Exclusive: राजन बोले- PNB फ्रॉड में RBI पर कई आरोप, नियम के दायरे में थी गोल्ड इम्पोर्ट स्कीम

CNBC-TV18 से बात करते हुए रघुराम राजन ने बताया, "किसी भी पॉलिसी का कोई न कोई असर जरूर होता है. पीएनबी फ्रॉड को लेकर भी तमाम तरह के आरोप लग रहे हैं. कई जगह चूक हुई है."

News18Hindi
Updated: March 14, 2018, 7:25 AM IST
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पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में हुए 13, 500 करोड़ के स्कैम की सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की जांच जारी है. इस फ्रॉड को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के कामकाज और 80:20 गोल्ड इम्पोर्ट स्कीम पर भी सवाल उठे हैं. घोटाले के बाद केंद्रीय बैंक पर लग रहे सभी आरोपों को आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने खारिज किया है. 2013 से 2016 तक आरबीआई के गवर्नर रहे रघुराम राजन ने 2014 में लॉन्च हुई 'गोल्ड इम्पोर्ट स्कीम' को भी सही और नियम के दायरे के तहत बताया.

इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के 26 जुलाई, 2014 को रघुराम राजन के नाम लिखे गए एक लेटर के सामने आने के बाद यह मामला उजागर हुआ है. इस लेटर में IBJA ने पिछली संयुक्त प्रगतिशील सरकार (यूपीए) पर आरोप लगाया है कि कुछ गिने-चुने लोगों और कंपनियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से इस सरकार गोल्ड इम्पोर्ट पॉलिसी में बदलाव किए थे.

CNBC-TV18 से बात करते हुए रघुराम राजन ने बताया, "किसी भी पॉलिसी का कोई न कोई असर जरूर होता है. यह असर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकता है. पीएनबी फ्रॉड को लेकर भी तमाम तरह के आरोप लग रहे हैं. कई जगह चूक हुई है."


उन्होंने कहा, "हमें यह भी जानना चाहिए कि पीएनबी के बोर्ड मेंबर्स को किसने अप्वॉइंट किया था, जिसने घोटाले होने की मंजूरी दी. हमें सार्वजनिक बैंकों के कामकाज और नियमन में सुधार को लेकर गंभीरता से सोचने की जरूरत है.

राजन ने यह भी कहा, "अगर आरबीआई को थोड़ा सा भी अंदाजा होता कि पीएनबी में उस वक्त क्या चल रहा था, तो इसे रोकने के लिए आरबीआई अपने स्तर पर वो सारी चीजें करती, जो वो कर सकती थी. यह पीएनबी फ्रॉड आरबीआई की नॉलेज के बाहर था."


आरबीआई के पू्र्व गवर्नर ने कहा, "जहां तक 80:20 गोल्ड स्कीम की बात है, तो यह स्कीम गोल्ड सप्लाई की कमी का सामना करने के लिए लाई गई थी, ताकि इंडियन ज्वेलरी सेक्टर में जॉब के मौके लाई जा सके." राजन ने कहा 2014 में सरकार रुपये को मजबूत बनाने के लिए सोने के आयात निषेध (इम्पोर्ट रेस्ट्रिकशन) पर रियायत देना चाहती थी. इसके लिए केंद्रीय बैंक ने '80:20 गोल्ड इम्पोर्ट स्कीम' लागू किया. इस तरह निवेशकों को कुछ शर्तों के साथ सोनों के आयात की दोबारा से अनुमति दी गई.

इस लेटर में IBJA ने कहा, " 21 मई 2014 में आरबीआई के एक सर्कुलर में लिखा है, "साल 2014 राष्ट्रीयकृत बैंकों के पक्ष में है, जो देश की बुलियन इम्पोर्टिंग एंड ज्वैलर्स एक्पोर्टिंग (IBJA) मेंबर के बैकबोन की तरह काम करेंगे. ये बैंक कुछ चुनिंदा प्राइवेट सेक्टर एक्सपोर्ट हाउसों को एक बार में दो टन सोना आयात करने की अनुमति देंगे. इस लिस्ट में वो हाउस भी शामिल थे, जो बुलियन और गोल्ड ज्वेलरी में बिजनेस नहीं करते थे.

