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अपनी ही कंपनी IRCTC को दिवालिया बना रही है रेलवे की नीतियां

Chandan Kumar | News18Hindi
Updated: April 26, 2018, 8:12 PM IST
अपनी ही कंपनी IRCTC को दिवालिया बना रही है रेलवे की नीतियां
आईआरसीटीसी

वित्त मंत्रालय और भारतीय रेलवे के नीतियों के कारण आईआरसीटीसी को हर साल करीब 500 करोड़ रूपये का नुकसान हो रहा है

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  • Last Updated: April 26, 2018, 8:12 PM IST
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रेल मंत्रालय अपने यात्रियों की जेब काटने का कोई तरीका नहीं छोड़ना चाहती, लेकिन उसकी नीति आईआरसीटीसी को बदहाल कर चुकी है. यात्रा करने की बात तो छोड़ दें, रेलवे में यात्रा रद्द करना भी यात्रियों की जेब पर भारी पड़ता है. नवंबर 2015 से टिकट कैंसिलेशन लोगों के लिए मुसीबत बना हुआ है और रेलवे इससे हर साल करीब 8000 करोड़ रूपये की कमाई करता है. इसके अलावा रेलवे हर साल 1000 करोड़ से ज्यादा की कमाई उन यात्रियों से करता है जो यात्रा नहीं कर पाते हैं और मुश्किल नियमों के कारण समय पर अपना टिकट कैंसिल नहीं करा पाते हैं. वहीं दूसरी तरफ रेलवे और वित्त मंत्रालय की नीति फिलहाल अपनी ही कंपनी आईआरसीटीसी को दिवालिया बना रही है.

आईआरसीटीसी आज भी नवंबर 2016 की नोटबंदी और डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के वित्त मंत्रालय के तरीके का मातम मना रही है. हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि आईआरसीटीसी बदहाली की कगार पर पहुंच गया है. दरअसल आईआरसीटीसी ऑनलाइन बुकिंग पर सुविधा शुल्क के रूप में यात्रियों से सर्विस चार्ज वसूलता था जिसमें उसे स्लीपर क्लास पर 20 और एसी क्लास पर 40 रुपये की कमाई होती थी. लेकिन नोटबंदी के बाद से वित्त मंत्रालय ने इसपर रोक लगा दी है. इस तरह से आईआरसीटीसी को हर साल करीब 500 करोड़ का नुकसान हो रहा है. यही नहीं ऑनलाइन टिकट बुक कराने पर यात्रियों को 10 लाख रुपये तक की बीमा भी दी जाती है. पहले इसके लिए यात्रियों से 92 पैसे का चार्ज लिया जाता था. लेकिन वित्त मंत्रालय ने इसे फ्री कर दिया है.

आईआरसीटीसी की ऑनलाइन बुकिंग से हर रोज औसतन करीब 7 लाख लोग टिकट बुक कराते हैं. ऐसे में कन्फर्म टिकटों पर मिलने वाले 92 पैसे के नुकसान की वजह से भी उसे हर रोज करीब 3 लाख रुपये का नुकसान हो रहा है. ये हालत तब है जब कि ऑनलाइन कैंसिलेशन पर भी रेलवे की तरफ से मोटी रकम सर्विस चार्ज या क्लेरिकल चार्ज के रूप में काटी जाती है. ट्रेन रवाना होते के 48 घंटे पहले टिकट कैंसिल कराने पर स्लीपर क्लास के हर यात्रि को 60 रुपये और एसी क्लास के यात्रि को 65 रुपये चार्ज देना पड़ता है. यह कमाई करीब 1200 करोड़ रुपये की है जो सीधे मंत्रालय के खाते में जाती है. यानि रेलवे अपना फायदा कहीं भी छोड़ने को तैयार नहीं है लेकिन आईआरसीटीसी को सालाना हुए 500 करोड़ से ज़्यादा के नुकसान के बदले उसे वित्त मंत्रालय से महज 80 करोड़ रुपये मिले.

इस बदहाली का असर अब आईआरसीटीसी के कामकाज पर भी दिख रहा है. वो नोएडा में मौजूद अपने सेंट्रल किचन को बंद करने की तैयारी कर चुका है. इस किचन में राजधानी एक्सप्रेस सहित कई ट्रेनों के लिए खान-पान तैयार किया जाता है. इसके अलावा 2016 की रेलवे ने नई खानपान नीति के तहत आईआरसीटीसी को 247 बेस किचन सौंपे हैं. लेकिन वो अब तक केवल 16 बेस किचन को तैयार कर पाया है. आईआरसीटीसी की स्थापना 1999 में की गई थी इसे 2010 में बड़ा झटका उस वक्त लगा था जब उस वक्त की रेलमंत्री ममता बनर्जी ने आईआरसीटीसी से खान-पान सेवा छीन ली थी. हालांकि रेलवे के पास संसाधनों की कमी की वजह से मूल से यह काम आईआरसीटीसी ही कर रही थी. लेकिन मौजूदा समय में कमाई का मूल रास्ता छिन जाने पर यह कंपनी बदहाली की कगार पर है. ​

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First published: April 26, 2018, 7:03 PM IST
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