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आलू की खेती करके कम लागत में कैसे कमाएं ज्यादा फायदा, जानिए इससे जुड़ी हर बात

अगर आलू की खेती सही तरीके से की जाए तो सालाना लाखों रुपए कमाया जा सकता है.
अगर आलू की खेती सही तरीके से की जाए तो सालाना लाखों रुपए कमाया जा सकता है.

आलू की खेती (Potato Farming) करके कई किसान लाखों रुपए कमा रहे हैं. ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कैसे कम लागत में मुनाफेवाली (Profitable Farming) आलू की खेती कर सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 27, 2021, 12:11 PM IST
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देश के कई हिस्सों में आलू की खेती होती है, लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के समीप स्थित गंजबासोदा के कुरावद गांव की बात ही कुछ और है. आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इस छोटे से गांव में पैदा हुए आलू का निर्यात महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, बेंगलुरु, तमिलनाडु, आंध्र, छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में होता है. गांव के ज्यादातर लोग पुखराज किस्म के आलू की खेती करते हैं और इसकी पैदावार प्रति बीघा 120 क्विंटल तक होती है. हालांकि, इस गांव में आलू की शतलज, 3797, 166 सहित कई किस्में भी बोई जाती हैं, जिनकी पैदावार भी बेहतरीन होती है. इस खेती में यहां के किसानों से सालों से लगे हैं और काफी मुनाफा भी कमाते हैं. कई किसान तो करोड़ों कमाते हैं.

ऐसे में इस तरह की खेती के साथ आप भी हर साल कम लागत में लाखों रुपए कमा सकते हैं. लेकिन उसके लिए सही मिट्टी और बोने का तरीका पता होना चाहिए. आपको बता दें कि भारत में तमिलनाडु और केरल को छोड़ दें तो आलू की खेती हर राज्य में होती है, जिसका औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. हालांकि, इतनी खेती होने के बावजूद यह दुनियाभर में होने वाले आलू के औसत पैदावार से काफी कम है. अगर आप भी इस खेती में किस्मत आजमाते हैं तो हर साल लाखों कमा सकते हैं, लेकिन इसके लिए आपको मूलभूत बातों के बारे में जानना जरूरी है.

कैसी मिट्टी में पैदा होते हैं आलू?
यूं तो आलू को किसी मिट्टी (क्षारिय के अलावा) में बो सकते हैं, लेकिन इसके सबसे बेहतरीन बलुई-दोमट मिट्टी है. इसके अलावा ऐसी भूमि का चयन करना होगा, जहां पर पानी निकासी की सुविधा हो. साथ ही अच्छी पैदावार के लिए रोगमुक्त बीजों की भी आवश्यकता होती है. वहीं, समय-समय पर कीटनाशक और खाद-उर्वरक का प्रयोग भी जरूरी है. इससे पौधे पर कीड़े नहीं लगते हैं और आलू के पौधे भी काफी उन्नत होते हैं.
बोने का सही तरीका


आलू की फसल बोते समय उनके बीच की दूरी का हमेशा ध्यान रखें, इससे पौधों को रोशनी, पानी और पोषक तत्व आसानी से मिलते हैं. जानकारों के मुताबिक, आलू की क्यारियों के बीच की दूरी कम से कम 50 सेंटीमीटर तो दो पौधों के बीच की दूरी 20-25 सेंटीमीटर होना चाहिए. अगर आप इससे कम दूरी रखते हैं तो आलू के साइज छोटे होंगे और ज्यादा दूरी रखते हैं तो साइज बड़े, लेकिन उपज कम हो जाएगी. ऐसे में दूरी का विशेष ध्यान रखना जरूरी है. बता दें कि एक बीघा जमीन में 5-6 क्विंटल बीज की आवश्यकता होती है.

कब करें खाद्य-उर्वरक का प्रयोग और सिंचाई
आलू की खेती में खाद्य-उर्वरक का प्रयोग बेहद अनिवार्य है, इस वजह से फसल में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश पर्याप्त मात्रा में डालें. इससे पौधे की पत्तियां तो बढ़ती ही हैं, साथ ही साथ उनके कंदमूल का आकार भी तेजी से बढ़ता है. वहीं, सिंचाई की बात करें तो पौधे जब उग जाएं तब पहली बार पटवन करना चाहिए, वहीं इसके 15 दिन बाद दोबारा पौधों में पानी देना चाहिए. आलू की खेती में पानी देने की यह प्रक्रिया हर 10 से 12 दिन पर दोहराना चाहिए. पूर्वी भारत में अक्टूबर से जनवरी के बीच बोई जाने वाली आलू की फसल में 6 से 7 बार सिंचाई की जाती है.

खरपतवार, कीटों से बचाएं
आलू के पौधों में एक ओर खरपतवार का खतरा होता है तो दूसरी ओर कीट-पतंगें और अन्य बीमारियां लगने की भी संभावना होती है. ऐसे में खरपतवार को उगने से रोंके, साथ ही बुआई के एक सप्ताह के अंदर आधा किलो सिमैजिन 50 डब्ल्यूपी या फिर लिन्यूरोन का 700 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हैक्टेयर के हिसाब से छिड़काव कर दें. इससे खरपतवार नहीं उगेंगे. वहीं, कीट-पतंगों से बचाव के लिए एंडोसल्फान या फिर मैलाथियान का छिड़काव पौधों पर करें. इसके अलावा जड़ काटने वाले कटुआ कीड़ों से पौधों को बचाने के लिए एल्ड्रिन या हैप्टाक्लोर का छिड़काव निचली सतह पर करें.
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