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रघुराम राजन ने पीएनबी स्कैम को अपने नाम से फर्जी बयान और टिप्पणी चलाने पर सोशल मीडिया पर भी हमला बोला. सोशल मीडिया पर चल रही कुछ खबरों में दावा किया गया था कि रघुराम राजन ने पीएनबी में वित्तीय अनियमितता और नीरव मोदी को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को चेतावनी दी थी. राजन ने कहा, "मेरे बारे में बकवास बातें कहना और लिखना सोशल मीडिया की आदत बन चुकी है."

पढ़ें, रघुराम राजन से हुई बातचीत के प्रमुख अंश...

सबसे पहले हम फ्रॉड से शुरू करना होगा, क्योंकि यह वजह है, जिसके लिए हम आपसे ये सब सवाल पूछ रहे हैं. इस फ्रॉड में आखिर इसमें गलती किसकी है? इसमें किसकी गलती है? बैंक के मालिक की, ऑडिटर की, रेगुलेटर की या फिर मैनेजमेंट की?

कई सारे आरोप हैं, लेकिन सबसे पहले ये जानने की जरूरत है कि आखिर ये फ्रॉड क्यों हुआ और किस सिस्टम में कमी थी. इसके अलावा दूसरी चीज़े भी हैं. मुझे पूरा भरोसा है कि इन सभी बिंदुओं पर जांच होगी. लेकिन, आखिर ये 'लेटर्स ऑफ अंडरटेकिंग' (LoU) क्यों दी गई? आखिर बैंकिग सिस्टम में इनको रिकॉर्ड क्यों नहीं किया गया? क्या मैनेजमेंट ने इसे नोटिस किया? क्या इसे बोर्ड के सामने रखा गया? इसके बाद क्या ऑडिटर्स ने इस बात को आगे उठाया? अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो क्यों नहीं किया? क्योंकि, ऑडिटर्स इसके लिए एक ब्रांच से दूसरी ब्रांच तक जाते हैं और उसके बाद क्या टाइम पर रेगुलेटर्स के आदेशों का पालन किया गया? अगर नहीं किया गया, तो क्यों? जाहिर सी बात है कि इस केस में मालिक, सरकार जिन्होंने बोर्ड के सदस्यों को चुना और साथ ही मैनेजमेंट इस पूरे मामले में उनकी क्या भूमिका है. मेरे हिसाब से हर पहलू की जांच होनी चाहिए.

फ्रॉड्स के मामले में मेरी सबसे बड़ी चिंता ये है, जब मैं आरबीआई में था, हम खोदकर खामियां निकाल लेते थे. लेकिन, हमने कभी किसी दोषी को उजागर नहीं किया. फिर हमने ऐसा क्या किया? पहले हम सभी लोगों को एकजुट करते थे, ताकि मामले की अच्छे से जांच-पड़ताल हो सके और इसकी तह तक पहुंचा जा सके. उसके बाद हम फ्रॉड्स की लिस्ट प्रधानमंत्री के दफ्तर में भेज देते थे, ताकि उनपर एक्शन लिया जा सके. इस तरह की चीज़ें है, जिन्हें हमें टटोलने की जरूरत है.

जब आप गवर्नर थे, तब आपने बहुत सी LoU’s साइन किए थे और उनका इस्तेमाल लैटर्स ऑफ क्रेडिट के लिए भी करते थे. गवर्नर रहते हुए 3 अगस्त 2016 को आपने सभी बैंकों को स्विफ्ट सिस्टम की बारीकी से पड़ताल करने को कहा था. ऐसा लगता है, जैसे आपको पहले से ही अंदाजा था कि कोर बैकिंग के स्विफ्ट कनेक्शन से आगे चलकर परेशानी आ सकती है. क्या सुपरवाइज़र को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि उन्होंने अपने निर्देशों का पालन सख्ती से नहीं करवाया?

