अपना शहर चुनें

States

Opinion: विपक्षी पार्टियों की सरकारें भी पेट्रोल-डीज़ल के भाव में आग लगाने के लिए ज़िम्मेदार

 पूरी दुनिया में प्रदूषण या फिर उत्पादन में कमी की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता कम होती जाएगी.
पूरी दुनिया में प्रदूषण या फिर उत्पादन में कमी की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता कम होती जाएगी.

भारत में आम आदमी को पेट्रोल-डीज़ल असल मूल्य के क़रीब तीन गुने से ज़्यादा दाम पर मिलते हैं. इसकी वजह यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल-डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी और दूसरे कई टैक्स वसूलती हैं. पेट्रोल पर 60 प्रतिशत से ज़्यादा और डीज़ल पर 55 प्रतिशत से ज़्यादा टैक्स केंद्र और राज्य सरकारें लेती हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 22, 2021, 5:09 PM IST
  • Share this:
पेट्रोल और डीज़ल के भावों में आग लगी हुई है. राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई शहरों में तो पेट्रोल की क़ीमत सौ रुपये लीटर तक पहुंच चुकी है. लोग इसके लिए केंद्र सरकार को ही घेरते हैं, लेकिन क्या यह बात सही है? विपक्ष के नेता भी इसके लिए केंद्र सरकार को ही घेरने में लगे रहते हैं. उन्हें यह याद नहीं आता कि उनकी पार्टियों के शासन वाले राज्यों में भी तेल की क़ीमतें आसमान छू रही हैं और इसके लिए वे ही ज़िम्मेदार हैं.

देश में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें रोज़ तय होती हैं. अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों को इसका आधार माना जाता है, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमतें काफ़ी नीचे गिरी, तब देश में ईंधन का भाव बहुत नीचे नहीं गिरा. यह भी जान लीजिए कि भारत में आम आदमी को पेट्रोल-डीज़ल असल मूल्य के क़रीब तीन गुने से ज़्यादा दाम पर मिलते हैं. इसकी वजह यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल-डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी और दूसरे कई टैक्स वसूलती हैं. पेट्रोल पर 60 प्रतिशत से ज़्यादा और डीज़ल पर 55 प्रतिशत से ज़्यादा टैक्स केंद्र और राज्य सरकारें लेती हैं.

केंद्र सरकार पेट्रोल पर प्रति लीटर 32.90 रुपये और डीज़ल पर 31.80 रुपये एक्साइज़ ड्यूटी लेती है. पेट्रोल पंप मालिक का मुनाफ़ा भी आम आदमी की जेब से ही वसूला जाता है. सरल शब्दों में इस तरह समझें कि पेट्रोल या डीज़ल के प्रति लीटर असल भाव (क़रीब 33 रुपये) में केंद्र, राज्य सरकारों के हिस्से के अलावा डीलर का मुनाफ़ा भी जुड़ कर बिक्री होती है.



यह जानना भी सही होगा कि वित्त आयोग की सिफ़ारिशों के मुताबिक़, पेट्रोल-डीज़ल पर केंद्र जो एक्साइज़ ड्यूटी वसूलता है, उसमें से क़रीब 41 प्रतिशत हिस्सा राज्यों के ख़ज़ाने में चला जाता है. मतलब यह हुआ कि पेट्रोल और डीज़ल की बिक्री से राज्य अपने लिए भारी भरकम टैक्स तो कमाते ही हैं, केंद्रीय टैक्स में भी उनका हिस्सा होता है. लेकिन विपक्ष लोगों के मन में यही भरने में लगा रहता है कि पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ते भाव के लिए केंद्र सरकार ही ज़िम्मेदार है.
कांग्रेस की अगुआई वाली तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार में प्रणब मुखर्जी जब वित्त मंत्री थे, तब राज्यसभा में उन्होंने यही कहा था कि तेल की क़ीमतों के लिए जनता केंद्र को ही कोसती है, राज्यों को नहीं. अब मोदी सरकार पर निशाना साधने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को शायद यह बात याद नहीं होगी. जिन राज्यों में पेट्रोल का भाव 100 रुपये लीटर से भी ऊपर पहुंचा है, उनमें राजस्थान भी शामिल है, जहां कांग्रेस की सरकार है.

राहुल गांधी को इतनी ही चिंता है, तो वे राजस्थान और महाराष्ट्र सरकारों को यह सलाह क्यों नहीं देते कि टैक्स कम कर दोनों राज्यों के लोगों को राहत दें. हक़ीक़त यही है कि राजस्थान में पेट्रोल पर देश में सबसे ज़्यादा टैक्स लिया जा रहा है, लेकिन वहां टैक्स कम नहीं किया जाएगा, क्योंकि पेट्रोल-डीज़ल से मिलने वाला टैक्स राज्यों की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा होता है.

यह भी जान लीजिए कि केंद्रीय तेल कंपनियां तेल पर टैक्स की कमाई राज्य सरकारों के खाते में ट्रांसफ़र करती हैं. यानी राज्य सरकारों को पेट्रोल-डीज़ल से होने वाली कमाई के लिए एक धेला भी ख़र्च नहीं करना पड़ता, लेकिन केंद्र सरकार को पेट्रोल-डीज़ल पर टैक्स वसूलने के लिए कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतन और बुनियादी ढांचे के विकास पर काफ़ी पैसा ख़र्च करना पड़ता है. अब एक सवाल पर ग़ौर करते हैं कि केंद्र सरकार एक्साइज़ ड्यूटी और दूसरे उपकरों में कटौती कर आम लोगों को राहत क्यों नहीं दे रही है? मोदी सरकार अगर ऐसा कर दे, तो उसका क्या असर आम आदमी पर पड़ेगा?

