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PM मोदी का ब्लॉग: हमारे पास गांधी के सपनों का भारत बनाने का मौका

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आज भारतीयों के पास स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने का सौभाग्य नहीं है. हम देश के लिए मर नहीं सकते हैं लेकिन हमें देश के लिए जीना चाहिए और वह सब करना चाहिए जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की कल्पना को साकार कर सके.

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देश राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मना रहा है. इस मौके पर देशभर में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है. महात्मा गांधी के जीवन आदर्शों से सीख लेने की प्रेरणा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखे गए एक ब्लॉग लिखा है.

इसमें पीएम मोदी ने लिखा है, "हम आज से अपने प्रिय बापू के 150वें जन्मदिवस के समारोह की शुरुआत कर रहे हैं. दुनियाभर के लाखों लोग जो बराबरी, गरिमापूर्ण, समावेशी और सशक्त जीवन तलाश रहे हैं उनके लिए बापू आज भी आशा के प्रकाश स्तंभ बने हुए हैं."

महात्मा गांधी को भारत को जोड़ने का श्रेय जाता है. जैसा कि सरदार पटेल ने कहा था, "भारत विविधता की भूमि है. अगर कोई ऐसा व्यक्ति था जो सभी को साथ लेकर आया, जिसने उपनिवेशवाद से लड़ने के लिए और दुनिया में भारत का मान बढ़ाने के लिए लोगों को मतभेदों से ऊपर उठने के लिए प्रेरित किया तो वह महात्मा गांधी थे. 21वीं सदी में महात्मा गांधी के विचार उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि उनके वक्त में थे. दुनिया में जब आतंकवाद, कट्टरपंथ, चरमपंथ और पागलपन लोगों और समाज को बांट रहा है तब उनके शांति और अहिंसा के विचारों में मानवता को एकजुट करने की शक्ति है.



ऐसे समय में जब असमानता असमान्य नहीं है, समान और समावेशी विकास के लिए बापू का जोर लाखों लोगों के लिए समृद्धि का युग हो सकता है. ऐसे युग में जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण प्रदूषण चर्चा के केंद्र में है तो दुनिया महात्मा गांधी के विचारों से सीख ले सकती है. 1909 में एक शताब्दी पहले ही उन्होंने मानव की इच्छाओं और उसके लालच के बीच के फर्क को रेखांकित किया था. उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग संयम और करुणा के साथ करने का संदेश दिया था और खुद इसके लिए उदाहरण भी पेश किया था. साफ-सुथरा वातावरण सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने अपने शौचालयों को खुद साफ किया. जब वह अहमदाबाद में थे तो उन्होने पानी की कम से कम बर्बादी का निर्णय लिया. अशुद्ध पानी साबरमती में न मिल जाए इसे सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने काफी सावधानी बरती.
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कुछ वक्त पहले एक दस्तावेज ने मेरा ध्यान खींचा. 1941 में बापू ने 'रचनात्मक कार्य: इसका अर्थ एवं स्थान' की रचना की थी जिसे 1945 में उस वक्त संशोधित किया गया था जब स्वतंत्रता आंदोलन के लेकर उत्साह था. इस दस्तावेज में बापू ने ग्रामीण विकास, कृषि को मजबूत करने, स्वच्छता में वृद्धि, खादी को बढ़ावा देने, महिलाओं के सशक्तिकरण, अन्य मुद्दों के बीच आर्थिक समानता के बारे में बात की है.


मैं अपने साथी भारतीयों से निवेदन करूंगा कि वे गांधीजी के इस दस्तावेज को देखें और एक पथ-प्रदर्शिका बनाएं कि हम गांधीजी के सपनों का भारत कैसे बना सकते हैं. इनमें से आज भी कई विषय प्रासंगिक हैं और बापू ने जिन मुद्दों को सात दशक पहले उठाया भारत सरकार उनपर काम कर रही है, लेकिन वे अभी पूरे नहीं हुए हैं.

गांधीजी के व्यक्तित्व के सबसे खूबसूरत पहलुओं में से एक यह था कि वह हर भारतीय को महसूस कराते थे कि वह आजादी के लिए काम कर रहा है. उन्होंने आत्मविश्वास की भावना को जन्म दिया कि एक शिक्षक, वकील, डॉक्टर, किसान, मजदूर, उद्यमी हर कोई भारत के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दे रहा था. उसी तरह आज उन कार्यों को किए जाने की जरूरत है जो गांधीजी के दृष्टि को पूरा करेंगे. यह साधारण बातों जैसे कि खाना बर्बाद न करना, अहिंसा और एकता के तौर पर भी शुरू किया जा सकता है.

आइए हम सोचें कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्वच्छ पर्यावरण के लिए हमारे कार्य कैसे योगदान दे सकते हैं. लगभग आठ दशक पहले जब प्रदूषण के खतरे उतने ज्यादा नहीं थे तब गांधीजी ने साइकिल चलाना शुरू कर दिया था क्या आज हम उनसे सीख ले सकते हैं?

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त्यौहारों का मौसम आ चुका है और पूरे भारत में लोग नए कपड़े, उपहार, भोजन की वस्तुए और अन्य वस्तुओं की खरीददारी करेंगे. ऐसा करने के दौरान गांधीजी के विचारों को याद रख लें. आइए हम सोचें कि हमारे कार्य कैसे हमारे साथी भारतीयों के जीवन में समृद्धि का प्रकाश डाल सकते हैं. वे जो बनाते हैं उसे खरीदकर, चाहे यह खादी उत्पाद हो या फिर खाद्य पदार्थ.  हो सकता है कि हमने उन्हें न देखा हो और पूरे जीवन हम ऐसा कर भी न पाएं लेकिन बापू को इस बात के लिए हमपर गर्व होगा कि हम भारतीयों की मदद कर रहे हैं.

पिछले चार सालों में 130 करोड़ भारतीयों ने स्वच्छ भारत मिशन के रूप में महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की है. यह अभियान आज चार साल पूरे कर रहा है, यह सराहनीय परिणामों के साथ एक जीवंत जन आंदोलन के रूप में उभरा है. 85 मिलियन से अधिक परिवारों की पहली बार शौचालयों तक पहुंच बनी है. 400 मिलियन से अधिक भारतीय अब शौच के लिए खुले में नहीं जाते हैं. मात्र 4 साल की अवधि में ही स्वच्छता का विस्तार 39% से 95% तक हो गया है. इक्सीस राज्य, केंद्रशासित प्रदेश और 4.5 लाख गांव अब खुले में शौच से मुक्त हैं.

आज भारतीयों के पास स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने का सौभाग्य नहीं है. हम देश के लिए मर नहीं सकते हैं लेकिन हमें देश के लिए जीना चाहिए और वह सब करना चाहिए जो हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की कल्पना को साकार कर सके. आज हमारे पास बापू के सपनों को सच करने का बड़ा अवसर है. हमने जमीन पर काफी कार्य किया है और मुझे विश्वास है कि आने वाले वक्त में हम इसका और अधिक विस्तार करेंगे.

'वैष्णव जान टू तेन कहिये जे, पीर परयी जैन रे' बापू के प्रिय भजनों में से एक था, जिसका अर्थ है कि अच्छा व्यक्ति वह है जो दूसरे के दर्द को महसूस करता है. इसी भावना से उन्होंने अपना जीवन दूसरों के लिए जिया. आज हम 1.3 बिलियन भारतीय बापू के सपनों को साकार करने के लिए प्रतिबध हैं जो उन्होंने देश के लिए देखे थे जिसके लिए उन्होंने अपना बलिदान दिया था.

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