका में विधि आयोग (Law Commission) को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह उत्तराधिकार और विरासत (Inheritance) के संबंध में विकसित देशों (Developed Countries) के कानूनों और अंतरराष्ट्रीय संधियों (International treaties) का अध्ययन करे.

  • भाषा
  • Last Updated: September 20, 2020, 6:00 PM IST
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नई दिल्ली. उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर उत्तराधिकार एवं विरासत कानून (Inheritance Law) की विसंगितयों को दूर करने एवं सभी नागरिकों (Citizens) के लिए समान कानून बनाने का अनुरोध किया गया है. भाजपा नेता (BJP Leader) अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर याचिका (plea) में कहा गया है कि महिलाओं के लिए न्याय, समानता और गरिमा (Justice, Equality and Dignity) सुनिश्चित करने के वास्ते उत्तराधिकार एवं विरासत कानूनों का लिंग और धर्म (Gender and Religion) के लिहाज से तटस्थ होना जरूरी है. याचिका में आरोप लगाया गया कि केंद्र सरकार (Central Government) ने इस संदर्भ में अब तक कोई कदम नहीं उठाया है.

अधिवक्ता (Advoacte) अश्विनी कुमार दुबे के जरिए दायर याचिका में विधि आयोग (Law Commission) को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह उत्तराधिकार और विरासत (Inheritance) के संबंध में विकसित देशों (Developed Countries) के कानूनों और अंतरराष्ट्रीय संधियों (International treaties) का अध्ययन करे तथा तीन महीने के अंदर सभी नागरिकों के लिए ‘उत्तराधिकार एवं विरासत के समान आधार’ (same bases for inheritance) पर एक रिपोर्ट तैयार करे.

धर्म आधारित व्यक्तिगत कानून महिलाओं की गरिमा के भी खिलाफ
याचिका में कहा गया है, “नागरिकों पर पड़ने वाली चोट काफी व्यापक है क्योंकि उत्तराधिकार और विरासत से संबंधित लिंग आधारित और धर्म आधारित व्यक्तिगत कानून न सिर्फ अनुच्छेद 14-15 के तहत प्रदत्त लैंगिक न्याय और लैंगिंग समानता की संवैधानिक प्रकृति के खिलाफ हैं, बल्कि महिलाओं की गरिमा के भी खिलाफ हैं जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार का महत्वपूर्ण तत्व है.”
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उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने पिछले महीने पैतृक संपत्ति में महिलाओं के हक को लेकर एक फैसला दिया था. इस फैसले में कहा गया था कि पिता की संपत्ति पर बेटियों का जन्म से ही अधिकार है और इस मामले में उन्हें बेटों के समान माना जाए.
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