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लॉकडाउन खुलने के बाद बंगाल में फिर राजनीतिक हत्याओं का दौर शुरू, अब तक 12 नेताओं की हुई हत्या

अभिषेक बनर्जी ने अधिकारी पर 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के साथ 'विश्वासघात' करने और इसे 'अंदरूनी तौर पर नुकसान पहुंचाने' का आरोप लगाया.

अभिषेक बनर्जी ने अधिकारी पर 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के साथ 'विश्वासघात' करने और इसे 'अंदरूनी तौर पर नुकसान पहुंचाने' का आरोप लगाया.

कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण लगाए गए लॉकडाउन को खोलने की चरणबद्ध प्रक्रिया के बीच पश्चिम बंगाल (West Bengal) में राजनीतिक हत्याओं का दौर फिर से शुरू हो गया है. जून से लेकर सितंबर तक यहां करीब 12 लोग मारे जा चुके हैं जिसमें एक विधायक भी शामिल हैं.

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    कोलकाता. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव (West Bengal Elections) में आठ महीने बचे हैं. इससे पहले वहां हो रही राजनीतिक हिंसा (Politica Violence) ने लोगों के भीतर एक भय भर दिया है. कोरोना वायरस के चलते लागू लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से खोलने (Unlock India) की प्रकिया जैसे-जैसे अमल में लाई जा रही है, वैसे ही राज्य में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा और हत्या का मामला बढ़ता जा रहा है.

    यहां 1 जून से शुरू हुई अनलॉकिंग की प्रक्रिया के बाद से कम से कम 12 राजनीतिक कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी के 6, तृणमूल कांग्रेस के 5 और सोशल यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया का एक सदस्य शामिल है. इसके साथ ही 10 जून को एक विधायक और तीन बीजेपी कार्यकर्ता फांसी से लटके हुए पाए गए थे. वहीं टीएमसी कार्यकर्ता गौतम दास की बर्धवान में पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी.

    इस साल जून से सिंतबर की समयावधि में स्थानीय भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच राज्य भर में दो दर्जन स्थानों पर हिंसा हुई. 14 सितंबर को, भाजपा कार्यकर्ता संबरू बर्मन को कूच बिहार में उनके घर के पास सड़क पर पाया गया. इस दौरान उन्हें काफी चोट लगी थी. स्थानीय अस्पताल में ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. पुलिस ने कहा कि यह एक 'अप्राकृतिक मौत का मामला' था.

    सभी हत्याएं राजनीतिक नहीं- TMC
    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के लोकसभा सांसद सौगत रे ने कहा कि 'सभी हत्याएं राजनीतिक नहीं थी. उन्होंने कहा कि 'दो समूहों के बीच स्थानीय मुद्दों पर लड़ाई हुई और दुर्भाग्य से किसी की मृत्यु हो गई.साल 2011 से पहले सीपीएम शासनकाल जैसे हालत नहीं है जहां हत्याओं के लिए कोई प्लान बनाया जा रहा हो. बीजेपी नेता भड़काऊ बयान दे रहे हैं, उनके पास बंगाल में न तो कार्यकर्ता हैं और न ही उनका कोई जन आधार है.'

    दूसरी ओर बंगाल भाजपा के केंद्रीय पर्यवेक्षक कैलाश विजयवर्गीय ने टीएमसी पर चुनाव से पहले 'आतंक और भय फैलाने की साजिश' का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि 'हत्याएं और हिंसा उसी का हिस्सा हैं. कुछ टीएमसी कार्यकर्ताओं की मौत उनके गुटीय संघर्ष के कारण हुई है. हम जवाब देने में सक्षम हैं, लेकिन एक जिम्मेदार पार्टी के रूप में हमने अपने कार्यकर्ताओं को शांत रहने के लिए कहा है.'

    राज्यपाल ने भी उठाए थे सवाल
    गौरतलब है कि राज्य में बढ़ रही राजनीतिक हिंसाओं के बीच राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने सोमवार को दावा किया था कि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने राज्य को ‘पुलिस शासित राज्य’ में बदल दिया है और सत्ता द्वारा उनके पद की लंबे समय से अनदेखी की जा रही है जिसके कारण उन्हें संविधान के अनुच्छेद 154 पर विचार करना होगा.

    संविधान के अनुच्छेद 154 में उल्लेख है कि राज्य के कार्यकारी अधिकार राज्यपाल में निहित होंगे और वह प्रत्यक्ष रूप से या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से उन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकेंगे. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार राज्यपाल ने कहा था, ‘राज्य में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गयी है. माओवादी उग्रवाद अपना सिर उठा रहा है. इस राज्य से आतंकी मॉड्यूल भी गतिविधियां चला रहे हैं.'

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