चीन के शातिर तरीके भारतीय सेना के लिए घातक, इसलिए उसे दिया जाए मुंहतोड़ जवाब

भारत और चीन के सैनिकों में हाल ही में सिक्किम और लद्दाख में सीमा पर झड़पें हुई थीं (सांकेतिक फोटो, PTI)
भारत और चीन के सैनिकों में हाल ही में सिक्किम और लद्दाख में सीमा पर झड़पें हुई थीं (सांकेतिक फोटो, PTI)

चीन (China) हमारे सैनिकों पर समय-समय पर जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) में खरीदी गई भीड़ के जरिये पथराव होते देखता रहा है. जब सैनिकों ने आत्मरक्षा में भी गोलियां चलाईं तो भी उसके खिलाफ FIR दर्ज की गईं.

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लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) पीसी कटोच

इस पर आपको यकीन ही नहीं होगा कि दुनिया में कहीं भी दो विपक्षी सेनाओं के सैनिक आपस में हाथ-पैरों से मारपीट कर रहे होंगे, जबकि ऐसा पिछले कई सालों में हमारे और चीनी सैनिकों (Chinese Borders) के बीच होता रहा है. इस प्रकार से एक-दूसरे को धकियाने और कोहनी मारने की घटनाएं अक्सर राजनीतिक रैलियों में और कई देशों की संसदों (Parliaments) में दुनिया भर में टीवी के जरिये देखी जाती हैं लेकिन निश्चित रूप से ऐसा दो सेनाओं (Armies) के बीच देखने को नहीं मिलता. अगर यह अजीब गतिविधि केवल एक-दूसरे को धकियाने तक सीमित होती, तो इस लेख को लिखने की कोई आवश्यकता नहीं होती. लेकिन चीजें बहुत आगे निकल चुकी हैं.

15 अगस्त, 2017 को पीएलए के सैनिकों ने पैंगोंग सो झील (Pangong Tso Lake) के आसपास के इलाके में हमारी गश्त पर पथराव किया और लोहे की छड़ों से मारपीट की. जिसका एक वीडियो टीवी और सोशल मीडिया (Social Media) पर वायरल हुआ. यह पहली बार था जब PLA ने पथराव किया और वे ऐसा क्यों नहीं करेंगे? चीन हमारे सैनिकों पर समय-समय पर जम्मू-कश्मीर में खरीदी गई भीड़ के जरिये पथराव होते देखता रहा है. यहां तक ​​कि जब सैन्य कर्मियों को चोट आने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने के बाद आत्मरक्षा में सेना ने गोलियां चलाईं तो भी उसके खिलाफ FIR दर्ज की गईं. पाठक कल्पना कर सकते हैं कि चीन या पाकिस्तान में सुरक्षा बलों पर पथराव करने वाले व्यक्तियों का क्या हश्र होता होगा. इजरायल में, एक पत्थरबाज को 20 साल की जेल हो सकती है.



चीन से शूट किया गया था 2017 में वायरस हुआ पत्थरबाजी का वीडियो
टीवी ही कारगिल की लड़ाई को हमारे घरों तक लेकर आया था. इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर होने वाली कुछ झड़पें बड़े पैमाने पर जनता देख सकती है. जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, दोनों पक्ष बार-बार रिपोर्ट भेजने के लिए वीडियो टेपिंग का सहारा लेते हैं. हालांकि पीएलए सैनिकों के साथ अधिक वीडियो कैमरे दिखाई देते हैं. दिलचस्प बात यह है कि पैगोंग सो के निकट 15 अगस्त, 2017 को घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग के एक सघन परीक्षण में यह पता चला था कि इसे चीन की ओर से ऊंचाई से शूट किया गया था.

चीन ने जो हथियार प्रयोग किये वे बेहद खतरनाक
मई 2020 में, पीएलए ने गालवान में घुसपैठ की और आसपास के इलाकों पैंगोंग सो और पूर्वी लद्दाख में डेमचोक और सिक्किम में नकु ला पर भी उंगलियां उठाईं. कई स्थानों पर, वे बड़ी संख्या में आए और कथित तौर पर पत्थरबाजी के अलावा लोहे के भालों और लोहे की छड़ों का इस्तेमाल किया, साथ में पत्थरबाजी भी की. हमारे सैनिकों ने सबसे अच्छा यही किया होता कि पत्थरों से जवाब दिया होता. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रत्येक ओर और किस इलाके में कितने लोग हताहत हुए. यह भी मायने नहीं रखता कि भारतीयों और विदेशियों ने सोशल मीडिया (Social Media) पर वीडियो के विरोध और समर्थन में कैसी प्रतिक्रियाएं दीं - एक पक्ष ने कहा कि अब कोई शारीरिक लड़ाई नहीं हो रही और दूसरा पक्ष यह कहता है कि सैनिक अब भी शारीरिक लड़ाई में नहीं भिड़े हुए हैं लेकिन इन क्लिपों को स्टूडियो में शूट नहीं किया गया है. यह केवल इस बात को दोहराना है कि गैर-घातक हथियारों की तुलना में ज्यादा घातक कई प्रकार के औजार-सह-हथियारों का उपयोग किया है, जो कि गैर-घातक हथियारों के मुकाबले बेहद खतरनाक थे.

चीन ने 1962 के युद्ध में बड़ी संख्या में भर्ती किये थे तिब्बती-उइगर
PLA सैनिक का मन चीन के भीतर चर्चा की वजह रहा है, जिन्हें एक-बच्चे की नीति का नतीजा होने के चलते "कायर" बताया जाता है. एक जवाबी विचार यह है कि आखिरकार उन्होंने 1962 का युद्ध भी जीता था. लेकिन 1962 में, चीन ने 'मानव तरंगों' की रणनीति का इस्तेमाल किया था, हमारी सेना के पास गोला-बारूद खत्म हो गया था, और चीन ने तुलुंग ला, मैगो, पॉसिंगिंग ला के माध्यम से बड़े पैमाने पर सैन्य बलों में घुसपैठ की और न्यूकमाडोंग और सापेर पर रोडब्लॉक लगा दिये, जिससे जवाहरलाल नेहरू के कारण खराब रूप से सुसज्जित भारतीय बल पंगु हो गए. फिर भी, PLA के 2,419 सैनिक मारे गये, जिनमें 722 का आधिकारिक आंकड़ा है और वास्तविक आंकड़े अधिक हो सकते हैं. दिलचस्प बात यह है कि 1962 के आक्रमण के लिए चीन ने बड़ी संख्या में तिब्बतियों और उइगरों की भर्ती की थी.

वियतनाम से लड़ाई के दौरान भी चीन ने उठाया था भारी नुकसान
PLA की असली ताकत 1979 में तब सामने आई, जब वियतनाम को "सबक सिखाने के लिए" चीन ने वहां आक्रमण किया. उस समय तक चीन की एक बच्चे की नीति प्रभाव में आ चुकी थी. यह युद्ध तीन हफ्ते और 6 दिन (17 फरवरी से 16 मार्च) तक चला. वियतनाम के मुताबिक चीन के 62500 सैनिक मारे गए, 550 मिलिट्री वाहनों और 115 तोपों का उसे नुकसान उठाना पड़ा. नैसर्गिक तौर पर चीन इन आंकड़ों से इनकार करता है. लेकिन चीन के वियतनाम से बाहर निकलने के बाद भी वियतनाम ने कंबोडिया पर 1989 तक अपना कब्जा जारी रखा. चीन और वियतनाम के बीच 1990 तक बॉर्डर पर झड़पें होती रहीं.

(नोट : पूरा लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें)

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