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साड़ी का पल्लू बायें कंधे पर क्यों, विश्व भारती के शताब्दी समारोह में पीएम ने किया ज्ञाननंदिनी देवी का जिक्र

विश्व भारती यूनिवर्सिटी के शताब्दी समारोह को संबोधित करते पीएम मोदी
विश्व भारती यूनिवर्सिटी के शताब्दी समारोह को संबोधित करते पीएम मोदी

पश्चिम बंगाल (West Bengal) के शांतिनिकेतन स्थित विश्व भारती विश्वविद्यालय (Vishwa Bharti University) के शताब्दी समारोह को वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इसी विश्वविद्यालय से निकला संदेश आज पूरे विश्व तक पहुंच रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 24, 2020, 3:30 PM IST
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नई दिल्ली/कोलकाता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने गुरुवार को विश्व भारती विश्वविद्यालय  (Vishwa Bharti University)  के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित शताब्दी समारोह को संबोधित किया. इस दौरान पीएम ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के दृष्टिकोण का सार बताया और कहा कि यह विश्व कल्याण के लिए भारत के कल्याण और उसे सशक्त करने के साथ विश्व में समृद्धि लाने का भी मार्ग है.

संबोधन में पीएम ने गुजरात और रवींद्र नाथ टैगोर के कनेक्शन पर भी बात की. पीएम ने कहा कि गुरुदेव ने कई कविताएं और कुछ कविताओं के अंश गुजरात प्रवास के दौरान लिखी. प्रधानमंत्री ने संबोधन में दावा किया कि बायें कंधे पर पल्लू रखने का चलन ज्ञाननंदिनी देवी ने शुरू किया था. ज्ञान नंदिनी देवी टैगोर परिवार की बहू थीं.

दो लोकप्रिय बांग्ला कविताएं भी गुजरात में लिखीं
पीएम मोदी ने बताया, 'गुरुदेव के बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर जब आईसीएस थे, तो उनकी नियुक्ति गुजरात में भी हुई. रवींद्रनाथ टैगोर अक्सर गुजरात जाते थे. वहां उन्होंने लंबा समय बिताया.' उन्होंने कहा कि अहमदाबाद में रहते हुए गुरुदेव ने दो लोकप्रिय बांग्ला कविताएं भी लिखी थीं. अपनी रचना 'क्षुधित पाषाण' का एक हिस्सा उन्होंने गुजरात प्रवास के दौरान लिखा.
पीएम ने कहा, 'गुजरात की एक बेटी गुरुदेव के घर पर बहू बनकर आईं. एक और तथ्य है जिस पर हमारे महिला सशक्तीकरण के संगठनों को अध्ययन करना चाहिए.' बायें कंधे पर साड़ी के पल्लू के चलन के बारे में पीएम मोदी ने दावा किया, 'सत्येंद्र नाथ टैगोर जी की पत्नी ज्ञाननंदिनी देवी जी जब अहमदाबाद में रहती थीं तो उन्होंने देखा कि वहां की महिलाएं साड़ी के पल्लू को दायें कंधे पर रखती थीं. दायें कंधे पर पल्लू से महिलाओं को काम करने में भी दिक्कत होती थी.'



उन्होंने दावा किया कि यह देखकर ज्ञाननंदिनी देवी ने आइडिया निकाला कि क्यों ना साड़ी के पल्लू को बायें कंधे पर रखा जाए. मुझे ठीक-ठीक तो याद नहीं लेकिन कहते हैं कि बायें कंधे पर साड़ी के पल्लू का चलन उन्हीं की वजह से शुरू हुआ.

ज्ञाननंदिनी टैगोर एक समाज सुधारक थीं जिन्होंने विभिन्न सांस्कृतिक नवाचारों की अगुआई की और 19वीं सदी के बंगाल में महिला सशक्तीकरण के शुरुआती चरण का प्रभावशाली हिस्सा रहीं. उनका विवाह सत्येंद्रनाथ टैगोर से हुआ था.
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