केंद्र सरकार बहुत से कल्याणकारी काम करती है, जैसे कमज़ोर वर्ग को सब्सिडी देना, कर्ज़ माफ़ करना, किसान सम्मान निधि देना, आयुष्मान योजना लागू कर ग़रीबों को मुफ़्त इलाज की सुविधा देना, एमएसपी पर ख़रीद कर सस्ता या मुफ़्त अनाज बांटना इत्यादि. राज्यों के साथ-साथ देश भर में बुनियादी ढांचे के विकास का काम भी केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी है. अगर पेट्रोलियम पदार्थों पर केंद्र अपने टैक्स बहुत घटा दे, तो ज़िम्मेदारियों के निर्वाह की गति बहुत कम हो जाएगी. सब्सिडी इत्यादि ख़त्म करनी पड़ेंगी या फिर उनमें भारी कटौती करनी होगी. कोई सरकार नहीं चाहेगी कि कल्याणकारी काम कम कर या विकास की गति थाम कर वह जनता की नाराज़गी मोल ले. या फिर टैक्स में आई कमी की भरपाई के लिए केंद्र सरकार को दूसरे टैक्स लगाने पड़ेंगे. यह सही है कि तेल पर टैक्स कम हुए तो कमज़ोर वर्ग को बहुत फ़ायदा हो सकता है, महंगाई भी कम होगी. लेकिन टैक्स देने वालों की जेब पर बहुत ज़्यादा बोझ पड़ जाएगा, जिसकी क़ीमत किसी भी सरकार को हार के रूप में चुकानी पड़ सकती है.

पेट्रोल-डीज़ल के दाम कम करने का एक तरीक़ा और है कि इन्हें जीएसटी के तहत लाया जाए, लेकिन जब तक कल्याण और विकास के काम रोक कर या फिर दूसरे टैक्स बढ़ाकर या फिर टैक्स का दायरा बढ़ा कर आमदनी बरक़रार नहीं रखी जाएगी, तब तक ऐसा हो नहीं पाएगा. जीएसटी के दायरे में लाने से तेल पर टैक्स तो कम हो जाएगा, लेकिन राज्य सरकारों की कमाई घट जाएगी. उन्हें मजबूरन उपकर लगाने ही पड़ेंगे. यही वजह है कि विपक्षी पार्टियों की राज्य सरकारें भी पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी में लाने का विरोध करती हैं. पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी में लाने की मांग करते हैं. लेकिन उसी दिन पंजाब के वित्त मंत्री पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी में लाने का विरोध कर देते हैं.

तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि विपक्ष अगर पांच मुख्यमंत्रियों से पेट्रोल-डीज़ल को जीएसटी में लाने के लिखित आग्रह करने को कहे, तो ऐसा हो सकता है. लेकिन आज तक विपक्षी पार्टियों की एक भी सरकार की और से इसके बारे में लिखित आग्रह नहीं किया गया है. जीएसटी काउंसिल की बैठकों में इस पर चर्चा हो चुकी है, लेकिन कोई वित्त मंत्री अभी तक इसके लिए तैयार नहीं हुआ है.

भविष्य में एक समस्या और खड़ी हो सकती है. पूरी दुनिया में प्रदूषण या फिर उत्पादन में कमी की वजह से पेट्रोलियम पदार्थों पर निर्भरता कम होती जाएगी. सौर ऊर्जा, बिजली या फिर ऊर्जा के दूसरे अक्षय स्रोतों पर निर्भरता धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी. जब पेट्रोल-डीज़ल की बिक्री घटती जाएगी, तो केंद्र और राज्य सरकारें कमाई बढ़ाने के लिए क्या करेंगी? पीएम मोदी के अनुसार मध्यम वर्ग को ऐसी मुश्लिक नहीं होती, अगर पिछली सरकारें ऊर्जा आयात की निर्भरता पर ध्यान देती. 2019-20 में भारत ने अपनी घरेलू मांग पूरी करने के लिए 85% तेल और 53 % गैस आयात की थी.

ज़ाहिर है कि चाहे एनडीए की सरकार हो या यूपीए की या फिर भविष्य में किसी और पार्टी या गठबंधन की, पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें सिर्फ़ राजनैतिक मुद्दा है. विपक्ष में कोई पार्टी हो, वह केंद्र सरकार के सिर ठीकरा फोड़ती रहेगी. लेकिन समस्या का असल समाधान आख़िर क्या है? सीधी बात है कि ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता पाकर ही समस्या से निपटा जा सकता है और ये काम जादू की छड़ी से नही होगा. इसमें वक़्त लगेगा. तत्काल राहत के लिए अगर टैक्स कम किए गए, तो सब्सिडी इत्यादि कम करने के लिए तैयार रहना होगा. अभी जो बहुत बड़ा वर्ग टैक्स पेयर नहीं है, उसे दायरे में लाना होगा. कुल मिलाकर पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों पर फिलहाल राजनीति होती रहेगी.

(डिस्क्लेमर- ये लेखक के निजी विचार हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज