PM मोदी की महंगी जिंदगी के लिए सस्ती दवा की कोशिश अब रंग लाने लगी है, ये है वजह

इस वक्‍त देश भर में जनऔषधि के कुल 5740 केंद्र कार्यशील हैं. कारोबार के लिहाज से वित्त वर्ष 2018-2019 बेहद महत्वपूर्ण रहा है.

Niranjan Singh | News18Hindi
Updated: August 4, 2019, 7:22 PM IST
PM मोदी की महंगी जिंदगी के लिए सस्ती दवा की कोशिश अब रंग लाने लगी है, ये है वजह
पीएम की इस योजना ने बदली लोगों की जिंदगी.
Niranjan Singh | News18Hindi
Updated: August 4, 2019, 7:22 PM IST
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि योजना. सस्ती दरों पर जनऔषधि जन-जन तक पहुंचाने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार की गयी है. दवा के रखरखाव के लिए देश में पांच केंद्रीय वेयर हाउस बनाए गए, जंहा से दवा को स्थानीय केंद्रों पर भेजा जाता है. जनऔषधि के 702 किस्म की दवाईयों को व्यवस्थित रखने के लिए 3002 पी ऑउट रैक उपलब्ध हैं तो पैकिंग यूनिट, शून्य से 2 डिग्री नीचे के तापमान वाले शीत दवाई गृह के अलावा फर्श और अर्श का भी ख़ासा ध्यान रखा गया है. दवा के उचित रखरखाव के लिए तकनीकी का भी बेहतर उपयोग किया जा रहा है.

कीमत में गुणवत्‍ता
ब्रांडेड और जेनरिक के अंतर के बाद अब बात कीमतों और गुणवत्ता की. जन औषधि योजना के मुताबिक कीमतों के मामले में जन औषधि और ब्रांडेड दवाओं के बीच न्यूनतम 50 प्रतिशत और अधिकतम 90 प्रतिशत का अंतर है. इस बात को आप उदाहरण के जरिए और बेहतर समझ सकते है. कैंसर के रोगी के लिए बेहद जरूरी बोरटेज़ोमिब नामक 3.5 एमजी की सुई, जिसे नामचीन ब्रांडेड दवा कंपनी 30460 की कीमत में बेचती हैं. वही बोरटेजोमिब 3.5 एमजी जनऔषधि की कीमत मात्र 3188 रुपए है. मतलब कैंसर की दवा बाजार से 10 गुना कम दर पर जन औषधि में उपलब्ध हैं. इसी तरीके से मधुमेह की दवा ग्लिमिप्राइड 2 मिलीग्राम की 10 गोलियों की बाजार में औसत क़ीमत 52 रुपया 90 पैसा है.

जबकि जन औषधि में ग्लिमिप्राइड, 2 मिलीग्राम की 10 गोलियों की की मत मात्र 5 रुपया 05 पैसा है. गुणवत्ता के लिहाज से जनऔषधि के निर्माण और सप्लाई में उन्ही एजेंसियों को परियोजना की ओर से हायर किया गया है, जो गुणवत्तापूर्ण दवा निर्माण के लिए जाने जाते हैं. देश की अलग-अलग एजेंसियों से समय-समय पर दवाओं का प्रामाणिकीकरण अनिवार्य तौर पर कराया जाता है. महिलाओं के लिए कम कीमत और बेहतर गुणवत्ता वाले सुविधा पैड्स के अलावा कार्डिक, रक्तचाप, गैस्ट्रो, विटामिन्स, एंटीबायोटिक्स आदि विभिन्न समूहों में सस्ती दवा की 702 किस्म उपलब्ध कराने वाली इस परियोजना की चुनौतियां भी कई है.

साल 2008 में शुरू हुई प्रधानमंत्री जनऔषधि परियोजना इस वक़्त अपने 10वें साल में है.


2008 में शुरू हुई योजना
साल 2008 में शुरू हुई प्रधानमंत्री जनऔषधि परियोजना इस वक़्त अपने 10वें साल में है. दशक भर में ढाई कोस चली जन औषधि परियोजना के अब तक के सफर पर आइए डालते हैं एक नज़र..
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>>प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2008 से 2014 तक में  जनऔषधि परियोजना के खाते में कुल 99 जन औषधि केंद्र और 131 प्रकार की दवा उपलब्ध थी.
>>आइये अब देखते हैं प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना की ओर से जुलाई 2019 में जारी नवीनतम आंकड़ों की तस्वीर.
>>इस वक़्त देश भर में जनऔषधि के कुल 5740 केंद्र कार्यशील हैं. कारोबार के लिहाज़ से वित्त वर्ष 2018-2019 जन औषधि के लिए बेहद महत्वपूर्ण साल.
>>जनऔषधि योजना की शुरुआत 2008 से हुई थी और जुलाई 2015 में इसका नाम बदलकर प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना रखा गया है.
साल           स्टोर
2015          99
2016         279
2017        1080
2018        3306
2019        5740
टर्न ओवर
2015-16 12.16 करोड़
2016-17 32 करोड़
2017-18 140 करोड़
2018-19 177 करोड़
2019 जुलाई 300 करोड़

प्रधानमंत्री का महत्वाकांक्षी योजना में से एक प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि योजना की वर्तमान में जिला स्तर पर दवा दुकान है. जबकि इसे प्रखण्ड से लेकर पंचायत स्तर पर 2020 तक खोलने का लक्ष्य रखा गया है.

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First published: August 4, 2019, 7:20 PM IST
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