आरोप लगाने से पहले हमें ये जानना चाहिए कि आखिर क्या हुआ और क्यों हुआ? कई बैकिंग सिस्टम में ऐसे तरीके है जिससे आप सिस्टम को जान सकते हैं. हमें समझने की जरूरत है कि कब ये रास्ता निकाला जाए. उदाहरण के तौर पर स्विफ्ट सिस्टम के साथ बांग्लादेश के बैंक में गड़बड़ी आई जिसे खोजा गया. जब गड़बड़ी का पता लगा लिया जाए, तो ज़रूरी है कि रेगुलेटर्स सभी बैंक को यह मैसेज भेजे कि गड़बडी का पता चल गया है और अब इसे अपने सिस्टम में दुरुस्त कीजिए. ज़ाहिर है इसके बाद रेगुलेटर ये मान लेता है कि बैंक ने गड़बड़ी को अपने सिस्टम में सुधार लिया होगा. अगर बैंक ने ऐसा नहीं किया, तो हमें समझना चाहिए कि बैंक ने आखिर ऐसा क्यों नहीं किया. मेरा मतलब है कि जब बैकों को गड़बड़ियां सुधारने के लिए कहा गया, तो उन्होंने उसे सुधारा क्यों नहीं. मैं समझता हूं कि उन्हें आरबीआई से भी रिमाइंडर्स आएं होंगे, लेकिन हमें यही समझना है कि आखिर उनका पालन क्यों नहीं किया गया. तो इस तरह से इस मामले में सीखने के लिए बहुत कुछ है. लेकिन साथ ही इस मामले में निश्चित तौर पर कई सारी जिम्मेदारियां फैलाने की जरूरत है.

एक ताज़ी ख़बर के मुताबिक, रिजर्व बैंक ने LoUs पर रोक लगा दी है. इस पर आप क्या सोचते हैं?

मैं वर्तमान नीतियों पर अपनी राय नहीं रख सकता, मुझे भरोसा है कि उन्होंने इस पूरे मसले को देखा होगा. भारत में मुझे एक बात की चिंता है कि यहां कभी-कभी गारंटी को बहुत लापरवाही से लिया जाता है. चाहे बैंक की दी गई गारंटी हो या सरकार की दी हुई गारंटी. हम सोचते हैं कि ये असली नहीं है जब तक उस कंपनी जिन्होंने उनपर भरोसा जताया था, वो उन्हें न बुलाए. हमें समझने की जरूरत है कि ये बिल्कुल लोन देने जैसा है, क्योंकि जब लोन नहीं चुकाया जाता, तभी किसी को बुलाया जाता है. दरअसल, ये इक्विटी प्रोवाइट करने जैसा है. सरकार और बैंक के बैलेंस शीट में कई सारी आकस्मिक देयताएं हैं. ज़रूरी है कि हम इसे स्वीकार करें.

आप आरोप मढ़ने की बात कर रहे हैं और सरकार ने 80:20 स्कीम जिसने लोगों को पैसे बनाने का मौका दिया, जैसे मुद्दे को उठाया है. इसपर आपकी क्या राय है? आपने सुना ही होगा कि सरकार ने इस मुद्दे पर क्या कहा?

जहां तक मैं समझ पा रहा हूं पीएनबी स्कैम 2011 में शुरु हुआ और 2018 में इसका पता चला. गोल्ड स्कीम मद्दे को इस वक्त उठाना (जो मई 2014 से नवंबर 2014 के बीच हुआ). ऐसा उचित नहीं है. उस समय हुए इस मुद्दे पर मुझे बहस करना मुश्किल लगता है. वैसे इस मुद्दे पर ज्यादा बातचीत से मुझे खुशी होती, लेकिन अगर ये मुद्दा इस स्कैम से संबंधित होता या फिर ये स्कैम किसी गोल्ड से जुड़ी इंडस्ट्री में होता, तो इस मुद्दे की चर्चा होना सही था. इन दोनों मुद्दों को अलग-अलग सुलझाने की जरूरत है. 80:20 गोल्ड स्कीम पर बातचीत से मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है, क्योंकि जहां तक मैं समझता हूं इसपर लिए गए एक्शन न्यायोचित है, लेकिन मुझे लगता है कि इसे पीएनबी स्कैम से अलग रखना जरूरी है.

लोग इन मुद्दों को मिला देते है. मेन मुद्दे पर फोकस करने के बजाए ऐसा लगता है कि पब्लिक की दिलचस्पी को डायवर्ट किया जा रहा है. आखिर हमारे बैकिंग सिस्टम में इतने लीकेज क्यों हैं. आखिर हम इन लीकेज को कैसे दुरुस्त कर सकते है जबकि री-कैप्टलाइज़ेशन की वजह भारी मात्रा में न्यू मनी बैंकिंग सिस्टम में आ रही है.

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